कोरोना संक्रमण : एक आपदा, कई सन्देश

Neeraj Gupta

11th May 2020

आज समूचा विश्व कोरोना-संक्रमण नामक जिस भयावह आपदा से जूझ रहा है, उसने हमें एक ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां हर कोई हताश, असहाय और लाचार होकर हम अपने-अपने घरों में दुबक कर बैठ जाने को विवश हो गया हैं I परन्तु इस त्रासदी के कारण जो मुक्त समय हम सबको मिला है, उसका लाभ न केवल गहन आत्म-विश्लेषण के अवसर के रूप में उठाया जा सकता है, वरन प्रतिदिन हमारे सामने आ रही नयी-नयी परिस्थितियों के गर्भ में छिपे गूढ़ सन्देशों को समझकर अपने आने वाले कल को संवारा भी जा सकता हैं I

कोरोना संक्रमण : एक आपदा, कई सन्देश

आज समूचा विश्व कोरोना-संक्रमण नामक जिस भयावह आपदा से जूझ रहा है, उसने हमें एक ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां किसी को पता नहीं कि अगले पल क्या होगा I कौन इस महामारी के चंगुल में फंस जाएगा, चंगुल में फंसकर कौन जीवित बच पायेगा और जीवित बचों में से भी कौन फिर से इसकी पकड़ में आ जाएगा, कोई नहीं जानता I इस प्रकार भय, क्षोभ और आशंकाओं के सागर में गोते लगाते हुए किसी को कुछ सूझ नहीं रहा कि क्या करें, क्या न करें I एक शक्तिशाली शत्रु घात लगाए हमारे आस-पास घूम रहा है, जो स्वयं तो हमें अच्छी तरह देख रहा है, पर हम उसे नहीं देख सकते I हमारे तरकश में ऐसा कोई तीर नहीं, जिससे इसे मारना तो दूर, हम इसका बाल भी बांका कर सकें I बस हताश, असहाय और लाचार होकर हम अपने-अपने घरों में दुबक कर बैठ जाने को विवश हो गए हैं, क्योंकि आज इसकी नज़र से बचकर रहना ही सुरक्षित रहने का एक-मात्र उपाय है I

परन्तु विवशतावश ही सही, इस त्रासदी के कारण जो मुक्त समय हम सबको मिला है, उसका लाभ न केवल गहन आत्म-विश्लेषण के अवसर के रूप में उठाया जा सकता है, वरन प्रतिदिन हमारे सामने आ रही नयी-नयी परिस्थितियों के गर्भ में छिपे गूढ़ सन्देशों को समझकर अपने आने वाले कल को संवारा भी जा सकता हैं I तो आइये जानते हैं, कैसे -

सृष्टि के सभी प्राणी बराबर हैं

इस विषाणु ने राक्षसी प्रवृत्ति का होकर भी हमें उस भूली हुयी दार्शनिक अवधारणा की याद दिला दी है, जो कहती है कि इस धरती पर निवास करने वाले सभी प्राणी एक समान हैं, न कोई छोटा है, न बड़ा I जिस प्रकार यह संक्रमणआयु, वर्ग, धर्म, जाति, आर्थिक-स्थिति, शारीरिक-सौष्ठव, राष्ट्रीयता, शिक्षा, लिंग आदि किसी भी आधार पर अपने शिकार से कोई भेदभाव नहीं करता, उसी प्रकार हम फिर से याद कर लें कि हम स्वयं को कितना भी बड़ा क्यों न समझते हों, परन्तु इस सृष्टि में हमारी महत्ता शेष सबके समान एक इकाई के बराबर ही है !  

प्रकृति का हृदय बहुत विशाल है

संभवतया प्रकृति के साथ जान-बूझ कर लम्बे समय तक किये जाते रहे अपने निर्दयता-पूर्ण व्यवहार से लज्जित होने के कारण हमने मान लिया था कि अब इस ईश्वरीय उपहार को वापस अपने पुराने रूप में लाना कठिन ही नहीं, असंभव है I परन्तु प्रकृति ने विश्व-जननी के रूप में हमें जता दिया है कि संतान चाहे जितनी भी निष्ठुर क्यों न हो जाए, माता कभी उनसे विमुख नहीं हो सकती I दुनिया के अधिकतर देशों में एक-एक कर घोषित किये गए सम्पूर्ण लॉकडाउन को अभी औसतन दो माह का समय ही हुआ होगा कि नदियों की धारा में जो निर्मलता दिखाई दे रही है, वह तो हमने अपने बचपन में भी नहीं देखी होगी, महानगरों में रहने वाली नयी पीढ़ी जो नहीं जानती थी कि आकाश में तारे टिमटिमाते भी हैं, उन्हें देख-देख कर आश्चर्यचकित हो रही है, पहाड़ों से 40-50 कि. मी. दूर स्थित शहरों में भी अपने घर की छतों पर चढ़कर लोग बर्फ से ढकी चोटियों की मनमोहक छटा का आनंद ले रहे हैं और वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चल रहा है कि ओज़ोन पर्त में हुए विशाल छिद्र में काफी कमी आयी है I इस सब से एक स्पष्ट सन्देश जाता है कि अभी भी सबकुछ समाप्त नहीं हुआ है I यदि आज भी हम चेत जाएँ और प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़-छाड़ पर प्रभावी रोक लगा दें, तो नष्ट-प्रायः हो चुकी अपनी प्राकृतिक सम्पदा कुछ हद तक पुनः वापस पा सकते हैं I 

ईश्वर अथवा प्रकृति ही सर्वशक्तिमान है

ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ विध्वंसक हथियार विकसित कर, अन्तरिक्ष के एक छोटे से भाग के विषय में थोड़ी जानकारी प्राप्त कर, विलासितापूर्वक जीवन जीने के साधनों को इकट्ठा कर तथा प्रकृति के बनाये नियमों का निर्ममता-पूर्वक उल्लंघन कर न केवल कुछ तथाकथित शक्तिशाली देश वरन अधिकतर मनुष्य इस गलतफहमी का शिकार हो चुके थे कि यह प्रकृति तो हमारी दासी है, इसके साथ हम जो चाहे कर सकते हैं I परन्तु इस छोटे से एक धूर्त विषाणु ने हमें अच्छे से बता दिया है कि हम नहीं, सर्वशक्तिमान तो कोई और ही है और हमारा अस्तित्व प्रकृति के विराट नियमों के साथ बंधा है, जिनसे विमुख होकर हम कुछ नहीं कर सकते I

समय कभी भी बदल सकता है

वैश्विक परिस्थितियों और जीवन शैली में अचानक आये इस अभूतपूर्व परिवर्तन ने हमें प्रत्यक्ष दिखा दिया दिया है कि जीवन में कभी भी कुछ भी बदल सकता है I कल तक अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि में नौकरी या व्यवसाय हेतु गए हुए लोगों को उनके परिजन अत्यंत भाग्यशाली समझ कर सराहना करते नहीं अघाते थे, आज वही लोग उनकी सुरक्षा के लिए चिंतित हैं I इन देशों से लौट कर आये परिचितों  को अपने घर बुला कर वहां के हाल-चाल जानना जहां लोगों के लिए सम्मान का प्रश्न होता था, आज ऐसी यात्रा के बारे में सुनते ही लोग दूर भाग जाते हैं I जो मॉल, बाज़ार, पिकनिक स्पॉट्स, बड़े-बड़े मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे भजन-कीर्तन व प्रार्थना से जीवंत रहते थे, आज वहां सन्नाटा पसरा है I अतः हमें किसी भी समय बड़े से बड़े परिवर्तन तथा उससे उपजे संघर्ष के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए I

सादा जीवन जीना इतना कठिन भी नहीं

कल तक विलासिताओं से परिपूर्ण जीवन के आदी हो चुके हम लोग सोचने लगे थे कि अब उस पुराने स्टाइल के जीवन की कल्पना कर पाना भी संभव नहीं है I लॉकडाउन के प्रारंभिक कुछ दिनों तक तो इन सुख सुविधाओं का अभाव अखरा भी, परन्तु समय बीतने के साथ अधिकतर लोग फिर से सीमित सुख-सुविधाओं से काम चलाने के आदी होते दिख रहे हैं I आज न तो खाने के लिए फास्टफूड आइटम, आइसक्रीम व चाट-पकौड़ी हैं, न घूमने के लिए पिकनिक स्पॉट व माल् और न ही पहनने के लिए नए-नए डिज़ाइनर कपड़े !य हाँतक कि कई बार सिर्फ एक सब्जी या दाल से रोटी खाकर, बिना प्रेस किये कपड़े पहने लोग खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ कैरम या ताश खेलकर समय बिता रहे हैं I

भारतीय संस्कृति आज भी सर्वश्रेष्ठ है

भारतीय जनमानस में अनुशासन के बढ़ते अभाव, जनसँख्या विस्फोट के कारण आयी अवसरों की कमी तथा विदेशों में उपलब्ध सुख-सुविधाओं से भ्रमित होकर हमारी आज की पीढ़ी के बहुत से युवा देश छोड़कर विदेश में बसने के सपने देखते थे I परन्तु इस महामारी ने उन तथाकथित उन्नत देशों की वास्तविकता को सबके सामने खोल कर रख दिया है I उनके यहाँ मची आपाधापी, दूरदर्शिता का अभाव, प्रकृति से दूर हो जाने के कारण व्याधियों से लड़ पाने की सामान्य क्षमता में कमी आदि और दूसरी ओर भारतीय जनता द्वारा दिखाए गए धैर्य, हमारे नेतृत्व द्वारा समय रहते लिए गए दूरदर्शी निर्णयों, तुलनात्मक रूप से प्रकृति के साथ अधिक तालमेल बिठाये रखने के कारण हुयी जीवन की कम हानि ने हमें समझा दिया है कि भारतीय संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ है, इसका तिरस्कार करके नहीं, बल्कि इसमें आये विकारों को दूर कर व उनमें आवश्यक सुधार करके ही अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता है I

जीवन सहअस्तित्व का नाम है

अपने क्षुद्र स्वार्थों के वशीभूत होकर मनुष्य ने प्रकृति का तो विनाश किया ही, उसके बनाये मनुष्येतर प्राणियों का जीना भी दूभर कर दिया था I परिणामस्वरूप, न केवल कुछ वन्यजीवों की प्रजातियाँ लुप्त हो गयी, बल्कि अभी तक जीवित जन्तुओं के दर्शन भी चिड़ियाघर के अतिरिक्त उनके प्राकृतिक परिवेश में कर पाना दुर्लभ होता चला गया I परन्तु आज जिस प्रकार वन्यजीवों के झुण्ड के झुण्ड सूनी पड़ी मानव बस्तियों में आकर अठखेलियाँ करते दिख रहें हैं, उसे देखकर लगता है मानों ये कातर स्वर में गुहार लगा रहें हों कि हमसे हमारा आश्रय छीन कर हमें बर्बाद मत करो, आप स्वयं भी जियो और हमें भी अपने आवास में शान्ति से जीने दो I

आपसी सहयोग बहुत आवश्यक है

प्रौढ़ आयुवर्ग के अधिकतर लोगों को याद होगा कि अब से 30-40 पहले तक अपने पड़ौसियों के साथ मिल-जुल कर किस प्रकार अपनी समस्याएं सुलझा ली जाती थी कि पता भी नहीं चलता था I आज फिर किसी के घर नमक ख़त्म हो जाने पर बराबर वाले घर से ले आना और किसी एक आदमी का बाज़ार जाते समय दूसरे से पूछ कर जाना, फिर उन्ही दिनों की याद दिला रहा है I क्या हम इस भावना को बनाये नहीं रख सकते ?

अपनों के साथ ही आनंद है

आज घर में खाली बैठे हम न केवल अपने परिजनों के साथ अच्छा समय व्यतीत कर रहे हैं, वरन भूले-बिसरे सम्बन्धियों व बचपन के मित्रों के मोबाइल न. ढूँढ-ढूँढकर न केवल उनसे आत्मीयता-पूर्वक बात कर रहे हैं, बल्कि हमारी बातचीत का दायरा भी हमारी उपलब्धियों का बखान करने से हटकर बीते दिनों की याद ताज़ा करने से लेकर एक दूसरे के दुःख-दर्द बाँटने तक हो चला है I तो किसी नकारात्मक शक्ति द्वारा दिया गया ही सही, एक सही सन्देश समझ कर अपनाने में बुराई भी क्या है ?

हमारे शुभचिंतक, आदर्श एवं आदर के पात्र कौन हैं

अभी तक कृत्रिम चमकदमक से सम्मोहित होकर हम भूल चुके थे कि हमारे शुभचिंतक, प्रेरणा-स्रोत एवं आदर के पात्र कौन हैं I हमें तो बस रुपहले परदे पर नाचते-गाते लोगों में ही अपना आदर्श दिखाई देने लगा था I परन्तु आज हमारे डॉक्टरों, नर्सों, वैज्ञानिकों, सफाई कर्मचारियों, मजदूरों, सेना के जवानों, पुलिस अधिकारियों, वाहन-चालकों आदि ने हमें याद दिला दिया है कि देवदूत वो नहीं जो ऐसे दिखते हों, बल्कि वो हैं जो रहते चाहे किसी भी रूप में हों,समय आनेपर अपनी जान की परवाह किये बिना निस्वार्थ भाव से हमारे जीवन की रक्षा करते हैं I

तो आइये, हम सब मिलकर जहाँ इन सब देव-दूतों को सादर नमन करें, इस राक्षसी विषाणु से युद्ध में न केवल सरकार का सहयोग करें बल्कि अपने उपलब्ध साधनों से स्वयं भी इसका मुकाबला करें, आवश्यकता पड़ने पर अपने साथियों की यथासंभव सहायता करें और ईश्वर से इस आपदा से शीघ्र मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करें, वहीं इस विश्व-आपदा द्वारा दिए गए उक्त संदेशों को समझ कर अपनी भूलों का सुधार करें ताकि आने वाला समय हम सबके लिये सुख और संतुष्टि लेकर आये I

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