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लिखें रिश्तों की नई परिभाषा

Neeraj Gupta

11th May 2020

मानव-जीवन में रिश्तों की अपनी अलग महत्ता होती है I कुछ रिश्ते जन्म के साथ स्वयमेव जुड़ जाते हैं, जिन्हें खून के रिश्ते कहते हैं जबकि कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो बाद में हमारे साथ जुड़ जाते हैं I यों तो मानव-निर्मित होने के कारण ये रिश्ते बहुत नाज़ुक होते हैं, परन्तु यदि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो ये मात्र औपचारिकता न रहकर खून के रिश्तों के समान ही पारिवारिक सुख व संतोष का कारण बन सकते हैं I

लिखें रिश्तों की नई परिभाषा

जन्म के साथ स्वयमेव जुड़ जाने वाले अर्थात खून के रिश्ते जैसे दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री, पौत्र-पौत्री आदि की क्या महत्ता होती है और उन्हें कैसे निभाया जाना चाहिए, इस पर तो चर्चा होती रहती है, परन्तु कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो खून के रिश्तों के कारण बाद में हमारे साथ जुड़ जाते हैं I आज हम इन्ही रिश्तों की बात करेंगें, जिन्हें हमने व हमारी संतान ने अकेले या साथ मिलकर अपनी इच्छा से जोड़ा है I इनमें बहू, दामाद,सास-ससुर और समधी-समधिन आदि रिश्ते शामिल होते हैं I यों तो मानव-निर्मित होने के कारण ये रिश्ते बहुत नाज़ुक होते हैं, परन्तु यदि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो ये मात्र औपचारिकता न रहकर खून के रिश्तों के समान ही पारिवारिक सुख व संतोष का कारण बन सकते हैं I आइये देखते हैं, कैसे -

बहू या दामाद तथा सास-ससुर

बहू, दामाद, सास व ससुर को इंग्लिश में क्रमशः Daughter-in-law, Son-in-law, Mother-in-law तथा Father-in-law कहते हैं I इससे स्पष्ट है कि ये रिश्ते वही हैं, जिनकी झलक इनके उक्त संबोधनों के पहले शब्द से मिल रही है अर्थात बेटी, बेटा, माँ तथा पिता, परन्तु मात्र जैविक रिश्तों को इन रिश्तों से अलग करने के लिए ‘in-law' नामक शब्द साथ में जोड़ दिये जाते हैं I अतः यदि इन रिश्तों को ये शब्द हटाकर स्वीकार कर लिया जाए, तो इन्हें सही अर्थों में जिया जा सकता है I इसके लिए न तो जैविक माता-पिताको भूलने की ज़रुरत हैं और न जैविक बेटे-बेटियों को नज़रअंदाज करने की, क्योंकि ये तो खून के रिश्ते हैं, जो हमेशा बने रहेंगे I अतः न तो अपनी बहू से अपेक्षा करें कि वह अपने माँ-बाप से स्नेह करना छोड़ देगी और न दामाद से चाहें कि वह अपने परिजनों से नाता तोड़ ले I

वस्तुतः यह तो रिश्तों का सुखद विस्तार है, जिसमें वर व वधू दोनों को देखभाल करने के लिए मिलता है स्नेहिल माँ-बाप का एक और जोड़ा तथा दोनों ओर के सास-ससुर में से एक को मिल जाती है प्यार लुटाने के लिए एक नटखट बिटिया और दूसरों को उनकी फ़िक्र करने वाला एक जिम्मेदार बेटा ! आप एक बार इन रिश्तों को इस रूप में स्वीकार करके देखिये, आप पायेंगें कि रिश्ते अचानक कितने मधुर हो गए हैं और सम्बन्ध कितने आत्मीय, जब बहू अपने ससुर को समय पर दवा न खाने पर बेटी के अधिकार से डांट पिलाती होगी और सास उसे माँ की तरह जिदकर के दुलार से खाना खिला रही होगी !

समधी-समधिन
समधी शब्द का उद्गम ‘संबंधी' से हुआ है और जहां सम्बन्ध होता है, वहां स्नेह का बंधन और सम्मान की अपेक्षा तो होती ही है I अतः अपने समधी-समधिन को अपने परिजनों जैसा ही स्नेह व आदर दें I ख़ास तौर से वर के माता-पिता को चाहिए कि वे निम्न बातों का ध्यान रखें -

  • चूँकि विवाह के बाद वधू पक्ष के लोग आपके परिजनों में ही शामिल हो जाते हैं, अतः उनके मान की रक्षा भी उतने ही जतन से करें, जैसे आप अपने सम्मान की करते हैं I यदि अनजाने में उनकी तरफ से कोई भूल हो जाए तो व्यर्थ बात का बतंगड़ बनाकर उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं I हाँ,जान-बूझ कर किये गए अपमान को तो कोई बर्दाश्त नहीं कर सकता, परन्तु उस स्थिति में भी बहू के प्रति व्यवहार खराब न करें और न ही ताने देकर उसका दिल दुखाएं I वह तो अब आप ही के परिवार का अटूट हिस्सा है, जिसे खुश रखना आप की जिम्मेदारी है I
  • बहू के मायके में कोई आयोजन होने पर न केवल उन्हें बधाई दें, बल्कि अवसर के अनुरूप उपहार भी दें I उसके भाई-बहनों को पर्याप्त स्नेह व आदर दें, क्योंकि उनके साथ आपकी बहू की भावनाएं भी जुड़ी हैं I 
  • यदि बहू के निकट सम्बन्धियों में से कोई बीमार हो या अन्य किसी परेशानी में हो तो उसे और अपने पुत्र को तो वहां जाने को कहें ही, स्वयं भी उनके हाल-चाल मालूम करते रहें और यथासंभव सहयोग भी करें I 
  •  अपने शब्दों व व्यवहार से बहू के परिजनों को स्पष्ट कर दें कि आपके लिए उनकी बिटिया ही सबसे कीमती उपहार है और उसको पा लेने के बाद, वे उनसे स्नेह तथा मान-सम्मान के अतिरिक्त अन्य कोई अपेक्षा नहीं रखते I अतः यदि वे प्यार से एक फूल भी आपके लिये ले आयेंगें तो वह भी आपके लिए एक बेशकीमती उपहार होगा, परन्तु स्नेह से वंचित होकर दी जाने वाली कोई मूल्यवान वस्तु भी आपको स्वीकार्य नहीं होगी I
  • रिश्ता नाज़ुक होने के कारण समधी लोग एक दूसरे से सम्मान-जनक दूरी बनाकर रहें तो ठीक रहता है I   

दहेज़ :रिश्तों की मधुरता के लिए घातक विष
दहेज़ की प्रथा रिश्तों में कैसे ज़हर घोलती है, यह किसी से छिपा नहीं है I अतः अपने संबंधों के बीच इस तुच्छ कारक को आड़े न आने दें I यद्यपि कुछ लोग कह देते हैं कि विभिन्न अवसरों पर कन्या-पक्ष द्वारा दिए जाने वाले उपहार रिश्तों में मिठास घोलने का काम करते हैं, परन्तु इसके लिए ‘उपहार' तथा ‘दहेज़' के अंतर को समझना होगा - 

  • जब वर और वधू, दोनों के परिजन अपनी नव-विवाहित संतान को गृहस्थी बसाने के लिए स्नेहवश कोई उपहार देतेंहैं, तो वधू-पक्ष द्वारा दिए गये उपहार को सद्भाव-सहित दहेज़  कह सकते हैं I इसे दहेज़-प्रथा का एकमात्र स्वस्थ रूप कह सकते हैं, जिसे स्वीकार किया जा सकता है,बशर्ते कि वधू-पक्ष बिना किसी दबाव के, स्वेच्छा से, अपनी हैसियत के अनुसार व प्रसन्नता-पूर्वक कोई उपहार दे रहा हो, जिसे किसी के द्वारा माँगा न गया हो और उसका दिखावा भी न किया जा रहा हो I
  • जब वधू का परिवार अपनी सामाजित-प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर स्वयं पैसा खर्च करना चाहता हो, तो इसे मान-प्रेरित दहेज़ कह सकते हैं I ऐसी स्थिति में वर का परिवार बिना स्वयं कुछ लिए, वधू-पक्ष को बारात के स्वागत आदि का प्रबंध उनकी इच्छानुसार करने के लिए कह सकता है, जिससे उनकी संतुष्टि भी हो जाए और अनचाहा दहेज लेकर वर-पक्ष के स्वाभिमान को चोट भी न पहुंचे I 
  • जब वर का परिवार विवाह या बाद में किसी पर्व या आयोजन आदि के अवसर पर वधू-पक्ष से मांगकर कुछ लेता है तो इसे दहेज़ का बिगड़ा रूप या सम्मान-रहित दहेज़ कहेंगें, क्योंकि लेने वाला अपने आत्म-सम्मान को ताक पर रखकर कुछ मांग रहा होता है I इन लोगों को क्या वधू व उसके परिजन कभी सम्मान की दृष्टि से देख सकते हैं, यह उनके लिए चिंतन का विषय है I
  • जब वर का परिवार विवाह के अवसर पर या बाद में वधू को पीड़ित कर कुछ पाना चाहता है तो इसे दहेज़ का निकृष्टतम रूप या अश्रु-पूरित दहेज़ कहेंगें I इसमें वर-पक्ष कुछ रुपये,गहने या अन्य किसी मूल्यवान वस्तू को पाने के लालच में अपनी बेटी समान बहू को प्रताड़ित करने तक के लिए तैयार हो जाता है I अतः इसे दहेज़ न कहकर ‘जबरन वसूली' कहना अधिक तर्क-संगत होगा I वस्तुतः ऐसे लोग अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं, जो अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए बहू ही नहीं बल्कि किसी के भी साथ ऐसा व्यवहार कर सकते हैं I यदि इनकी प्रवृत्ति के बारे में पहले से ज़रा सा भी आभास हो जाए, तो उस परिवार में आप अपनी लाडली का सम्बन्ध भूलकर भी न करें, चाहे उसके विवाह में देर भले ही हो जाए I 
  • जब वधू, बिना वर-पक्ष के किसी आग्रह के, अपने माता-पिता पर अनुचित दबाव डालकर, दहेज़ में नकद रूपए या कीमती सामान आदि लेने की जिद करती है, तो इसे लोभ-जनित दहेज़ कहेंगें I यदि कन्या की इस प्रवृत्ति के बारे में पहले आभास हो जाए तो उससे इसका कारण अच्छी तरह जान लें और संतुष्ट हो जाने पर ही विवाह के लिए तैयार हों, क्योंकि यदि वह युवती जन्म देने वाले अपने माता-पिता के साथ बिना किसी ठोस कारण के ऐसा व्यवहार कर रही है, तो वह आपके परिवार में सुख-शान्ति नहीं ला सकेगी I  
  • हाँ, यदि वधू के परिजन उसे आशीर्वाद-स्वरुप कुछ आभूषण या अन्य कोई वस्तु देना चाहते हैं, तो आप उसमें बाधा न बने I परन्तु आप उन्हें स्पष्ट रूप से बता दें कि वे उसे उतना ही दें, जो उनकी सामर्थ्य में हो, व्यर्थ की सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावे या इस डर से कुछ न दें कि कहीं वर-पक्ष वाले नाराज़ न हो जाएँ I
  • इस प्रकार वधू को जो कुछ भी दिया गया हो, उसे उसके पास ही रहने दें और उससे यह जानने का प्रयास भी न करें कि उसे अपने परिजनों से उपहार में क्या मिला है I बल्कि यदि वह स्वयं बताये तब भी उसका जिक्र अपने किसी रिश्तेदार से न करें, क्योंकि यदि वह उपहार छोटा हुआ तो बहू व्यर्थ अपने को अपमानित महसूस करेगी और यदि बड़ा होगा तो परिवार की दूसरी महिलाओं में हीन-भावना पैदा हो सकती है I
  • मांगना तो खैर स्वाभिमानी व्यक्ति को कभी शोभा ही नहीं देता,वधू-पक्ष के प्रस्ताव पर भी जहाँतक संभव हो, अपने लिए कुछ न लें I फिर भी यदि रस्म अदायगी के लिए वे कोई छोटा-मोटा उपहार स्नेह व सम्मान-पूर्वक देना चाहें, तो उसे स्वीकार कर सकते हैं I परन्तु न तो उसमें मीन-मेख निकालकर उन्हें अपमानित करने का प्रयास करें और न ही उनके द्वारा उसका प्रदर्शन कर झूठी शान दिखाने का अवसर दें  I   

अनावश्यक हस्तक्षेप से बचें

  • जहांतक हो सके लड़के के माता-पिता अपने बहू-बेटों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचें और जबतक कोई गलत बात होने का डर न हो, बिना मांगे सलाह न दें I यदि उन दोनों के बीच कोई बात हो तो यथासंभव तटस्थ रहें, आवश्यक होने पर जिसकी गल्ती लगे, उसे अकेले में समझाएं I इसमें न तो बेटे के प्रति पूर्वाग्रह रखें और न ही बहू कोपराये घर से आयी' मानकर उसे सच्ची बात कहने में संकोच करें, क्योंकि अब वो आप की बेटी ही है I
  • वधु को भी चाहिए कि ससुराल के विषय में ऐसी बातों की चर्चा मायके जाकर न करे, जिससे उनके सम्मान को चोट पहुँचती हो, क्योंकि अब उसका सम्मान भी उनके साथ ही जुड़ा है I साथ ही लड़की के माता-पिता उसकी शादीशुदा ज़िंदगी में व्यर्थ की तांक-झाँक न करें और उसे अपने वैवाहिक जीवन की छोटी-मोटी बातें स्वयं सुलझाने दें I हाँ, कोई गंभीर बात मालूम होने पर स्थिति का विश्लेषण कर अवश्य जानने की कोशिश करें कि समस्या कहाँ है ! अगर लड़की की गल्ती लगे तो उसे समझाएं और यदि ससुराल पक्ष की गल्तीहो, तो उनसे बात करें I यदि बेटी के जीवन या सम्मान को खतरा होने की आशंका हो तो तुरंत कार्यवाही करें और उसे विश्वास दिलाएं कि वह अकेली नहीं है, आप उसके साथ हैं I

 

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