GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

अपराध पीड़ितों के प्रति नज़रिया बदलें

Neeraj Gupta

11th May 2020

अपराध पीड़ितों के प्रति नज़रिया बदलें

हमारे देश में बलात्कार व यौन-उत्पीड़न की घटनाएं तेज़ी से बढ़ती जा रही हैं I इसमें सैद्धांतिक रूप से सबकी सहानुभूति पीड़ितों के साथ होनी चाहिए, परन्तु अगर कहा जाए कि उनके संपर्क में आने वाले अधिकतर लोग अपेक्षित सहयोग देने के स्थान पर जाने-अनजाने उनके घावों पर नमक छिड़कने का ही काम करते हैं, तो शायद आप हमसे सहमत नहीं होंगें I तो चलिये जानते हैं कि यह क्यों और कैसे हो रहा है तथा इसको रोकने के लिए हमें क्या करना होगा !

पीड़ितों का सामने आने से बचना

यौन अपराधों की शिकार महिलायें तथा बच्चे इस डर सेखुलकर सामने नहीं आ पाते कि इससे उनकी "बदनामी" होगी, उनके परिजनों का विवाह होना भी मुश्किल हो जाएगा या फिर उनके परिवार का सामजिक बहिष्कार कर दिया जाएगा I जबकि होना तो यह चाहिए था कि ऐसे मामलों में पीड़ित निडर होकर उसकी शिकायत करते और अपराधी अपना मुहँ छुपा कर कहीं पड़े होते, उनके घरवाले भी उन्हें कोस रहे होते कि कहीं उनके कारण वे समाज से बहिष्कृत न कर दिए जायें I शायद यही भय कम से कम कुछ लोगों को तो ऐसे कर्म करने से रोकता ! परन्तु उलटा इन दरिंदों के ज़ुल्मों के शिकार निरपराध पीड़ित तो मुहँ छुपाकर रहते हैं, जबकि ये और इनके परिजन गर्व से सीना चौड़ा कर आराम से घूमते हैं I

वस्तुतः इस स्थिति के पीछे हमारी सदियों पुरानी सड़ी-गली सोच है, जिसमें पुरुष की तुलना तांबे के घड़े से जबकि स्त्री की मिट्टी के बर्तन से की जाती थी I यह अवधारणा कुछ लोगों द्वारा अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए गढ़ी गयी जिसके अनुसार पुरुष कितना बड़ा पाप करके भी अपवित्र नहीं होता जबकि स्त्री के साथ यदि अनजाने में या बलपूर्वक भी कोई कुकृत्य हो जाए तो वह हमेशा के लिए अपवित्र हो जाती है I अतः अपराधी पुरुष के स्थान पर पीड़ित स्त्री को ही कोसा जाता है I यदि अपराधी अपने परिवार का ही कोई सदस्य निकले, तब तो स्थिति और भी विकट हो जाती है I इसी विकृत मानसिकता के चलते आज भी पीड़ित महिलायें अकारण अपने आप को दोषी मान बैठती हैं और उनके संपर्क में आने वाले लोग भी उन्हें शर्मिन्दा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते I अतः इस त्रासदी से बचने के लिए हमें अपनी सोच को बदलना होगा जिसमें जान-बूझकर अनैतिक अथवा अवैधानिक कार्य करने वाले और किसी अपराध का शिकार होने वाले व्यक्तियों, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, के प्रति प्रथक मानदंड अपनाने होंगें I

 कसूर अगर अपराधी का है तो पीड़ित मुहँ क्यों छिपाए

अगर हम गंभीरता-पूर्वक विचार करें तो पायेंगें कि हमारा शरीर भी हमारे धन, आभूषण या घर आदि की तरह हमारी निजी संपत्ति होता है, जिसे हमारी इच्छा के विरुद्ध किसी को छूने का भी अधिकार नहीं होता I परन्तु यदि कोई जेबकतरा हमारी जेब काटकर पैसे निकाल ले, या चोर घर में घुसकर आभूषण चुरा ले जाए, या फिर कोई गुंडा हमारे घर पर जबरन कब्ज़ा कर ले, तो उसके लिए दोषी हम होंगे या वे अपराधी ? क्या ऐसा होने पर हम भागकर पुलिस के पास नहीं जायेंगें और बिना किसी झिझक के गवाही देकर अपराधी को सज़ा नही दिलवायेंगे ? यदि हाँ,तो फिर यौन-अपराधों की शिकार किसी मासूम महिला या बच्चे (कुछ मामलों में पुरुष भी) को क्यों कटघरे में खड़ा किया जाता है ? आखिर उनका कसूर क्या है, जिसके लिए उन्हें मुहँ छिपाना पड़े ? परन्तु अफ़सोस का विषय है कि आज भी हमारे देश में यौन-अपराध पीड़ितों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो उन्होंने ही कोई अपराध कर दिया हो और उन्हें खुलकर उसका मुकाबला करने की बजाय घटना पर पर्दा डालने की सलाह दी जाती है, जो एक प्रकार से ऐसे अपराधों को बढ़ावा देने जैसा ही है I

अपराधियों के दुष्कृत्य को प्रचारित करने हेतु क़ानून की आवश्यकता

हमारी इसी दकियानूसी सोच ने न्यायपालिका को ऐसे निर्देश जारी करने के लिए विवश किया, जिसमें पीड़ित की पहचान छुपाना आवश्यक है, ताकि उसे पहले शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना झेल चुकने के बाद फिर सामाजिक उत्पीड़न भी न सहना पड़े I परन्तु वास्तव में आवश्यकता तो ऐसा कानून बनाये जाने की है कि यौन अपराध सिद्ध हो जाने पर अपराधियों का नाम, पता और फोटो सरकारी वेबसाइट पर डाला जाए ताकि वे अपना शेष जीवन मुहँ छुपाकर जीने को विवश हों जायें और उनके इस भर्त्सना-पूर्ण सामाजिक अपमान को देखकर बाकी लोग भी सबक लें तथा ऐसा कृत्य करने से पहले सौ बार सोचें I

पीड़ितों के परिवार का रुख

यौन-अपराध पीड़ितों के प्रति सबसे पहला कर्तव्य उनके परिजनों का होता है I वस्तुतः परिवार में ऐसा माहौल होना चाहिए कि प्रत्येक सदस्य को यह दृढ़ विश्वास हो कि उसके साथ कोई अनहोनी हो जाने की स्थिति में पूरा परिवार उसके साथ खड़ा हो जाएगा और सब मिल-जुल कर उसका सामना करेंगें I तभी पीड़ित व्यक्ति किसी अपराध का शिकार होने पर सबसे पहले अपने परिजनों को बताएगा I ऐसी स्थिति में परिजनों का दायित्व है कि सबसे पहले वे पीड़ित को हिम्मत बंधाएं और उसे समझाएं कि जब उसने कुछ गलत किया ही नहीं है, तो वो क्यों शर्मिन्दा हो, बल्कि जिसने गलत कार्य किया है, उसे ही शर्मिन्दा होना होगा I साथ ही मामले को पंचायत में ले जाने के स्थान पर सीधे पुलिस के पास जाएँ, क्योंकि आपराधिक मामलों की सुनवाई करने का पंचायतों को कोई अधिकार न होने के कारण वहां समय खराब करने और इज्जत का वास्ता देकर पीड़ित पक्ष पर अभियुक्तों द्वारा समझौता करने का अनुचित दबाव बनाने के सिवाय कुछ नहीं हो सकता I

परन्तु आज वस्तुस्थिति क्या है, उसकी बानगी देखिये, जिसे पढ़कर शायद आपका सिर भी शर्म से झुक जाएगा I अभी कुछ समय पहले बिहार के एक प्राइमरी स्कूल का समाचार आया, जिसमें बताया गया कि वहां के हेडमास्टर साहब छोटी-छोटी बच्चियों का लगातार यौन-शोषण कर रहे थे I परेशान होकर जब छात्राओं ने वहां पढ़ाने वाली महिला शिक्षकों से इसकी शिकायत की तो उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से उन्हें चुप रहने की सलाह दे डाली I सबसे अधिक दुःख तो यह जानकर हुआ कि जब उन बच्चियों ने यह बात अपने अभिभावकों के सामने रखी तो उसी समय सबने मिलकर पुलिस में रिपोर्ट लिखाने के स्थान पर, उन्होंने भी अपने खानदान की तथाकथित "इज्जत" का हवाला देकर उन्हें चुप रहने को कह दिया, ऊपर से दूसरों को दिखाने के लिए एक शर्मनाक बयान तक दे दिया कि वे सभी मासूम छात्राएं झूठ बोल रही हैं  Iपरन्तु उन बच्चियों को हम सैल्यूट करना चाहेंगें जो उन्होंने इस छोटी उम्र में भी अद्वितीय साहस का परिचय देते हुए वहां के जिलाधिकारी से इसकी शिकायत की, जिन्होंने मामले को गंभीरतापूर्वक लेते हुए त्वरित कार्यवाही की I

व्यवस्था का दायित्व

कई बार सुनने में आता है कि यौन-अपराध पीड़ित, विशेषकर कमज़ोर वर्ग से आने वाले लोगों की सहायता करना व अभियुक्त के विरुद्ध जांच करना तो दूर, पुलिस वाले उनकी रिपोर्ट तक दर्ज करने की ज़हमत नहीं उठाते I परिणाम यह होता है कि यदि 100 ऐसे मामलों में हिम्मत कर 50 लोग पुलिस तक पहुंचे जिनमें से 20 को उन्होंने भगा दिया तो 10 तो  डरकर या थक हारकर वहीं चुप हो जाते हैं, जबकि शेष 10 किसी संस्था की सहायता लेकर या किसी प्रकार न्यायालय के माध्यम से शिकायत दर्ज कराने में सफल हो पाते हैं I इस स्थिति से बचने के लिए हमें यह व्यवस्था करनी होगी कि यदि पुलिस द्वारा दुत्कार दिए जाने के बाद न्यायालय द्वारा आदेश दिया जाता है कि उस शिकायत को दर्ज कर जांच शुरू की जाए तो पीड़ित को खाली हाथ टरका देने वाले पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए I

यौन-अपराधों की सुनवाई हेतु प्रथक न्यायालय

आज इस प्रकार के मामले सामान्य न्यायालयों में सुने जाते हैं, जिनमें मुकदमों की अधिकता के कारण लम्बे समय तक सुनवाई चलती रहती है I नियत तिथि पर पीड़ित पक्ष का बार-बार अभियुक्तों से सामना होता है, जो उन्हें डरा-धमका कर केस वापिस लेने का दबाव बनाने में लगे रहते हैं I ऊपर से बचाव पक्ष के वकील लगातार शर्मनाक प्रश्न पूछकर पीड़ित के बचे-खुचे धैर्य को भी समाप्त कर देते हैं I इस सबसे तंग आकर कई बार पीड़ितों द्वारा आत्महत्या करने तक का प्रयास भी किया जाता है I

अतः इस प्रकार के मामलों की संवेदनशीलता को देखते हुए, इनकी सुनवाई प्रथक न्यायालयों में की जानी चाहिए, जिसमें जहांतक हो सके महिला न्यायाधीश नियुक्त की जाएँ I वस्तुतः ऐसे मामलों का जल्द निबटारा सुनिश्चित करने के साथ-साथ, पीड़ित को बार-बार दुखद प्रकरण को दोहराने की त्रासद स्थिति से निजात दिलानी होगी और अपराधी को अपने सफाई में झूठे साक्ष्य बनाने का अवसर पाने से भी रोकना होगा I  

इस प्रकार हमें अपने नज़रिए में आमूल-चूल बदलाव लाने की आवश्यकता है, जिसमें अपने आप को सभ्य-समाज का हिस्सा कहलाने के लिए हम ऐसे किसी भी अपराध से पीड़ित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति, सहयोग और उसके जज्बे के लिए मात्र प्रशंसा का भाव रखें, घृणा, निरादर या दया का नहीं I हमें समझना होगा कि इन अपराधों पर किसी का नियंत्रण नहीं होता I जो आज किसी एक के साथ हुआ, कल किसी और के साथ भी हो सकता है I अतः इससे पहले कि हमें निरपराध होते  हुए भी मुहं छुपाकर जीने का असहनीय कष्ट सहने को विवश होना पड़े, किसी अन्य पीड़ित को अपमानित करने का पाप करना तो दूर, हमें उसके साथ सहयोग करने का संकल्पभी लेना होगा I

 

 

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

default

अपने ही छल रहें है बालमन

default

तन के साथ कोमल मन भी छलनी

default

एफआईआर- जानिए अहमियत और अधिकार

default

बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं : कारण और निवारण

पोल

सबसे अछि दाल कौन सी है

गृहलक्ष्मी गपशप

अच्छे शारीरि...

अच्छे शारीरिक, मानसिक...

इलाज के लिए हर तरह के माध्यम के बाद अब लोग हीलिंग थेरेपी...

आसान बजट पर ...

आसान बजट पर पूरा...

आपकी शादी अगले कुछ दिनों में होने वाली है। आपने इसके...

संपादक की पसंद

आध्यात्म ऐसे...

आध्यात्म ऐसे रखेगा...

आध्यात्म को कई सारी दिक्कतों का हल माना जाता है। ये...

बच्चों को हा...

बच्चों को हाइड्रेटेड...

बच्चों के लिए गर्मी का मौसम डिहाइड्रेशन का कारण बन...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription