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अपने जीवन से प्यार करें !

Neeraj Gupta

11th May 2020

अपने जीवन से प्यार करें !

इस लेख का शीर्षक पढ़कर आप चौंक गए होंगें, यह भी कोई बात हुई, भला अपने जीवन से कौन प्यार नहीं करता ! परन्तु यदि आप मीडिया के द्वारा रोज़ आने वाली दुर्घटनाओं संबंधी विभिन्न ख़बरों पर गौर करें, तो ऐसे अनेक किस्से मिल जायेंगे, जब पीड़ित ने बैल मुझे मार  की तर्ज़ पर स्वयं ही मुसीबत को न्यौता दिया होगा I हो सकता है, ऐसा करके वे लोग बाद  में पछताये हों, या असमय काल के गाल में चले जाने के कारण उन्हें इसका मौका भी न मिला हो, परन्तु इससे फिर कुछ होने वाला नहीं है I अतः यदि पहले से सावधान रहकर और लापरवाही की हदें पारकर जानते-बूझते अपने प्राण संकट में न डालें जाएँ, तो ऐसी कई बिन-बुलाई मुसीबतों से आसानी से बचा जा सकता है I आइये देखते हैं, कैसे -

समय बचाने के लिए अनावश्यक जोखिम लेना

कई बार लोग मात्र कुछ समय बचाने के लिए या देरी से पहुँचने पर होने वाले नुक्सान को रोकने के लिए अनावश्यक जोखिम उठा लेते हैं, जैसे चलती ट्रेन में चढ़ने या ट्रेन के पूरी तरह रूक जाने से पहले ही उतरने की कोशिश करना, अनियंत्रित गति से वाहन दौड़ाना, रेड-लाइट पर बिना रुके निकल जाना, ज़ेबरा-क्रासिंग छोड़कर अन्य स्थान से सड़क पार करना, मोड़ दूर होने पर विपरीत दिशा से वाहन ले जाना, रात में सुनसान छोटे रास्तों से होकर निकलना, निषिद्ध स्थानों से रेल की पटरियाँ पार करने का प्रयास करना, क्रासिंग बंद होने पर बैरियर के नीचे से दुपहिया वाहन निकालकर ले जाना, त्योहारों पर घर पहुँचने की जल्दी में बसों या ट्रेनों की छतपर बैठकर चल देनाआदि  I इन कारणों से लोगों के गंभीर रूप से घायल हो जाने या जान से हाथ धो बैठने के समाचार अक्सर सुनने को मिल जाते हैं, जिन्हें जानकर दुःख भी होता है और आश्चर्य भी कि आखिर क्यों लोग जानते-बूझते इस प्रकार अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं ?

आपने ट्रैफिक पुलिस का एक सन्देश पढ़ा होगा दुर्घटना से देर भली  I यदि हमारी ट्रेन छूट गयी या उतरने में थोड़ी देर हो जाने से हमारा कुछ नुक्सान हो भी गया, तो आसमान नहीं टूट जाएगा, उस नुक्सान की भरपाई करने के कई अवसर हमारे जीवन में आयेंगें I इसी प्रकार यदि हम त्यौहार पर देर से घर पहुँच पाए तो काम चल जाएगा, परन्तु यदि जल्दी में कोई गंभीर चोट आ गयी या जीवन से हाथ ही धो बैठे तो क्या फिर परिवार उस त्यौहार को मना पायेगा ! अतः थोड़ा समय बचाने के लिए खतरा मोल न लें I

बेपरवाही से काम करना

कई बार लोग बिना संभावित परिणाम के विषय में सोचे, कोई भी कदम उठा लेते हैं और अपनी जान जोखिम में डाल बैठते हैं, जैसे रात में लम्बे सफ़र पर जाने का कार्यक्रम बना लेना, ड्राईवर को बिना नींद पूरी करने का अवसर दिये लगातार गाड़ी चलवाना I ज़रा सोचिये, रात में यदि वाहन खराब हो गया तो किससे मदद मांगेगें, या फिर किसी लुटेरे से सामना हो गया तो क्या करेंगें ! आपने यह भी पाया होगा कि अधिकतर सड़क-दुर्घटनाएं सुबह 3 से 4 बजे के आस-पास होती हैं, जब सारी रात नींद से लड़कर थक चुका ड्राईवर, नींद के आगे हथियार डालकर झपकियाँ लेने को विवश हो जाता है, इस बात से बेखबर कि ये सुहानी झपकियाँ उसे व अन्य वाहन-सवारों को चिर-निद्रा में भी सुला सकती हैं I

अतः जानते-बूझते ऐसा जोखिम न उठायें I यदि जाना अति आवश्यक ही हो, तो ध्यान रखें कि ड्राईवर को पर्याप्त नींद व आराम मिल गया हो I यदि संभव हो, तो दो लोग मिलकर बारी-बारी से गाड़ी चलायें I

आलस करना या इच्छा शक्ति का अभाव 

कभी-कभी हम थोड़े से आलस में व्यर्थ जोखिम उठा लेते हैं, जैसे तबियत खराब होने पर कुछ दूर जाकर किसी अच्छे डॉक्टर से संपर्क करने की बजाय, पास के किसी नीम-हकीम या मेडिकल स्टोर से पूछकर या दोस्तों से मालूमकर दवा लेलेना, डॉक्टर की सलाह को दरकिनार कर ठीक तरह से दवा न लेना या बताई गयी आवश्यक जांच न कराना आदि I याद रखिये, एक छोटा सा आलस किसी बड़ी मुसीबत का कारण भी बन सकता है I अतः इन मामलों में आलस त्याग कर तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर से संपर्क करें I

 इसी प्रकार डॉक्टर द्वारा किसी वस्तु का सेवन करने की सख्त मनाई के बावजूद उसी वस्तु का सेवन करना, जैसे मधुमेह के रोगी द्वारा छिपकर मिठाई खाना, लीवर के रोगी द्वारा सबकी नज़र बचाकर मदिरा-पान कर लेना या दमे के मरीज़ द्वारा दायें-बाएं होकर धूम्र-पान करने का प्रयास करना I ऐसे लोगों से हम कहना चाहेंगे कि डॉक्टर या परिजनों से छिपकर ऐसे काम करने का क्या लाभ है, उन्हें तो इससे  सिर्फ दुःख होगा या अधिक से अधिक क्रोध आयेगा, परन्तु प्राण तो आप अपने ही संकट में डाल रहें हैं ! फिर भी यदि आप नहीं मानते तो आत्म-हत्या के लिए उतारू व्यक्ति को भला कौन बचा सकता है ?

नियम तोड़ने को बहादुरी समझना

सरकार नागरिक-सुरक्षा के लिए जो नियम बनाती है, वह जन-कल्याण केलिए ही होते हैं I परन्तु कुछ लोगों को लगता है कि इन नियमों का पालन न कर वे कोई बहादुरी का काम कर रहे हैं I हमारी इस बात की पुष्टि केवल इस बात से ही हो जाती है कि हमारे देश में दुपहिया-वाहन चालकों को हेलमेट न पहनने और कार चालकों को सीट-बेल्ट न लगाने पर बार-बार जुर्माना लगाना पड़ता है, जबकि ये उनकी अपनी सुरक्षा के लिए ही है I अतः सिद्धांततः इन सुरक्षा मानकों का पालन बिना किसी जोर-दबाव के सबके द्वारा स्वतः ही किया चाहिए I परन्तु आपने कई बाइक सवारों को हैंडल पर हेलमेट टांगकर ले जाते देखा होगा ताकि पुलिस वाले के मिल जाने पर उसे पहनकर चालान से बच सकें I इन्हें हेलमेट पहनने के लिए चलाये गए जागरूकता अभियान के एक विज्ञापन का सन्देश याद दिला सकते हैं, जो कहता है -

"मर्जी है आपकी, क्योंकि सिर भी है आपका "

कई बार पति-पत्नि, बच्चों व माता-पिता सहित एक साथ बाइक पर बैठकर जा रहे पूरे परिवार की सड़क-दुर्घटना में हुयी दर्दनाक मौत के विषय में सुनकर मन विषाद से भर जाता है I परन्तु ज़रा सोचिये, जो बाइक दो लोगों की सवारी के लिए बनी हो, उसपर 3 से 5 लोग बैठकर तेज गति से जा रहे हों, साथ में एक ने हाथ में बड़ी सी अटैची ले रखी हो और दूसरा मोबाइल पर बात करता चल रहा हो, पर हेलमेट किसीने नहीं पहना हो, तो इस जोखिम का संभावित परिणाम और हो भी क्या सकता है ?

खतरनाक स्टंट करना

आपने कई बार युवाओं को खतरनाक स्टंट करते देखा होगा, जैसे खड़े होकर बाइक चलाना, चलती ट्रेन के दरवाज़े पर लटक जाना, नदी के बीचों-बीच नाव पर डांस करते हुए या सैंकड़ो फीट गहरी खाई के ऊपर स्थित किसी चट्टान के पतले किनारे पर लेटकर या किसी बाँध की दीवार पर खड़े होकर सेल्फी लेना, चिड़ियाघर में शेर के पिंजरे में हाथ डालकर उसे सहलाने का प्रयास करना, आतिशबाजी को बहुत नज़दीक से चलाना, आदि I ऐसे लोगों के लिये हमारा यही सन्देश है कि वे साहस और दुस्साहस में अन्तर करना सीखें और यदि रोमांच का आनंद ही लेना चाहते हैं तो पूर्ण प्रशिक्षण प्राप्त करके, आवश्यक उपकरणों से सुसज्जित होकर, किसी अनुभवी प्रशिक्षक की देखरेख में चाहे पहाड़ की ऊँची चोटियों पर चढ़ने, समुद्र की गहराइयों में गोता लगाने या हवाई-जहाज़ से छलांग लगाने का साहसिक प्रयास भले ही करें परन्तु बिना पर्याप्त सावधानी बरते, इस प्रकार के जोखिम-पूर्ण स्टंट करने का दुस्साहस कदापि न करें I

 दूसरों को प्रभावित करने के लिएबेतुकी शर्तें लगाना

स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करना मानव मन की एक स्वाभाविक आकांक्षा होती है और जबतक यह हमें कुछ बेहतर करने के लिए प्रेरित करे, इसमें कुछ बुरा भी नहीं है I परन्तु मात्र दूसरों को प्रभावित करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर बेतुके कार्य करने की कोशिश करना बचपना ही कहलायेगा I मित्र-मंडली में बैठकर कुछ लोग, विशेष रूप से युवा, ऐसी शर्त लगा बैठते हैं, जो उनके जीवन को संकट में डाल देती है, जैसे दौड़ती ट्रेन के सामने से पटरी पार करके दिखाना, मोटर-साइकिल या कार से हाई-वे पर रेस जीतकर दिखाना, दो अलग दोपहिया वाहनों पर एक दूसरे का हाथ पकड़कर बराबर-बराबर चलना, ट्रक के पीछे हुक पकड़कर उसके साथ साइकिल दौड़ाना, बिना रुके एक बार में ज्यादा से ज्यादा रसगुल्ले या साबुत तीखी मिर्च खाकर दिखाना, ठीक से तैरना न आने पर भी नदी में कूद जाना, चलती स्वचालित-सीढ़ियों (Escalators) पर खुद भी चल पड़ना, आदि I ऐसे लोगों को हम कहना चाहेंगें कि वे ऐसी बचकानी शर्त लगाने से पहले अच्छी तरहसमझ लें कि यदि वे शर्त जीत भी गए तो कोई नोबल पुरस्कार नहीं जीत लायेंगे, परन्तु यदि इस प्रक्रिया में हाथ-पैर तुड़वा बैठे या जान से ही हाथ धोना पड़ गया तो अनमोल जीवन तो मिटटी के मोल जाएगा ही, परिवार भी व्यर्थ बर्बाद हो जाएगा I अतः दोनों ही स्थितियों में उनको कुछ मिलने वाला नहीं I

तो आपने देखा कि किस प्रकार हममें से कई लोग अकारण अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं अथवा गंभीर रूप से घायल या सदा के लिए अपंग होकर अपनी उस क्षणिक भूलपर जीवन-पर्यंत पश्चात्ताप करते रहने के लिए विवश हो जाते हैं ! परन्तु याद रखिये, हमारा जीवन अनमोल है, स्वयं हमारे व हमारे परिजनों के लिए ही नहीं, बल्कि इस देश और समाज के लिए भी I अतः ज़रा से रोमांच के लिए हम इसे यूँ ही व्यर्थ नहीं गवां सकते I तो फिर आइये, एक संकल्प लें कि भविष्य में हम अपने जीवन को अकारण खतरे में डालने वाला कोई कार्य नहीं करेंगें I तभी हम अथर्ववेद वर्णित यह प्रार्थना ईश्वर से करने के अधिकारी हो सकेंगें -

"जीवेम शरदः शतम्" अर्थात हम सौ वर्षों तक जीवित रहें !

 

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