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अपनी सोच को तार्किक बनाएं

Neeraj Gupta

11th May 2020

अपनी सोच को तार्किक बनाएं

स्वतंत्रता के पश्चात हमारे देश में शिक्षा का प्रसार तो हुआ, परन्तु उससे जो परिवर्तन हमारी सोच में आना चाहिए था, वह कहीं नज़र नहीं आता I आज भी ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां हम अपनी सदियों पुरानी दकियानूसी सोच से उबर नहीं पाए हैं, जिसके चलते बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर भी हम सही अर्थों में अशिक्षित ही बने हुए हैं I अतः हमारे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का आज के विज्ञान आधारित काल-खंड के साथ समायोजन करने हेतु हमें अपने नज़रिए में कुछ परिवर्तन करने होंगें, अन्यथा हम अपना, अपने समाज व देश का अहित करने के साथ-साथ, दूसरों की नज़र में हंसी के पात्र भी बनते रहेंगें I तो आइये आपको उन स्थितियों से अवगत कराते हैं, जिनके आधार पर हमने यह प्रश्न उठाया है  - 

बिना कारण जाने भीड़ के साथ चल पड़ना

आज हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग कही-सुनी बातों पर आँख-मूँदकर भरोसा कर लेता है I किसी के ऊपर अँधेरे में बिल्ली का बच्चा कूद गया तो कुछ ही देर में ‘मुहँ-नोंचवा' के आने का हल्ला मच जाता है और खुद को बहादुर समझने वाले लोग भी डर कर घर में छुप जाते हैं I कभी शरारत में या अन्य किसी कारण से कोई किसी सोती हुई महिला की चोटी काट दे तो डर के मारे लड़कियों का घर से बाहर निकलना बंदकर दिया जाता है I यह अलग बात है कि कई स्त्रियाँ जो पहले छोटे बाल रखना चाहती थी, परन्तु घरवालों से अनुमति न मिल पाने के कारण मन-मसोस कर रह जाती थी, इस स्थिति का फायदा उठाकर खुद अपने बाल काट लेती हों, जिसका दोष भी उस बेचारे ‘चोटी-कटवा' पर ही मढ़ दिया जाता है, जिसका अस्तित्व सिर्फ उसपर विश्वास करने वाले लोगों के मन में ही होता है !

इसी प्रकार किसी महिला से कोई पुरानी दुश्मनी निकालने या उसकी संपत्ति हड़पने के उद्देश्य से कोई परदे के पीछे से उसे "डायन" घोषित करने की मुहिम शुरू करता है और बाकी लोग बिना सोचे-विचारे उसे मार डालते हैं I अब ज़रा विसंगति देखिये कि जो लोग मूर्खतावश ऐसा जघन्य अपराध कर बैठते हैं, वे तो अक्सर इसकी सजा पा जाते हैं, परन्तु इसकी योजना बनाकर शुरुवात करने वाला व्यक्ति अपने घर में बैठकर उनकी मूर्खता पर हंसता रहता है और बिना कुछ किये अपने कुत्सित उद्देश्य में सफल हो जाता है I कभी किसी इलाके में बच्चा-चोरी की कई वारदातों से आतंकित होकर लोग किसी भी अजनबी को अपने इलाके में देखकर ‘बच्चा-चोर' समझकर उसकी बात सुने बिना पीटना शुरु कर देते हैं, जिससे कई बार निरपराध व्यक्तियों या मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों की मौत तक हो जाती है  I

उक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि ऐसे मामलों में हम सामान्य तर्क-बुद्धि का भी प्रयोग नहीं करते और बहुत से लोगों से एक ही बात सुन-सुनकर बिना विचारे उसे मानने लग जाते हैं I ज़रा सोचिये, क्या इसी को भेड़चाल नहीं कहते, जो इंसान का नहीं, बल्कि किसी जानवर का गुण है ! अखबारों में रोज़ किसी जगह ‘मुहँ-नोंचवा', कहीं ‘चोटी-कटवा', कभी ‘डायन' या ‘बच्चा-चोर' का प्रकोप सुनकर शर्म आती है कि आज जब भारत चाँद पर उतरने के लिए अपना उपग्रह अन्तरिक्ष में भेज चुका है, हमारे देश का एक बड़ा वर्ग इन बेसिरपैर की बातों में उलझकर अपनी ऊर्जा और समय दोनों बर्बाद कर रहा है I

अतः ऐसे लोगों को चाहिए, वे समझने का प्रयास करें कि यदि इन विभूतियों का कोई अस्तित्व होता, तो क्या वे हमेशा और सभी जगह दिखाई न पड़ते ! इसलिए डरकर घर बैठने की बजाय जब इनके आने की सूचना मिले, तो स्वयं जाकर देख लें, असलियत खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी I इस प्रक्रिया में यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति मिले तो उसे पकड़ें अवश्य, परन्तु क़ानून अपने हाथ में लेने के स्थान पर तुरंत पुलिस में दे दें I

अफवाहों के जाल में फंस जाना  

यूँ तो अफवाहों से सावधान रहने के लिए, विशेषकर उपद्रवों की स्थिति में, पुलिस-प्रशासन द्वारा जारी की गयी एडवाइजरी हम बचपन से ही सुनते आये हैं, परन्तु तब संचार की गति धीमी होने के कारण इसका प्रकोप कुछ कम था, जबकि आज सोशल मीडिया के आम जन-जीवन पर छा जाने के कारण इसके दुष्प्रभाव की उग्रता भी बढ़ गयी है I अतः आवश्यक हो जाता है कि इस समस्या पर गहन विचार किया जाए I

वस्तुतः इन घटनाओं को किसी ने स्वयं देखा नहीं होता, सभी उसे किसी प्रत्यक्षदर्शी से सुनने का दावा करते हैं और फिर सुनने वाला दूसरे को उसी अंदाज़ में सुना देता है I इस प्रक्रिया में प्रत्येक व्यक्ति घटना को अपने हिसाब से थोड़ा-थोड़ा अतिरंजित भी करता जाता है, जिससे कुछ ही देर में "तिल का ताड़" बन जाता है I मान लीजिये एक व्यक्ति ने कहा कि अमुक ने अमुक को थप्पड़ जड़ दिया, दूसरा बताता है कि अमुक ने अमुक को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया, तीसरा उसे किसी की ह्त्या में बदल देगा, तो चौथे, पांचवे, छठे तक जाते-जाते छोटी सी घटना को दंगों का रूप दिया जा चुका होगा I

इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए सबसे पहले तो आप ऐसा समाचार सुनाने वाले व्यक्ति से पूछें कि क्या उसने घटना स्वयं अपनी आँखों से देखी है ? यदि नहीं, तो कहें कि वह उसके लिए आधिकारिक सूचना की प्रतीक्षा करे I साथ ही अपनी ओर से उस बात को किसी दूसरे को न कहें I जब थोड़े से लोग भी ऐसा कर लेंगें तो बिना किसी आधार के खड़ा अफवाहों का यह माया-लोक, ताश के पत्तों से बने महल की भांति अपने-आप भरभरा कर गिर जाएगा और फिर सच्चाई पता लगने पर वे लोग, जो उन अफवाहों पर भरोसा कर बड़े आत्म-विश्वास से आपको सूचना देने आये थे, शर्मिंदा होकर सफाई देने की कोशिश करते दिखेंगें कि उन्होंने तो अमुक की बातपर भरोसा कर ऐसा कहा था I  

चालाक लोगों द्वारा आम जनता को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करना

हमारे देश में जहां ऐसे भोले-भाले लोग हैं जो बिना परखे किसी आधारहीन बातपर भरोसा कर लेते हैं, तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो इनके भोलेपन का फायदा उठाकर खूब पैसा कमाते हैं I आपको कईबार ऐसे इश्तहार मिले होंगें, जिन में लिखा होगा कि अमुक जगह पर एक देवता ने किसी व्यक्ति के सामने आकर कहा कि इसको पढ़ने वाला व्यक्ति मेरे प्रकट होने की सूचना छपवाकर 100 लोगों तक पहुंचाए I जिसने भी ऐसा किया, उसे अप्रत्याशित लाभ हुआ, परन्तु जिसने ऐसा नही किया, उसे बड़ा नुक्सान उठाना पड़ा I एक दूसरे मामले में कहा गया कि किसी जादूगरनी ने ऐलान किया है कि उस क्षेत्र के पुरुषों पर बड़ा संकट आया है, जिसको टालने के लिए उनकी पत्नियां रबड़ की 24 चूड़ियाँ खरीदकर पास के तालाब में डालें I

अब इन घटनाओं के पीछे क्या कारण हो सकता है, यह बाद में सुनने में आया I पहली घटना वाले इलाके में कोई नई प्रिंटिंग-प्रेस खुली थी, जिसने अपना धंधा जमाने के लिए यह प्रपंच रचा जबकि दूसरे मामले में वहां किसी दुकानदार के पास ऐसी चूड़ियों का पुराना स्टॉक पड़ा था, जो उसने इस तरकीब से निकाल दिया I अब ये दोनों तो होशियार निकले पर जिन्होंने उनके झांसे में आकर पर्चे छपवाए या चूड़ियाँ खरीदकर तालाब में डाली, उन्हें क्या कहें ?

परिश्रम के स्थान पर चमत्कारों पर भरोसा करना

सामान्य बुद्धि वाले लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे समझें कौन सी बात तर्कसंगत है तथा कौन सी हवाई ! परन्तु जब मालूम होता है कि किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति को भी कोई ठग उसके आभूषणों को दुगुना करने का लालच देकर लूटकर ले गया तो ऐसे लोगों की बुद्धि पर तो तरस आता ही है, उनके शिक्षित होने पर संदेह भी उत्पन्न होता है I आज एक बच्चा भी जानता है कि कोई भी पदार्थ हवा से पैदा नहीं किया जा सकता, फिर शिक्षित होते हुए भी लोग किस प्रकार इन धोखेबाजों के झांसे में आ जाते हैं कि वह उनका सारा धन अपनी पेटी में रखकर फूंक मारकर दोगुना कर देगा ?

जहांतक धन का प्रश्न है, तो उसे कमाने के लिए योजना बनानी पड़ती है I फिर मेहनत करके उसे धरातल पर उतारना होता है, तब कहीं जाकर व्यक्ति कुछ धन कमा पात़ा है I परन्तु किसी पाखंडी के गड़ा धन ढूंढ निकालने के दावे पर भरोसा कर लोग अपनी जमा-पूंजी से भी हाथ धो बैठते हैं I ऊपर से इनके बहकावे में आकर कईबार पशुबलि, यहाँतक कि नरबलि भी देने का प्रयास कर न केवल अपने भीतर के राक्षस के सामने समर्पण कर देते हैं, बल्कि क़ानून के ऐसे शिकंजे में भी जकड़ जाते हैं, जो उन्हें हमेशा के लिए जेल की अंधेरी कोठरी में ले जाकर छोड़ देता है I वस्तुतः ये ठग इतने शातिर होते हैं कि धीरे-धीरे व्यक्ति की सोच को कुंदकर, उसे अपने इशारों पर नाचने के लिए मजबूर कर देते हैं I अतः जब भी कोई ऐसा व्यक्ति आपको मिले, तो उससे घुलने-मिलने की जरा भी कोशिश न करें, बल्कि उसे साफ़ कह दें कि वह आपसे दूर ही रहे अन्यथा आप पुलिस को सूचित कर देंगें I

अव्यवहारिक योजनाओं में पैसा लगाकर बर्बाद हो जाना

आज इंटरनेट के कारण सूचना की उपलब्धता इतनी सहज हो गयी है कि कोई भी व्यक्ति घर बैठे किसी भी विषय पर पूरी जानकारी प्राप्त कर सकता है I फिर भी लोग बिना विचारे अधिक लाभ कमाने के लालच में अपने खून पसीने की कमाई उल्टी-सीधी योजनाओं में फंसाकर गवां बैठते हैं I कभी मोबाइल पर किसी का फ़ोन आने पर अपनी गुप्त जानकारियां उसके साथ साझा कर लेना, तो कभी किसीके द्वारा लाटरी निकलने की सूचना पाकर उसके बताये बैंक खाते में रुपया जमा करवा देना आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे लगता है कि हम अपनी शिक्षा का प्रयोग व्यवहारिक जीवन में संभवतया कम ही करते हैं I अतः हम आपको सुझाव देना चाहेंगें कि यदि कोई व्यक्ति ऐसी योजना आपके पास लेकर आये, जिसमें सामान्य से अधिक लाभ मिल रहा हो, चाहे आस-पास के कई लोग पहले ही उससे लाभान्वित हो चुके हों, तो उसकी बातों में न आयें I वास्तव में ये लोग दूसरों को भरोसे में लेने के लिए पहले कुछ लोगों को तो लाभ पहुंचा देते हैं, परन्तु जैसे ही इनके पास बड़ी धनराशि जमा हो जाती है, ये उसे लेकर निकल लेते हैं और फिर कभी दिखाई नहीं देते I अतः हमें, विशेष रूप से महिलाओं को, चाहिए कि वे इस प्रकार की बातों में न आयें I

असल में ये लोग मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रवृति का फायदा उठाते हैं, जो कम समय में ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना चाहता है I परन्तु आप एक सिद्धांत की बात याद रखें (जो अपने में बहुमूल्य व्यवहारिक ज्ञान समेटे हमारे पुरातन कथा-संग्रह "पञ्च-तंत्र" में पशु-पक्षियों पर आधारित छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से दी  गयी शिक्षाओं पर आधारित है) कि यदि कोई व्यक्ति सामान्य से हटकर कोई असाधारण लाभ का प्रस्ताव आपको दे रहा है, तो अवश्य उसमें कुछ झोल है I कारण यह है कि तेल तिलों में से ही निकलता है अर्थात कोई व्यक्ति पहले खुद कुछ कमाकर उसमें से ही एक भाग आपको दे सकता है, अपनी जेब से भला वह आपको क्यों कुछ देने लगा ! उदाहरण के लिए, यदि आज ब्याज की सामान्य दर 7% है, परन्तु कोई व्यक्ति 14% ब्याज देने वाली योजना का प्रलोभन लेकर आपके पास आये, तो पहले स्वयं से पूछें कि यह हमें दोगुने दर से ब्याज का भुगतान करने के लिए आखिर किस प्रकार अतिरिक्त धन कमायेगा ? और यदि वह कमा सकता है तो दूसरे लोग क्यों नहीं ऐसा कर हमें अधिक ब्याज दे पा रहे ? इस प्रकार यदि आप तर्क-बुद्धि से काम लें तो बहुत से ठगों के इरादों पर पानी फेर कर अपनी गाढ़ी कमाई को गंवाने से बच सकते हैं I

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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