GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

जब बेटी ससुराल से वापिस आ जाए

Poonam Mehta

21st May 2020

ऐसे अनेक उदाहरण है, समाज में जब बेटियाँ ससुराल से वापिस आकर घर पर बैठ जाती है। ऐसे में वक्त रहते माँ बाप का सही निर्णय उनका भविष्य संवार या बिगाड़ सकता है। मात्र बेटी की शादी कर देने से ही अभिभावकों का कत्र्तव्य समाप्त नहीं हो जाता।

हिन्दुस्तानी संस्कृति में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है। पति-पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का अटूट रिश्ता माना जाता है। बदलते समय में इस रिश्ते की व्यावहारिकता भी बदली है।

    अब शालीनी को ही लीजिए। स्कूल खत्म करते-करते घरवालों की जिद के कारण शादी कर दी गयी। साल भर में ही एक बच्चे की माँ बन बैठी। उसके बाद शुरू हुआ सिलसिला अलगाव का। पति-पत्नी में किसी तीसरी औरत के कारण बनी नहीं। शालीनी के माता-पिता उसे मायके ले आए। आज उसका बेटा 15 साल का है। पति उस दूसरी औरत के साथ रह रहा है। उससे उसके बच्चे भी है। शालीनी अपने घर में भी कैदी की तरह जी रही है। ना उसका विधिक तलाक हुआ ना उसका बेटा अब इतने वर्षों पश्चात् दूसरे व्यक्ति को बाप के रूप में स्वीकारेगा।

    शालीनी हर तरह से अपने माता-पिता पर निर्भर है। कुछ समय बाद उसका बेटा ब्याहने लायक हो जाएगा, पर उसकी अपनी इचछाओं, जीवन आंकाक्षाओं का क्या? वह क्यों घुट-घुट के जीने को मजबूर है?
    दूसरा उदाहरण लीजिए निकिता का। उसने लव मैरिज की थी। विधर्मी विवाह यद्यपि माँ-बाप की इच्छा से हुआ, परन्तु पति को समझने में उसी ने भूल की। वह उसे शादी वाले दिन से ही शारीरिक व मानसिक यातनाएँ देने लगा था। उसकी सास जो इस शादी से खुश नहीं थी, उसने भी निकिता पर हाथ उठाना शुरू कर दिया। इसी बीच उसको दो बेटियाँ हो गई। अपने घरवालों को निकिता ने कभी सच्चाई नहीं बताई, क्योंकि वह शर्मिन्दा नहीं होना चाहती थी। पर जब मारपीट की खबरे मौहल्ले से होकर थाने तक पहुँची, तब तक उसके पति ने कमाना छोड़ दिया था। उसे कभी ससुराल वालों ने पैरों पर खड़ा नहीं होने दिया, अब लाचार निकिता अपने व अपनी बैटियों के भविष्य की सुरक्षा की गुहार किससे करें?

    ऐसे अनेक उदाहरण है, समाज में जब बेटियाँ ससुराल से वापिस आकर घर पर बैठ जाती है। ऐसे में वक्त रहते माँ बाप का सही निर्णय उनका भविष्य संवार या बिगाड़ सकता है। मात्र बेटी की शादी कर देने से ही अभिभावकों का कत्र्तव्य समाप्त नहीं हो जाता।

    कन्या दान का अभिप्राय उसको त्यागना नहीं है। बेटियों के प्रति जिम्मेदारी भी उम्र भर रहती है। यदि बेटी ससुराल से वापिस आ जाए तो महज उसी की बात न सुनकर, सच्चाई दोनों पक्षों से जानने का प्रयास करें।
    पक्षपाती रवैया न अपनाएँ। धैयपूर्वक सम्मानपूर्वक वर पक्ष की भी पूरी बात सुने और उसके बाद निर्णय करें। "घरेलू मामला" कहकर जिम्मेदारी से पल्ला ना झाड़े। यदि बेटी ससुराल से आपके यहाँ हमेशा के लिए आ ही गई है, तो यह महज उसका घरेलू मामला नहीं है। दोनों घरों की प्रतिष्ठा व शान्ति, सम्मान का सवाल है।

    यदि गलती बेटी की है तो उसे धैर्यपूर्वक समझाऐं, परन्तु ससुराल वालों के समक्ष उसे डाँटे नहीं, ना ही अपमान करें। बार-बार छोटी-छोटी बातों पर रूठ कर यदि बेटी अक्सर घर आती है तो उसे हतोत्साहित करें।
    माता-पिता का घर बेटी की फिजूल मांगे मनवाने के काम नहीं आना चाहिए। जहां तक हो सके, दोनों पक्षों को जोड़ने का यथासंभव प्रयास करना चाहिए।
    "लोग क्या कहेंगे", को ज़हन से निकाल कर सिर्फ अपनी बेटी दामाद के बारे में सोचे। यदि बेटी के बच्चे हो तो उनका भविष्य भी दांव पर है।
    यदि समस्त घटनाक्रम में बेटी गलत न हो तो हौसला रखिए। मारपीट, दहेज की डिमाण्ड, विवाहोत्तर सम्बन्ध आदि के मामले में बेटी का खुलकर साथ दीजिए। अगर आप ही उसका साथ न देंगे तो वो कहाँ जाएगी?
    उसे अनावश्यक मारपीट, मानसिक यंत्रणा या विवाहोत्तर सम्बन्धों को न ढोने की हिदायत दीजिए। संभव हो तो बेटियों को शादी से पहले इतना पढ़ाए कि वे जरूरत पड़ने पर आत्मनिर्भर हो सके, क्योंकि आर्थिक स्वावलम्बन व्यक्ति के आत्मविश्वास को पुख्ता करता है।

   स्वयं के पैरों पर खड़ी महिलाएँ जल्दी अवसाद का शिकार नहीं होती और परिस्थितियों का बेहतर ढंग से मुकाबला कर पाती है। हमारे देश में महिलाओं की सुरक्षा हेतु अनेक कानून है। बेटियों को उनकी जानकारी दी जानी चाहिए। नौकरी में भी विभिन्न संवर्गों में महिलाओं का आरक्षण है और स्वरोजगार हेतु महिलाओं को काफी तरह की ऋण सुविधाएँ दी गयी है।
    बेटी का पक्ष रखने हेतु लड़के के माता-पिता से बात करने से हिचकिचाएँ नहीं और यदि कोई गलत बात सामने आती है तो उसका विरोध करें। विवाह दो पक्षों का मेल है। ताली एक हाथ से नहीं बजती। कोई भी रिश्ता खत्म होने का कारण दोनो पक्ष होते है। कभी बेटी का हौसला कम मत होने दीजिए। उसे भी अपनी जिन्दगी जीने का पूर्ण अधिकार है।
    आवश्यकता हो तो तलाक की पहल करें। संभव हो तो तलाक होते ही पुनर्विवाह के भी प्रयास करें। हमारे यहां अक्सर लोक-लाज या बेटियों को पराया धन समझने के कारण, समाज की दोहरी मानसिकता के चलते बेटियों को खुलकर जीने का अधिकार नहीं दिया जाता। सही होने पर भी माता-पिता बेटियों का साथ नहीं देते।
    नतीजा या तो वो आत्महत्या कर बैठती है या अवसाद का शिकार हो जाती है या ससुराल में पैरदान की तरह जीवन जीने को विवश कर दी जाती है। इक्कीसवीं सदी में जब हम कन्या भ्रूण हत्या की इतनी बात करते है, बेटियों को पढ़ाते है, बेटा-बेटी एक समान का नारा लगाते है तो फिर विवाहोपरान्त बेटी का साथ क्यों नहीं दे सकते?
    विवाह के असफल होने का दोष बेटी के ही माथे क्यों? जब तक समाज का पढ़ा-लिखा तबका बेटियों का साथ देने आगे नहीं आएगा, विपरीत परिस्थितियों में बेटियाँ स्वाह होती रहेगी।

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

लिखें रिश्तो...

लिखें रिश्तों की नई परिभाषा

'फादर्स डे' ...

'फादर्स डे' स्पेशल: तो इसलिए पापा की लाडली...

लड़कियां अनच...

लड़कियां अनचाही मानी जाती हैं तो इसमें गलती...

बच्चों को प्...

बच्चों को प्यार करें पर सीमा में

पोल

आपकी पसंदीदा हिरोइन

गृहलक्ष्मी गपशप

पहली बार घर ...

पहली बार घर रहे...

लाॅकडाउन से पहले अक्षय कुमार की फिल्म सूर्यवंशी रीलीज़...

अनलाॅक 2 में...

अनलाॅक 2 में 31...

मिनिस्ट्री आफ होम अफेयर्स ने कहा है कि जो डोमैस्टिक...

संपादक की पसंद

गुरु एक सेतु...

गुरु एक सेतु है,...

गुरु तो एक सेतु है, एक संभावना है। गुरु एक तरह की रिक्तता...

दिल जीत लेंग...

दिल जीत लेंगे जयपुर...

जयपुर को गुलाबी शहर कहा जाता है लेकिन ये महलों का शहर...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription