अहिंसा का विचार : एक समग्र व्याख्या

Neeraj Gupta

23rd May 2020

नैतिक सिद्धांत कितने भी महान क्यों न हों, यदि उनमें भ्रांतियां उत्पन्न हो जाती हैं तो वे धीरे-धीरे अपना वास्तविक अर्थ खोकर समाज का उत्थान करने के स्थान पर उसकी प्रगति में ही अवरोध उत्पन्न करने लगते हैं I ‘अहिंसा' एक ऐसा ही सार्वभौमिक तथा सर्वहितकारी विचार है, जिसकी संकीर्ण व्याख्या, व्यक्ति, समाज व राष्ट्र का उत्थान करने के स्थान पर उन्हें पंगु बना सकती है, अतः आवश्यक है कि इसको सही अर्थों में समझने का प्रयास किया जाए I

अहिंसा का विचार : एक समग्र व्याख्या

प्राचीन धर्मग्रंथों में अहिंसा

अहिंसा के विषय में लगभग सभी प्राचीन धर्म-ग्रंथों में काफी कुछ लिखा गया है I हिन्दू धर्म में सब जीवों पर दया करना मनुष्य का कर्तव्य बताया गया और किसी भी प्राणी को कष्ट पहुंचाने का निषेध किया गया, जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की एक चौपाई में इस प्रकार व्यक्त किया - ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई ' I ईसाई धर्म के सन्दर्भ में बाइबिल की एक प्रसिद्ध उक्ति है, ‘यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे, तो तुम दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो' I इसी प्रकार बौद्ध धर्म में प्रतिपादित अष्टांगिक मार्ग के सिद्धांत में ‘सम्यक कर्मान्त ' अर्थात हिंसा आदि से बचने को निर्वाण के लिए आवश्यक बताया गया है I परन्तु अहिंसा के विचार पर सबसे अधिक जोर दिया गया जैन धर्म में, जिसमें ‘अहिंसा परमोधर्म ' कहकर अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म बताया गया I

अहिंसा का विचार और गांधीजी

गांधीजी ने अहिंसा के विचार को धर्मग्रंथों से निकाल कर व्यवहारिक धरातल पर उतार कर दिखाया और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र, यहाँ तक कि राजनीति में भी इसे अपनाने पर जोर दिया I उन्होंने न केवल कहा, बल्कि अपने आचरण से इसे प्रमाणित भी कर दिखाया, जब ब्रिटिश-राज द्वारा चलाये जा रहे दमन-चक्र के प्रत्युत्तर में भी उन्होंने हिंसा का मार्ग अपनाने के स्थान पर अहिंसक तरीके से अपनी बात रखने और उसे मनवाने में सफलता प्राप्त की I

आज की परिस्थितियों में विचार की प्रासंगिकता

परन्तु प्रश्न उठता है कि क्या आज की परिस्थितियों में भी अहिंसा का विचार उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीनकाल में था ? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि नैतिक सिद्धांत कालजयी होते हैं, अतः अहिंसा का विचार अपनी प्रासंगिकता कैसे खो सकता है ! फिर भी इस सद्विचार को मात्र शाब्दिक रूप में अपना लेने से उत्पन्न होने वाली भ्रांतियों को दूर करने के लिए आवश्यक है कि इसके हर पहलू का गहन विश्लेषण कर सही परिपेक्ष्य में समझने का प्रयास किया जाए I

अहिंसा का अर्थ तथा मूल तत्व

यद्यपि अहिंसा की कोई सर्वमान्य परिभाषा करना कठिन है, फिर भी सरल शब्दों में कहें तो "किसी मनुष्य द्वारा किसी अन्य प्राणी को, बिना किसी न्यायोचित कारण के, जान-बूझकर व दुर्भावना-वश, अपने मन, वचन या कर्म से कष्ट पहुंचाने का प्रयास करना, हिंसा की श्रेणी में आता है और ऐसे आचरण का विलोम अथवा अभाव ही अहिंसा है" I अहिंसा के इस भावार्थ को आगे ले जाने के लिए आवश्यक है कि हिंसा के मूल तत्वों की विस्तृत व्याख्या की जाए I

हिंसा का पहला मूल तत्व है कि कष्ट पहुंचाने का कार्य किसी मनुष्य द्वारा किया जाए (चूँकि यहाँ हमारा उद्देश्य केवल मानव समाज के परिपेक्ष्य में ही विचार का विश्लेषण करना है, अतः जीव-जंतुओं के व्यवहार को इसमें सम्मिलित नहीं किया जा रहा है), यद्यपि जिसके विरुद्ध ऐसा कार्य किया जाए, वह मनुष्य से इतर कोई अन्य प्राणी भी हो सकता है I यहाँ तक कि कोई व्यक्ति स्वयं अपने को भी अकारण कष्ट पहुंचाने का प्रयास करे, तो उसे भी हिंसा की श्रेणी में लाया जाता है, इसी कारण आत्म-ह्त्या का प्रयास करने वाले को दण्डित किया जाता है I

दूसरे, ऐसा कार्य सम्बंधित व्यक्ति द्वारा बिना किसी न्यायोचित कारण के किया जाना चाहिए, अन्यथा इसे हिंसा की श्रेणी में नहीं रख सकते I उदाहरणार्थ, पुलिस द्वारा मुठभेड़ में डाकुओं को मारना हिंसा नहीं कहलायेगा, क्योंकि इसका उद्देश्य जन-सामान्य के विरुद्ध होने वाली संभावित हिंसा को रोकना है I इसी प्रकार न्यायाधीश द्वारा किसी अपराधी को दंड देना भी हिंसा नहीं कहलायेगा, क्योंकि उसका उद्देश्य विधिक-प्रावधानों का अनुपालन करते हुए अपराधी द्वारा किये गए कुकृत्य का दंड देना होता है I दूसरे शब्दों में कहें तो अहिंसा के सिद्धांतों का हनन रोकने के लिए, यदि आवश्यक हो, तो तुलनात्मक रूप से छोटी हिंसा करना गलत नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि यह अहिंसा का एक अपरिहार्य अंग ही है I

तीसरे, संयोगवश हो जाने वाले कार्य से यदि किसी को कष्ट पहुँचता है तो उसे हिंसा की श्रेणी में नहीं रख सकते, क्योंकि इसमें जान-बूझकर कोई ऐसा कार्य नहीं किया जाता I इसके विपरीत किसीको कष्ट पहुँचाने वाला कार्य यदि जान-बूझकर किया जाए, परन्तु फिर भी किसी कारणवश लक्षित व्यक्ति को कष्ट न पहुँचे, तब भी इसे हिंसा की श्रेणी में ही रखा जाएगा क्योंकि कर्ता का इरादा तो कष्ट पहुंचाने का ही था, कष्ट पहुंचा या नहीं यह अलग बात है I

चौथे, कष्ट पहुंचाने का कार्य दुर्भावना-वश किया गया होना चाहिए I तदनुसार अभिभावकों द्वारा बच्चों को गलत मार्ग पर जाने से रोकने के लिए डांटना या डॉक्टर द्वारा मरीज का उपचार करने के लिए उसका ऑपरेशन करना हिंसा की श्रेणी में नहीं आते, क्योंकि इनका उद्देश्य क्रमशः बच्चों व रोगी का हित करना ही है I

और अंत में, कष्ट मन में सोचे गए विचारों से पहुंचाया जाए, या मुंह से बोले गए वचनों से या फिर शरीर से किये गए कार्यों से, इसे हिंसा ही कहा जाएगा I यद्यपि मन में सोचे गए विचारों का दूसरे व्यक्ति को पता लगना संभव न होने के कारण उसे कष्ट होने की संभावना भी नहीं होगी, फिर भी चूँकि सोचने वाला तो  दुर्भाव मन में ला चुका होता है, इसलिए इसे हिंसा की श्रेणी में ही रखा जाएगा I मुहँ से बोले गए वचन तो कईबार शरीर से किये जाने वाले कार्य से भी अधिक कष्ट-कारक होते हैं, अतः इनके हिंसा में शामिल होने में तो कोई संदेह हो ही नहीं सकता I इसी प्रकार यह आवश्यक नहीं कि पीड़ित को कष्ट शारीरिक रूप से ही पहुंचाया जाए, वरन यह मानसिक, आर्थिक या अन्य किसी रूप में भी पहुंचाया जा सकता है I

अहिंसा का मतलब भीरुता नहीं

परन्तु अहिंसा का अर्थ यह कदापि नहीं है कि कोई हमें लूटने के लिए आये और हम उसका मुकाबला करने के स्थान पर चुपचाप समर्पण कर दें I यह तो भीरुता कहलायेगी, जबकि अहिंसा का विचार चरित्र का आभूषण है, उसकी दुर्बलता नहीं I अतः ऐसे में आक्रान्ता का डटकर मुकाबला करना और आत्म-रक्षा के लिए उसे चोट पहुंचाने का भी हमें पूरा अधिकार है I  

इसी कारण गांधीजी, जो अहिंसा के दृढ़ पक्षधर थे, उन्होंने भी अपने भाषणों व लेखों के माध्यम से कई बार स्पष्ट किया कि अहिंसा का अर्थ अन्याय सहन करना या भीरुता नहीं है I ‘यंग इंडिया' दिनांक 29-05-1924.में प्रकाशित अपने एक लेख में उन्होंने कहा "यदि अहिंसा से नहीं तो हिंसा से अपनी रक्षा करना सीख लेना चाहिए" I  इसी प्रकार ‘हरिजन' दिनांक 01-03-1942 में वे फिर कहते हैं "किसी महिला पर जब आक्रमण हो, उस समय उसे हिंसा और अहिंसा का विचार करने की ज़रुरत नहीं I उसका पहला कर्त्तव्य आत्मरक्षा करना है I अपने शील की रक्षा के लिए उसे जो भी उपाय सूझे, उसका उपयोग करने की उसे पूरी आजादी है" I

अहिंसा के लिए शक्ति संचय आवश्यक है

अहिंसक होने के लिए यह आवश्यक है कि हम शक्ति का संचय करें I वस्तुतः शक्तिशाली मनुष्य ही अहिंसक हो सकता है, निर्बल नहीं, क्योंकि जिसमें शक्ति ही नहीं, वह स्वेच्छा से अहिंसक न होकर मजबूरी में ऐसा व्यवहार करता है I फिर, न तो वह किसी हिंसक प्राणी से स्वयं अपनी रक्षा कर पायेगा, न ही किसी अन्य निर्बल की I वस्तुतः शक्तिशाली व्यक्ति से ही यह आशा की जा सकती है कि वह अहिंसा के विचार की महत्ता समझकर इसे स्वेच्छा-पूर्वक अपनाए न कि इस विवशता में कि वह हिंसा करने का सामर्थ्य ही नहीं रखता I साथ ही वह अपनी शक्ति का प्रयोग अपने तथा अन्य लोगों के विरुद्ध किसी हिंसक प्राणी द्वारा किए जा रहे अन्याय-पूर्ण आचरण को रोकने के लिए भी करे, क्योंकि निकृष्ट लोगों को यदि शक्ति का भय न हो तो वे सज्जन व्यक्तियों का जीना मुश्किल कर सकते हैं I

इस बात को एक पौराणिक कथा के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता हैं I प्राचीन-काल में किसी बस्ती के निकट एक सर्प निवास करता था I जब भी वह अपने बिल से बाहर आता, उसे देखकर आस-पास खड़े लोग तुरंत वहां से भाग जाते, जो उसे अच्छा नहीं लगता था I यह बात उसने अपने बिल के पास कुटिया में रह रहे एक साधू से बताई तो उन्होंने कहा कि तुम लोगों को काटते हो, इसलिए सब तुमसे डरकर दूर भागते हैं I दुनिया में कोई भी व्यक्ति किसी हिंसक प्राणी से न तो प्रेम करता है और न ही उसके सानिध्य में रहना चाहता है I इसपर सर्प ने उनसे वायदा किया कि भविष्य में वह किसी को नहीं काटेगा और उसपर अमल भी करने लगा I परन्तु जब आस-पास रहने वाले लोगों को आभास हुआ कि यह सर्प तो काटता नहीं, तो उन्होंने उसे परेशान करना शुरू कर दिया I कभी बच्चे उसे पत्थर मारते, तो कभी कोई युवक उसकी पूंछ पकड़कर दूरतक खींच ले जाता I परिणाम यह हुआ कि कुछ ही दिनों में वह लहू-लुहान हो गया I

एक दिन जब वो घायल पड़ा कराह रहा था, तो वही साधू वहां आये I उन्हें देखकर सर्प ने अपनी दुर्दशा की कहानी उन्हें कह सुनायी I इसपर उन्होंने पूछा कि जब कोई तुम्हे मारता है तो तुम उसपर फुफकारते हो या नहीं, तो सर्प ने कहा कि आपके बताये अहिंसा के रास्ते पर चलने के कारण मैंने फुफकारना छोड़ दिया है I तब साधू ने उसे समझाया कि किसी को अकारण हानि पहुंचाना या पहुंचाने का प्रयास करना हिंसा की श्रेणी में अवश्य आता है, परन्तु किसी के द्वारा किये जा रहे अन्याय-पूर्ण आचरण को रोकने के लिए शक्ति का संचय करना, फिर उस अन्यायी को सावधान करने के लिए शक्ति का प्रदर्शन करना तथा विवश होकर न्यूनतम बल-प्रयोग करके उसे रोकना, अहिंसा की अवधारणा के बिलकुल भी विपरीत नहीं है I अतः जहांतक हो सके, तुम्हे किसी को काटना तो नहीं चाहिए, परन्तु फुफकार कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन अवश्य करते रहना चाहिए, जिससे डरकर लोग तुम्हे अकारण परेशान न करें I बात सर्प की समझ में आ गयी और वह दूसरों के जीवन में व्यवधान डाले बिना आनंद-पूर्वक जीने लगा I

अहिंसा और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

इसी बात पर यदि राष्ट्रीय नीति के परिपेक्ष्य में विचार करें तो चूँकि हमारा देश अहिंसा के सिद्धांतों पर चलता है, अतः न तो वह कभी किसी देश पर आक्रमण करता है, न ही किसी की धरती का कोई हिस्सा हड़पना चाहता है I परन्तु अहिंसा का यही सिद्धांत उसे यह अधिकार भी देता है कि न केवल वह आधुनिकतम हथियार संचित करे, वरन अपने शत्रुओं को सावधान करने के लिए गाहे-बगाहे उनका प्रदर्शन भी करता रहे ताकि दुष्ट-प्रवृत्ति के देश यह समझ लें कि आक्रमण करना तो दूर, यदि उन्होंने हमारे देश के किसी भू-भाग पर कुदृष्टि डालने का विचार भी किया, तो उन्हें इसके भयंकर परिणाम भुगतने होंगें I चूँकि इससे ऐसे देश अनावश्यक हिंसा व अन्यायपूर्ण आचरण न करने को विवश हो जाते है, अतः हथियारों का यह संग्रह व प्रदर्शन भी किसी प्रकार से अहिंसा के सिद्धांतों का उल्लंघन नही करता, बल्कि उनकी रक्षा करने का ही कार्य करता है, क्योंकि उसका उद्देश्य न्यायपूर्ण है I

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