मृत्यु गीत

सुधा गोयल

25th May 2020

"मम्मी ,काकी अभी तक नहीं आईं?"अकुलाकर द्वार की ओर देखते हुये मुदिता ने कहा. वह कबसे सजी संवरी सहेलियों के साथ बैठी थी.पड़ोस की औरतें साड़ियों

मृत्यु गीत

मृत्यु गीत

और जेवरों से लकदक मम्मी को बधाई देतीं आंगन मे बिछे फर्श पर आकर बैठती जा 

रही थीं.सुभद्रा को फुरसत कहां थी.एक टांग भंडारे मे होती तो दूसरी मेहमानों की 

आवभगत के लिए द्वार की ओर.एक व्यस्ततम थकान भरी मुस्कराहट चेहरे पर डाल 

कर सभी का स्वागत करती ,बधाई स्वीकार कर रही थी.
       लछमनिया शरबत के गिलास ट्रे मे लिए महिलाओ के बीच घूम रही 

थी.उसे भी काम के लिए बार -बार आवाज लगाती. शरबत की ट्रे कहीं किसी सहारे 

टिका सुभद्रा की एक टिटकार पर दौड़ जाती.
        महिलाएं बैठी आपस मे गपशप कर रही थीं.मझली से नहीं रहा 

गया. बोली-"जिज्जी,इस छोटी जात के बड़े नखरे हैं. अभी तक सब्बो मुहुर्त से पहले 

आती रही है.पर आज उसका पता नहीं है.सब उसी के इन्तजार मे बैठे हैं."
         "हां मझली दी ,सोचा होगा आज के बाद यहां कौन काम है.सो 

अपना महत्व जतला ही दे."-छोटी ने जोड़ा.
         "भाभी ,जल्दी ही किसी को उसके घर दौड़ाओ,कहीं बीमार न पड़ 

गई हो.आजकल गर्मी क्या कम पड़ रही है.कुछ ऐसा वैसा ही खा लिया 

हो"-सुनिष्ठा ने आशंका जाहिर की.
          "ए बीबीजी,तुम्हारी आदत अभी तक गई नहीं. यहां वक्त 

निकला जा रहा है और तुम्हें उसकी बीमारी की चिन्ता सता रही है.फिर तुम्हीं जाकर 

देख आओ न."छोटी ने व्यंग्य कसा.
       "मै क्यों जाऊं?जिसका कारज वह न जाए."सुनिष्ठा को भी ताव आ 

गया.
        "भतीजा तो तुम्हारा ही है न बीबीजी.नेग के समय सबके आगे 

होती हो.क्या इतना भी नहीं कर सकतीं?"मझली भला कहां चूकने वाली थी.
       सुनकर सुनिष्ठा का मुंह उतर गया. आंखें टपकने टपकने को हो 

आईं.स्थिति को संभालते हुए सुभद्रा ने कहा-"तुम तीनों भी क्या तकरार ले बैंठी.

किसी नौकर को भेज कर बुलवा लेतीं.घर ही कौन दूर है."
             'अरे किसनू,जा लपककर सब्बो काकी को बुला ला.'

अभी तक खामोश  बैठी बुआ और चाची की तकरार सुन रही मुदिता ने 

आवाज लगाई.
         "कुछ भी कहो सब्बो काकी के गले में जो लोच और मिठास है 

वह किसी अन्य की आवाज मे नहीं. अकेली ही महफिल का रंग जमा देतीं हैं."

किसी महिला का स्वर उभरा.
          "बिना काकी के कोई उत्सव जमता ही नहीं. क्या उमंग 

और उत्साह है उनमें?लड़कियों मे लड़की और बूढियों मे बूढी बनना उन्हीं को आता है"।

दूसरी महिला ने प्रशंसा की.
         "जब से सब्बो काकी इस मोहल्ले मे आईं हैं रौनक आ गई है.

हर घर मे बेखटके चली जाती हैं."अपने गले मे पड़े नेकलस की लड़ियां सहलाते हुये 

एक अन्य महिला ने कहा.
        तभी किसनू ने आकर सूचना दी कि काकी आ रही हैं. काकी बिना 

किसी दुआ सलाम के चुपचाप आकर ढोलक संभाल कर बैठ गईं.न किसी से राम राम 

की न पैर लगना. मालकिन को बधाई भी नहीं. मझली ,छोटी और सुभद्रा काकी के 

इस आचरण पर खीज उठी.
    आज तो बड़ी देर कर दी काकी।सब तुम्हारा कब से इन्तजार कर रहे हैं।

"उलाहना दिया सुभद्रा ने.
         "काकी को अपने गले पर गुमान हो गया है ,इसी से नखरे 

करती हैं."मझली ने साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए जोड़ा.
        काकी चुपचाप सुनती रही.उसने कहने वालियों की ओर नजर 

उठाकर भी नहीं देखा।कोई और दिन होता तो काकी इन व्यंग्यों की ऐसी मातमपुर्सी 

करती कि कहने वाली आगे से उनके सामने मुंह न खोल पाती. काकी का मन अपने 

पास था ही कहां जो औरों की बातें सुनता.
        काकी ढोलक उठा छल्ले कसने लगी तो लगा अंगुलियां बेजान हो 

गई हैं।ढोलक पर थाप दी तो हाथों ने काम करना बंद कर दिया. काकी ने ढोलक 

वसंती चाची की ओर बढानी चाही,पर चाची ने फौरन कहा-
        "क्या करती हो सब्बो काकी?तुम्हारे रहते मै ढोलक पर थाप दूंगी

 तो सुभद्रा छीन न लेगी."-और पान की पीक थूकने उठ गई .
       बड़े बेमन से काकी ने ढोलक पर थाप दी.गला खखारा ,लेकिन हाथ 

और गला दोनों कांप रहे थे.दोनों ही बेसुरे हो रहे थे.
   .  "काकी पानी पिओ और शुरु हो जाओ.मेरी सहेलियां कब से इंतजार कर 

रही हैं."-मुदिता ने शरबत का गिलास लछमनिया की ट्रे में से उठाकर काकी की ओर 

बढाया, लेकिन आज काकी ने हंसकर गिलास थामने की जगह मुदिता को बरज दिया.
        तभी सुनीष्ठा नई नवेली दुल्हन को लेकर आ गई. और उसे एक 

निश्चित स्थान पर बिठा दिया।सब्बो काकी ने एक नजर दुल्हन पर डाली और मन ही 

मन अपने उस दिन की कल्पना करने लगी जब दुल्हन बनी शरमाती छमछम करती 

गोविंद के पीछे पीछे चली आई थी.
          उनकी आंखें धुआं धुआं होने लगीं, लेकिन चेतना लौटी,दुल्हन 

की बलैंया लेते उनका मन कांपा.फिर भी पांच रुपये का तुड़ा मुड़ा नोट आंचल से 

खोलकर दुल्हन पर वार पास खड़ी लछमनिया को थमा दिया और ढोलक पर थाप 

देकर बधाई गाने लगीं.
           मुंह से निकलती आवाज थरथरा रही थी.आवाज मे न लोच 

न उत्साह. आए भी तो कहां से ?मन तो गोविंद के पास था जो अभी कुछ देर पहले 

जीवन के साठ साल उसके साथ हंसी खुशी बिताकर उसे दुनिया मे अकेली छोड़कर 

चला गया है.गोविंद का मुस्कराता चेहरा,और कभी आंगन में सफेद चादर से ढका 

लेटा एक मृत शरीर  उसकी आंखों के सामने आने लगा.दाम्पत्य जीवन के तीस 

वर्षों का अंत और ये बधाई गाने का समय,अभी अभी विधवा बनी काकी का ये सब 

गाने का नहीं बल्कि जीवन साथी के विछोह पर रोने का समय था.लेकिन काकी की 

बेबसी. आंखों से आंसू का कोई कतरा निकल कर गालों तक आए इससे पहले ही 

काकी ने अपना आंचल ले मुंह पोंछने के बहाने आंखें पोंछ लीं.गला खंखारा और 

फिर बधाई की लड़ियां समेट आगे बोल दोहराने लगी.
          ढोलक पर थाप देते उसकी निगाह अपनी कलाइयों पर पड़ी.

सुहाग के गीत जो गाने थे इसीलिए चूड़ियां अपनी जगह पर थीं.गर्मी के कारण माथे 

पर आए पसीने को पोंछने के लिए हाथ फेरा तो माथे की बिंदिया आप ही पुंछ गई. 

एक जोरदार रुलाई कंठ में आकर रुक गई.
        खाली हाथ और गोविंद की लाश,अंतिम संस्कार का खर्चा.जीता 

आदमी एक दिन भूखा सो सकता है,पर मरा आदमी बिना कफन काठी के चार छः 

घंटे से अधिक नहीं रखा जा सकता.गोविंद का क्रिया कर्म करती भी किसके भरोसे. 

अपना कहने को पिछले दस साल से गोविंद के अलावा कोई बचा ही नहीं. एक बेटा 

था जो बाप से झगड़ कर गया तो रेल की पटरी पर कट मरा.उसके बाद गांव छोड़कर

 यहां आ बसी और आज इस समय सब सोच समझकर बाहर से ताला लगा चुपचाप 

चली आई.रोने का समय भी नहीं मिला. कहीं पड़ोसियों को पता चल गया 

तो.....और सब्बो काकी ने आंचल मुंह पर फेरा.
        मझली से अब नहीं रहा गया. उसका सब्र चुक गया."चाची,अब 

तो ढोलक तुम्ही संभालो.आज तो काकी के नखरे दुल्हन को भी मात कर रहे हैं."
       कहां की काकी और कैसी दुल्हन?सफेद कपड़ों मे लिपटी एकाकी 

असहाय शोक की मूर्ति बनी काकी का अपना चेहरा अपनी ही आंखों मे कौंधने लगा.

ढोलक वसंती चाची की.ओर खिसकाती हुई काकी उठकर खड़ी हो गई.
        "अरे वाह, अभी से कैसे?दो गीत भी तो नहीं गाए.लड़कियाँ 

तरसती बैठी हैं. दुल्हन की रुनझुन किसी ने सुनी नहीं।"बांह पकड़कर सुनिष्ठा 

ने काकी को वहीं बैठा दिया.
        ढोलक की थाप के साथ साथ सांझ उतरने लगी.अकेला भांय भांय 

करता घर आंगन,आंगन मे पड़ी लाश,लाश के पास एक दिया तक नहीं. काठी अभी 

तैयार नहीं हो पाई तो सुबह तक.....गोविंद की आत्मा भी भटक रही होगी.कैसी 

औरत है?मर्द के नाम के दो आंसू भी नहीं. काकी का दम घुटने लगा.उन्हें लगा कि 

रुलाई आकर रहेगी.
        तभी पास से गुजरती लछमनिया की ट्रे से पानी का गिलास उठाया.

ओठों तक ले गई .फिर बिना पिए ही वापस रख दिया. घर मे लाश पड़ी है और वह 

अपना गला तर कर रही है.फिर घूमकर कूलर की ओर देखा.कूलर भी गरम हवा 

फेंकता लगा.
        बैठने की कोशिश करते करते काकी फिर खड़ी हो गई और सुभद्रा 

के पास जाकर बोलीं-"बहूजी,आज मेरा जी ठीक नहीं है.मै घर जाऊंगी.हो सके तो 

मेरा पिछला नेग दे दो."
       "काकी ,तुम भी कमाल करती हो.शगुन के दो गीत भी नहीं गाए 

और नेग का हिसाब करने लगीं"-मझली ने घुड़का.
        "बहूरानी....."कहते कहते उनक जुवान लड़खडाने लगी.गला भर 

आया. वे तेज तेज कदमों से जाने के लिए मुड़ीं.सुभद्रा ने उन्हें कुछ नोट थमाते हुए 

कहा-"मझली कीबातों पर ध्यान मत देना काकी.बुरा मत मानना. ब्याह के घर से 

खाली हाथ कैसे जाओगी.कल अपने आप आकर ले जाना."
       काकी ने एक निरीह सी नजर सुभद्रा.पर डाली. जैसे कह रही हो-

आज तो मृत्यु गीत गाकर जा रही हूं कल कैसे आ पाऊंगी.और चली गई.

      घर पहुंच कर ताला खोलकर काकी लाश के सामने दहाड़ें मारकर 

रोने लगी,अपनी असमर्थता पर या विछोह पर-कौन जाने.........।
  
सुधा गोयल

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