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ससुराल में रहते हुए भी रखिए अपने पेरेंट्स का ख्याल

चयनिका निगम

29th May 2020

अक्सर शादी के बाद लड़कियां अपने पेरेंट्स का ख्याल पहले की तरह नहीं रख पाती हैं। मगर ये इतना भी कठिन नहीं है।

ससुराल में रहते हुए भी रखिए अपने पेरेंट्स का ख्याल
रुचि के माता-पिता अकेले रहते हैं। रुचि खुद ससुराल में रहती हैं। शहर एक ही हैं लेकिन 2 महीने से पहले पेरेंट्स से मिलना भी नहीं हो पाता। सबकुछ अच्छा होने के बाद भी दिल दुखी रहता है। दुख इस बात का कि क्या सिर्फ बेटे ही अपने पेरेंट्स का ख्याल रख सकते हैं? जब सास-ससुर की तबीयत खराब होती है तो वो खुद गाड़ी ड्राइव करके उन्हें ले जाती हैं लेकिन अपने पेरेंट्स की बात आते ही मामला पलट जाता है। कभी घर के काम और कभी बच्चे की पढ़ाई उन्हें पेरेंट्स को समय-समय पर देखने जाने की इजाजत नहीं देते हैं। हां, बहुत जरूरत पर वो पहुंच जाती हैं। लेकिन रोजमर्रा में माता-पिता का ख्याल रखने वाला पुण्य उन्हें नहीं मिल पाता है। कह सकते हैं, इमरजेंसी में तो पड़ोसी भी मदद कर ही देते हैं। यही सब सोचते हुए अक्सर कई बार अकेले में वो रो भी लेती हैं। 
रुचि का ये दुख दर्द वो सारी महिलाएं समझ सकती हैं, जो सिर्फ इसलिए अपने माता-पिता का ख्याल रखने में असमर्थ हैं कि क्योंकि वो ससुराल में हैं। लेकिन याद रखिए हर परेशानी का हल होता है। महिलाओं की भी इस परेशानी का हल है। बस कुछ छोटी-छोटी बातें, आपको इस परेशानी से निकाल सकती हैं। तब आप दोनों घरों को आसानी से हैंडल कर पाएंगी। कैसे होगा ये आइए जानें-
परफेक्शन हो पर कितना-
याद रखिए खुद को पर्फेक्ट साबित करते रहना ही आपका सिर्फ एक मकसद नहीं हो सकता है। लेकिन ज्यादातर महिलाएं बहू बनने के बाद खुद को पर्फेक्ट साबित करना ही अपना आखिरी मकसद समझती हैं। इसका असर उनके अपने माता-पिता की जिंदगी पर भी पड़ता है। वो अक्सर अपनी बेटी से बस फोन पर ही मुलाकात कर पाते हैं। इसलिए खुद को पर्फेक्ट दिखाइए लेकिन इतना भी नहीं कि अपने पेरेंट्स के लिए समय ही न बचे।
जैसी हैं वैसी दिखें-
जैसी हैं वैसी दिखने से मतलब है कि आपको शुरू से अपनी इच्छाएं जताती रहनी होंगी। आपकी इच्छा यानि आपके अपने माता-पिता भी आपकी ही ज़िम्मेदारी हैं। और इस जिम्मेदारी को आप पूरे मन से निभाना चाहती हैं। ससुराल का ध्यान रखूंगी लेकिन माता-पिता को भी अकेले नहीं छोडूंगी। इसके लिए आपको पर्फेक्ट बनने वाले फंडे को पीछे छोड़ना ही होगा। 
सीमाएं भी हों- 
ससुराल पहुंचते ही आपको अपनी कुछ सीमाएं निर्धारित करनी होंगी। आपको पहले दिन से ये जताना होगा कि आपकी जिंदगी की कुछ सीमाएं हैं। और उन सीमाओं के अंदर आने का हक किसी को नहीं है। ये इसलिए जरूरी है कि हो सकता है कई बार आपको ससुराल का काम छोड़ मायके जाना पड़े। ठीक इस वक्त आपकी ये सीमाएं आपके काम आएंगी। या कहें कि सही काम करने देने की आजादी देंगी। 
कुछ बातें छोड़नी भी होंगी-
देखिए, ये जरूरी नहीं कि हर इंसान आपकी बात समझ ही ले। ऐसे में ये दिक्कत हो सकती है कि आपको कुछ ऐसा सुनने को मिले जो आपका दिल दुखा दे। इस वक्त दुखी होने से अच्छा होगा कि आप ‘चलो छोड़ो' वाला फंडा अपनाएं। आप इन बातों को दिल में नहीं रखेंगी तो अपने पेरेंट्स का ख्याल भी अच्छे से रख पाएंगी। इसको ऐसे समझिए कि नकारात्मक बातों को जितना खुद से दूर रखेंगी, उतना आपको फायदा देगा। 
दूसरों को इज्जत देना है जरूरी-
दूसरे आपके दिल की बात कई बार बिना कहे भी समझ लेंगे। लेकिन इसके लिए आपको इज्जत और प्यार वाला रिश्ता भी बना कर रखना होगा। आपको दूसरों को हमेशा ही ये अहसास कराते रहना होगा कि आप उनकी दिल से इज्जत करती हैं। आज नहीं तो कभी न कभी उन्हें ये अहसास जरूर होगा। और इस बात का फायदा तब आपको जरूर मिलेगा जब आप अपने माता-पिता के लिए कुछ करना चाह रही होंगी। 
त्याग की मूर्ति आप नहीं-
याद रखिए त्याग की प्रतिमा हमेशा से ही महिलाओं को बनने की सलाह दी जाती है। लेकिन यही त्याग माता-पिता का साथ भी अपने साथ ले जाता है। आप समय-समय पर पेरेंट्स के साथ होना चाहती हैं। तो इसका एक समय निश्चित कीजिए। कोशिश कीजिए कि ससुराल का कोई काम रह ना जाए। लेकिन जाने के लिए कोई काम छोड़ना पड़े तो हिचकिए नहीं। पर हां, वो कम इमरजेंसी वाला हो तो फिर उसे पूरा जरूरी करिए। मगर किसी भी छोटे काम के लिए पेरेंट्स को पीछे छोड़ देना सही नहीं है। 
दूसरों की इजाजत-
अक्सर महिलाएं मायके में हों या ससुराल में खुद के किसी भी काम के लिए दूसरों की इजाजत उन्हें जरूर चाहिए होती है। जबकि सशक्त महिला होने के नाते, ये आपका अधिकार है कि सही और जरूरी काम के लिए पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ी रहें और इसकी शुरुआत कर लें। इन्हीं में से एक है पेरेंट्स का ख्याल रखना। इसमें कोई खराबी नहीं है। जब बूढ़े माता-पिता को आपकी जरूरत है तो ये आपकी जिम्मेदारी है कि आप उस जरूरत को पूरा करें। फिर इसमें किसी की इजाजत की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। अगर कोई आपसे ऐसी अपेकषा रखता है तो वो गलत है आप नहीं। 
बात कीजिए-
ध्यान से सोचिए तो हर परेशानी का एक हल है बात करना। जब भी लगे कि कोई ऐसी बात है, जो आपके रिश्ते में दिक्कत कर सकती हैं। बात करने को अपना हल बनाइए। फिर चाहे पति हों, या सास। ससुर हों या देवर। हर बार अपनी बात सामने रखिए और दूसरों को भी बातचीत के लिए जगह दीजिए। 

याद रखना होगा-
  • महिला हैं सिर्फ इसलिए आपके पेरेंट्स अकेले नहीं रहने चाहिए। 
  • आपके पेरेंट्स ने भी आपको वैसे ही बड़ा किया है, जैसे आपके पति को पाला गया । 
  • जैसे आप अपने ससुराल में सबका ख्याल रखती हैं, वैसा ही ख्याल आपके पेरेंट्स भी चाहते हैं।
  • पेरेंट्स से मिलने का एक नियम बनाइए। ताकि कहीं कोई कमी न रह जाए और सबकुछ समय पर होता रहे। 
  • उनकी दवाइयों और दूसरी जरूरतों का ख्याल तभी रखा जा सकता है, जब सबकुछ नियम से किया जाए। 

ये भी पढ़ें-

 

ससुराल में रहते हुए भी रखिए अपने पेरेंट्स का ख्याल 
स्टोरी-
रुचि के माता-पिता अकेले रहते हैं। रुचि खुद ससुराल में रहती हैं। शहर एक ही हैं लेकिन 2 महीने से पहले पेरेंट्स से मिलना भी नहीं हो पाता। सबकुछ अच्छा होने के बाद भी दिल दुखी रहता है। दुख इस बात का कि क्या सिर्फ बेटे ही अपने पेरेंट्स का ख्याल रख सकते हैं? जब सास-ससुर की तबीयत खराब होती है तो वो खुद गाड़ी ड्राइव करके उन्हें ले जाती हैं लेकिन अपने पेरेंट्स की बात आते ही मामला पलट जाता है। कभी घर के काम और कभी बच्चे की पढ़ाई उन्हें पेरेंट्स को समय-समय पर देखने जाने की इजाजत नहीं देते हैं। हां, बहुत जरूरत पर वो पहुंच जाती हैं। लेकिन रोजमर्रा में माता-पिता का ख्याल रखने वाला पुण्य उन्हें नहीं मिल पाता है। कह सकते हैं, इमरजेंसी में तो पड़ोसी भी मदद कर ही देते हैं। यही सब सोचते हुए अक्सर कई बार अकेले में वो रो भी लेती हैं। 
रुचि का ये दुख दर्द वो सारी महिलाएं समझ सकती हैं, जो सिर्फ इसलिए अपने माता-पिता का ख्याल रखने में असमर्थ हैं कि क्योंकि वो ससुराल में हैं। लेकिन याद रखिए हर परेशानी का हल होता है। महिलाओं की भी इस परेशानी का हल है। बस कुछ छोटी-छोटी बातें, आपको इस परेशानी से निकाल सकती हैं। तब आप दोनों घरों को आसानी से हैंडल कर पाएंगी। कैसे होगा ये आइए जानें-
परफेक्शन हो पर कितना-
याद रखिए खुद को पर्फेक्ट साबित करते रहना ही आपका सिर्फ एक मकसद नहीं हो सकता है। लेकिन ज्यादातर महिलाएं बहू बनने के बाद खुद को पर्फेक्ट साबित करना ही अपना आखिरी मकसद समझती हैं। इसका असर उनके अपने माता-पिता की जिंदगी पर भी पड़ता है। वो अक्सर अपनी बेटी से बस फोन पर ही मुलाकात कर पाते हैं। इसलिए खुद को पर्फेक्ट दिखाइए लेकिन इतना भी नहीं कि अपने पेरेंट्स के लिए समय ही न बचे।
जैसी हैं वैसी दिखें-
जैसी हैं वैसी दिखने से मतलब है कि आपको शुरू से अपनी इच्छाएं जताती रहनी होंगी। आपकी इच्छा यानि आपके अपने माता-पिता भी आपकी ही ज़िम्मेदारी हैं। और इस जिम्मेदारी को आप पूरे मन से निभाना चाहती हैं। ससुराल का ध्यान रखूंगी लेकिन माता-पिता को भी अकेले नहीं छोडूंगी। इसके लिए आपको पर्फेक्ट बनने वाले फंडे को पीछे छोड़ना ही होगा। 
सीमाएं भी हों- 
ससुराल पहुंचते ही आपको अपनी कुछ सीमाएं निर्धारित करनी होंगी। आपको पहले दिन से ये जताना होगा कि आपकी जिंदगी की कुछ सीमाएं हैं। और उन सीमाओं के अंदर आने का हक किसी को नहीं है। ये इसलिए जरूरी है कि हो सकता है कई बार आपको ससुराल का काम छोड़ मायके जाना पड़े। ठीक इस वक्त आपकी ये सीमाएं आपके काम आएंगी। या कहें कि सही काम करने देने की आजादी देंगी। 
कुछ बातें छोड़नी भी होंगी-
देखिए, ये जरूरी नहीं कि हर इंसान आपकी बात समझ ही ले। ऐसे में ये दिक्कत हो सकती है कि आपको कुछ ऐसा सुनने को मिले जो आपका दिल दुखा दे। इस वक्त दुखी होने से अच्छा होगा कि आप ‘चलो छोड़ो' वाला फंडा अपनाएं। आप इन बातों को दिल में नहीं रखेंगी तो अपने पेरेंट्स का ख्याल भी अच्छे से रख पाएंगी। इसको ऐसे समझिए कि नकारात्मक बातों को जितना खुद से दूर रखेंगी, उतना आपको फायदा देगा। 
दूसरों को इज्जत देना है जरूरी-
दूसरे आपके दिल की बात कई बार बिना कहे भी समझ लेंगे। लेकिन इसके लिए आपको इज्जत और प्यार वाला रिश्ता भी बना कर रखना होगा। आपको दूसरों को हमेशा ही ये अहसास कराते रहना होगा कि आप उनकी दिल से इज्जत करती हैं। आज नहीं तो कभी न कभी उन्हें ये अहसास जरूर होगा। और इस बात का फायदा तब आपको जरूर मिलेगा जब आप अपने माता-पिता के लिए कुछ करना चाह रही होंगी। 
त्याग की मूर्ति आप नहीं-
याद रखिए त्याग की प्रतिमा हमेशा से ही महिलाओं को बनने की सलाह दी जाती है। लेकिन यही त्याग माता-पिता का साथ भी अपने साथ ले जाता है। आप समय-समय पर पेरेंट्स के साथ होना चाहती हैं। तो इसका एक समय निश्चित कीजिए। कोशिश कीजिए कि ससुराल का कोई काम रह ना जाए। लेकिन जाने के लिए कोई काम छोड़ना पड़े तो हिचकिए नहीं। पर हां, वो कम इमरजेंसी वाला हो तो फिर उसे पूरा जरूरी करिए। मगर किसी भी छोटे काम के लिए पेरेंट्स को पीछे छोड़ देना सही नहीं है। 
दूसरों की इजाजत-
अक्सर महिलाएं मायके में हों या ससुराल में खुद के किसी भी काम के लिए दूसरों की इजाजत उन्हें जरूर चाहिए होती है। जबकि सशक्त महिला होने के नाते, ये आपका अधिकार है कि सही और जरूरी काम के लिए पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ी रहें और इसकी शुरुआत कर लें। इन्हीं में से एक है पेरेंट्स का ख्याल रखना। इसमें कोई खराबी नहीं है। जब बूढ़े माता-पिता को आपकी जरूरत है तो ये आपकी जिम्मेदारी है कि आप उस जरूरत को पूरा करें। फिर इसमें किसी की इजाजत की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। अगर कोई आपसे ऐसी अपेकषा रखता है तो वो गलत है आप नहीं। 
बात कीजिए-
ध्यान से सोचिए तो हर परेशानी का एक हल है बात करना। जब भी लगे कि कोई ऐसी बात है, जो आपके रिश्ते में दिक्कत कर सकती हैं। बात करने को अपना हल बनाइए। फिर चाहे पति हों, या सास। ससुर हों या देवर। हर बार अपनी बात सामने रखिए और दूसरों को भी बातचीत के लिए जगह दीजिए। 
याद रखना होगा-
महिला हैं सिर्फ इसलिए आपके पेरेंट्स अकेले नहीं रहने चाहिए। 
आपके पेरेंट्स ने भी आपको वैसे ही बड़ा किया है, जैसे आपके पति को पाला गया । 
जैसे आप अपने ससुराल में सबका ख्याल रखती हैं, वैसा ही ख्याल आपके पेरेंट्स भी चाहते हैं।
पेरेंट्स से मिलने का एक नियम बनाइए। ताकि कहीं कोई कमी न रह जाए और सबकुछ समय पर होता रहे। 
उनकी दवाइयों और दूसरी जरूरतों का ख्याल तभी रखा जा सकता है, जब सबकुछ नियम से किया जाए। 

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