भगवान विष्णु के दशावतार

Sudhir Joshi

4th June 2020

भारतीय के तीन मुख्य देवताओं में भगवान विष्णु को ब्रह्मांड निर्माता के रूप में मान्यता प्राप्त है। विष्णु के सृष्टि के उद्धार के लिए समय-समय पर अवतार लिए जिसे विष्णु के दशावतार के रूप मान्यता प्राप्त है।

भगवान विष्णु  के दशावतार

भगवान विष्णु के इसी अवतार को संयुक्त रूप से दशावतार नाम दिया गया है। भगवान विष्णु के अलग-अलग रूप में अवतार लेने को मानव पर आने वाले अधर्म के विनाशक के रूप में देखा जाता है, इसके पीछे की मूल धारणा यह है कि जब मानव अधर्म के दलदल में फंस जाता है तो भगवान उसकी रक्षा करने के लिए अवतार के रूप में सामने आते हैं. 

श्रीद्भागवतगीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि   

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 

अभ्युथानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे॥

इस श्लोक से इस बात की पुष्टि होती है कि भगवान मानव के उत्थान के अवतार लेते रहे हैं, ये अवतार अलग-अलग समय में मानव के हितों ने भगवान ने लिए। कभी विष्णु राम के रूप में सामने आए तो कभी कृष्ण तो कभी किसी अन्य रूप में सभी में उन्होंने जन कल्याण की भावना को ही समाज में प्रसारित किया है। भगवान के मान्यता प्राप्त दस अवतारों में मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध तथा कल्कि का समावेश है।   

पहले तीन अवतार, अर्थात् मत्स्य, कूर्म और वराह प्रथम महायुग में अवतिरत हुए। नृसिंह, वामन, परशुराम और राम त्रेतायुग में अवतरित हुए। कृष्ण और बलराम का अवतरण द्वापर युग में हुआ और आज के कलियुग में भगवान विष्णु मानव के उत्थान के लिए कल्कि रूप में अवतरित हैं। कुछ धार्मिक ग्रंथों के अनुसार  भगवान कृष्ण ही परमात्मा हैं और दशावतार कृष्ण के ही दस अवतार हैं; अतः उनकी सूची में कृष्ण नहीं बल्कि उनके स्थान पर बलराम होते हैं। कुछ लोग बलराम को एक अवतार मानते हैं, बुद्ध को नहीं। सामान्यतः बलराम को आदिशेष (विष्णु के विश्राम के आधार) का अवतार माना जाता है। दशावतार के बारे में अन्य विचारों में, कुछ लोग अवतारों के क्रम को युक्तिसंगत बनाने की कोशिश में, उन्हें विकासवादी  डार्विन  के सिद्धान्त से जोड़ते हैं। इस विचार के अनुसार अवतार जलचर से भूमिवास की ओर बढ़ते हुए क्रम में हैं,  फिर आधे जानवर से विकसित मानव तक विकास का क्रम चलते गया है। इस प्रकार दशावतार क्रमिक विकास का प्रतीक या रूपक की तरह है। कल्कि को विष्णु का दशम अवतार माना गया है। ऐसा माना जाता है कि कल्कि श्वेत घोड़े पर सवार हो मन्वंतर के अंत का कारण बनेंगे। वैसे संहार का कार्य तो शिव जी के हिस्से में आता है। 

दशावतारों का विवरण

1.मत्स्य अवतार. पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा इस प्रकार है- कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं, लेकिन उस मछली ने बोला- आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो राजा ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई।

राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुनकर साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से कहा- सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को लेकर उसमें बैठ जाना, जब तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा।

 उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग से बांध देना। उस समय प्रश्न पूछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से विख्यात है, तुम्हारे ह्रदय में प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है।

2. कूर्म अवतार. इस अवतार के बारे में यह कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने कूर्म का अवतार लेकर समुद्र मंथन के कार्य में अहम भूमिका अदा की थी। भगवान विष्णु के इस अवतार को कच्छप अवतार भी कहा जाता है। समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी एवं नागराज वासुकी को नेती बनाया गया था। देवताओं तथा दैत्यों ने मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की तरफ ले जाने लगे, लेकिन वे से उसे अधिक दूर कर नहीं ले जा सके. मंदराचल के नीचे कोई आधार न होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा, यह देखकर भगवान विष्णु ने विशाल कछुए का रूप धारण कर रुप धारण किया और मंदारचल के आधार बन गए। कछुए की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से धूमने लगा और समुद्र मंथन प्रक्रिया आसानी से पूरी हुई। 

 

3. वराह अवतार. विभिन्न धर्मग्रंथों अनुसार विष्णु का वराह अवतार की कहानी दैत्य हिरण्याक्ष से जुड़ी हुई है. हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को लेकर समुद्र में ले जाकर छिपा दिया था, उस वक्त ब्रह्मा जी के नाक से भगवान विष्णु वराह के रूप में प्रकट हुए. भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभा देवताओं तथा ऋषि मुनियों ने उनका नमन किया। सबके अनुनय विनय पर भगवान वराह ने पृथ्वी की खोज शुरु की. उन्होंने शीघ्र ही पृथ्वी का पता लगा लिया. विष्णु के इस वराह रूप ने समुद्र के अंदर प्रवेश करके अपने दांतों की सहायता से पृथ्वी को लेकर वे बाहर आए.  

 

4. नृसिंह अवतार. भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया। भगवान विष्णु के इस अवतार की कथा यह है कि दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु खुद को भगवान से भी ज्यादा बलवान मानता था। उसे यह वरदान मिला था कि मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु न दिन में, न रात में मौत के घाट नहीं उतार सकता. इतना ही नहीं उसे न आकाश में, न तो किसी अस्त्र शस्त्र से न मरने का वरदान प्राप्त था. हिरण्यकशिपु के राज्य में ऐसा प्रथा भी कि जो भी भगवान की विष्णु की पूजा करेगा, उसे कड़ा दंड दिया जाएगा. पिता के इस अत्याचार से उसका पुत्र प्रल्हाद बहुत दुखी था, उसने अपने पिता द्वारा प्रजा को दी जा रही यातनाओं को खत्म करने के लिए भगवान विष्णु सी पूजा आराधना की. प्रल्हाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परमभक्त था. जब प्रल्हाद के पिता को इस बात की जानकारी मिली कि प्रल्हाद भगवान विष्णु का परमभक्त है तो वे बहुत क्रोधित हुए और उसने प्रल्हाद से कहा कि वह भगवान विष्णु की आराधना करना छोड़ दे, लेकिन प्रल्हाद ने अपने पिता की बात नहीं माना, तो हिरण्यकशिपु ने प्रल्हाद को मौत की सजा सुनाने का फरमान जारी किया. हिरण्यकशिपु ने इस बार प्रल्हाद को मारने की कोशिश की लेकिन हर बार प्रल्हाद की जान बच गई. हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रल्हाद को लेकर धधकती आग में बैठ गई, लेकिन वहां भी चमत्कार हो गया, जिसे आग मे न जलने का वरदान प्राप्त था, वह होलिका जल गई और प्रल्हाद जिसे से मार डालने का प्रयास किया गया, वह उसको किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ, यह देखकर हिरण्यकशिपु स्वयं ही प्रल्हाद को मरने के लिए दौड़ा तभी भगवान विष्णु नृसिंह के रूप में एक खंभे से अवतरित हुए और उन्होंने अपने तीक्ष्ण नाखूनों से हिरण्यकशशिपु का वध कर दिया। 

5. वामन अवतार. सत्ययुग में प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। एक बार जब बलि महान यज्ञ कर रहा था, तब भगवान वामन बलि यज्ञ की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग जमीन दान में मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया, लेकिन बलि से फिर भी भगवान वामन को तीन पग धरती दान देने का संकल्प लिया. भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर एक पग में धरती और दूसरे पग में स्वर्ग लोक नाप लिया, जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने भगवान वामन को अपने सिर पर रखने को कहा। बलि से सिर पर पग रखने से वह सुतललोक तक पहुंच गए। बलि की दानवीरता को देखकर भगवान ने उसे सुतल लोक का स्वामी बना दिया.   

6. श्री राम अवतार. त्रेतान युग में राक्षसराज रावण का बहुत आतंक था, उससे देवता भी डरते थे, उनके वध के लिए भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के यहां माता कौशल्य के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु ने अनेक राक्षसों का वक्ष किया और मर्यादा का पालन करते हुए अपना जीवन-यापन किया। पिता के कहने पर वनवास गए। वनवास का काल पूरा करने के बाद राक्षसराज रावण ने उनकी पत्नी सीता का हरण किया. सीता की खोज में भगवान लंका पहुंचे, वहां भगवान श्री राम और रावण का घोर युद्ध जिसमें रावण मागा गया। इस तरह भगवान विष्णु ने राम अवतार लेकर देवताओं का भय मुक्त किया।

7. श्री कृष्ण अवतार. द्वापर युग में भगवान  विष्णु ने श्री कृष्ण अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया। भगवान श्री कृष्ण का जन्म जेल में हुआ था, इनके पिता का नाम वसुदेव और माता का नाम देवकी था। विष्णु का इस अवतार में बहुत से चमत्कार हुए। विष्णु ने कृष्ण अवतार में की मायावी राक्षसों का संहार किया। देवकी के भाई कंस का वध भी इसी अवतार में भगवान विष्णु ने किया था। महाभारत के युद्ध में भगवान कृष्ण अर्जुन के रथ के सारथी बने। इसी दौरान भगवान श्री कृष्ण को गीता का उपदेश भी दिया। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बनाकर श्री कृष्ण ने धर्म की प्रतिस्थापना की। भगवान विष्णु के इस अवतार को सभी अवतारों मे श्रेष्ठ माना गया है। 

8. परशुराम अवतार. हिंदू धर्मग्रथों के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के मुख्य अवतारों में एक थे. भगवान परशुराम के जन्म से जुड़ी दो कथाएं हैं,  भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है- प्राचीन समय में महिष्मती नगरी पर शक्तिशाली हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था। वह बहुत अभिमानी था और अत्याचारी भी। एक बार अग्निदेव ने उससे भोजन कराने का आग्रह किया। तब सहस्त्रबाहु ने घमंड में आकर कहा कि आप जहां से चाहें, भोजन प्राप्त कर सकते हैं, सभी ओर मेरा ही राज है। तब अग्निदेव ने वनों को जलाना शुरु किया। एक वन में ऋषि आपव तपस्या कर रहे थे। अग्नि ने उनके आश्रम को भी जला डाला। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने सहस्त्रबाहु को श्राप दिया कि भगवान विष्णु, परशुराम के रूप में जन्म लेंगे और न सिर्फ सहस्त्रबाहु का नहीं बल्कि समस्त क्षत्रियों का सर्वनाश करेंगे। इस प्रकार भगवान विष्णु ने भार्गव कुल में महर्षि जमदग्रि के पांचवें पुत्र के रूप में जन्म लिया।

9. बुद्ध अवतार. धर्म ग्रंथों के अनुसार बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध भी भगवान विष्णु के ही अवतार थे परंतु पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है।एक समय दैत्यों की शक्ति बहुत बढ़ गई। देवता भी उनके भय से भागने लगे। राज्य की कामना से दैत्यों ने देवराज इन्द्र से पूछा कि हमारा साम्राज्य स्थिर रहे, इसका उपाय क्या है। तब इन्द्र ने शुद्ध भाव से बताया कि सुस्थिर शासन के लिए यज्ञ एवं वेदविहित आचरण आवश्यक है। तब दैत्य वैदिक आचरण एवं महायज्ञ करने लगे, जिससे उनकी शक्ति और बढऩे लगी। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं के हित के लिए बुद्ध का रूप धारण किया। उनके हाथ में मार्जनी थी और वे मार्ग को बुहारते हुए चलते थे।इस प्रकार भगवान बुद्ध दैत्यों के पास पहुंचे और उन्हें उपदेश दिया कि यज्ञ करना पाप है। यज्ञ से जीव हिंसा होती है। यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते हैं।

 

10. कल्कि अवतार. धर्मग्रंथों के आधार पर भगवान विष्णु कलयुग में कल्कि के रूप में दर्शन लेंगे, इस तरह का उल्लेख किया गया है। उसी के अनुरुप वर्तमान में चल रहे कलयुग में कल्कि ने अवतार लिया है। इस अवतार में भगवान विष्णु वर्तमान कलयुग में भी पृथ्वी पर व्याप्त बुराइयों का शमन करने में लगे हुए हैं। यह अवतार भी राम, कृष्ण, बुद्ध जैसा ही है, लेकिन प्रकट रूप में नहीं है। किसी एक चेहरे के रूप में भगवान विष्णु के इस रूप को सामने नहीं लाया गया है, लेकिन कहा जा रहा है कि भगवान विष्णु का यह अवतार गुप्त रूप से मानव की रक्षा का काम कर रहा है। 

कुछ अन्य अवतार

उपरोक्त दस अवतारों के अलावा भगवान विष्णु के कुछ अन्य अवतार भी माने जाते हैं। उनका संक्षिप्त विवरण भी यहां प्रस्तुत है।

श्री सनकादि मुनि. धर्म ग्रंथों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया। ये चारों प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। ये भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं।

 

 नारद अवतार : धर्म ग्रंथों के अनुसार देवर्षि नारद भी भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से देवर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में देवर्षि नारद को भगवान का मन भी कहा गया है।  श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है- देवर्षीणाम्चनारद:। अर्थात देवर्षियों में मैं नारद हूं।

 

नर-नारायण  : सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए दो रूपों में अवतार लिया। इस अवतार में वे अपने मस्तक पर जटा धारण किए हुए थे। उनके हाथों में हंस, चरणों में चक्र एवं वक्ष:स्थल में श्रीवत्स के चिन्ह थे। उनका संपूर्ण वेष तपस्वियों के समान था। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने नर-नारायण के रूप में यह अवतार लिया था।

 

कपिल मुनि  : भगवान विष्णु ने पांचवा अवतार कपिल मुनि के रूप में लिया। इनके पिता का नाम महर्षि कर्दम व माता का नाम देवहूति था। शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह के शरीर त्याग के समय वेदज्ञ व्यास आदि ऋषियों के साथ भगवा कपिल भी वहां उपस्थित थे। भगवान कपिल के क्रोध से ही राजा सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गए थे। भगवान कपिल सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं। कपिल मुनि भागवत धर्म के प्रमुख बारह आचार्यों में से एक हैं।

 

दत्तात्रेय अवतार  : धर्म ग्रंथों के अनुसार दत्तात्रेय भी भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है-एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पातिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया। भगवान ने इनका अंहकार नष्ट करने के लिए लीला रची। उसके अनुसार एक दिन नारदजी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूइया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं। तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बताई और उनसे कहा कि वे अनुसूइया के पातिव्रत्य की परीक्षा लें।

 तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधु वेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूइया से भिक्षा मांगी मगर यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी। अनुसूइया पहले तो यह सुनकर चौंक गई, लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और बोला कि यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छ:-छ: मास के शिशु हो जाएं, ऐसा बोलते ही त्रिदेव शिशु होकर रोने लगे। तब अनुसूइया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया और पालने में झूलाने लगीं। जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई। तीनों देवियां अनुसूइया के पास आईं और क्षमा मांगी। तब देवी अनुसूइया ने त्रिदेव को अपने पूर्व रूप में कर दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

 

यज्ञ : भगवान विष्णु के सातवें अवतार का नाम यज्ञ है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान यज्ञ का जन्म स्वायम्भुव मन्वन्तर में हुआ था। स्वायम्भुव मनु की पत्नी शतरूपा के गर्भ से आकूति का जन्म हुआ। वे रूचि प्रजापति की पत्नी हुई। इन्हीं आकूति के यहां भगवान विष्णु यज्ञ नाम से अवतरित हुए। भगवान यज्ञ के उनकी धर्मपत्नी दक्षिणा से अत्यंत तेजस्वी बारह पुत्र उत्पन्न हुए। वे ही स्वायम्भुव मन्वन्तर में याम नामक बारह देवता कहलाए।

 

भगवान ऋषभदेव  : भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में आठवांं अवतार लिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार महाराज नाभि की कोई संतान नहीं थी। इस कारण उन्होंने अपनी धर्मपत्नी मेरुदेवी के साथ पुत्र की कामना से यज्ञ किया। यज्ञ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने महाराज नाभि को वरदान दिया कि मैं ही तुम्हारे यहां पुत्र रूप में जन्म लूंगा।

 वरदान स्वरूप कुछ समय बाद भगवान विष्णु महाराज नाभि के यहां पुत्र रूप में जन्मे। पुत्र के अत्यंत सुंदर सुगठित शरीर, कीर्ति, तेल, बल, ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणों को देखकर महाराज नाभि ने उसका नाम ऋषभ (श्रेष्ठ) रखा।

 

 आदिराज पृथु  : भगवान विष्णु के एक अवतार का नाम आदिराज पृथु है। धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वायम्भुव मनु के वंश में अंग नामक प्रजापति का विवाह मृत्यु की मानसिक पुत्री सुनीथा के साथ हुआ। उनके यहां वेन नामक पुत्र हुआ। उसने भगवान को मानने से इंकार कर दिया और स्वयं की पूजा करने के लिए कहा। तब महर्षियों ने मंत्र पूत कुशों से उसका वध कर दिया। तब महर्षियों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिससे पृथु नाम पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथु के दाहिने हाथ में चक्र और चरणों में कमल का चिह्न देखकर ऋषियों ने बताया कि पृथु के वेष में स्वयं श्रीहरि का अंश अवतरित हुआ है।

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

भगवान विष्णु...

भगवान विष्णु के 10 अवतारों की महिमा है अद्भुत...

Gl ban 65w

क्यों मनाते हैं दीवाली?

भगवान विष्णु...

भगवान विष्णु से जुड़ी रोचक कहानियां

पंच पर्वों क...

पंच पर्वों का महापर्व दीपावली

पोल

आपको कैसी लिपस्टिक पसंद है

वोट करने क लिए धन्यवाद

मैट

जैल

गृहलक्ष्मी गपशप

रम जाइए 'कच्...

रम जाइए 'कच्छ के...

गुजरात का कच्छ इन दिनों फिर चर्चा में है और यह चर्चा...

घट-कुम्भ से ...

घट-कुम्भ से कलश...

वैसे तो 'कुम्भ पर्व' का समूचा रूपक ज्योतिष शास्त्र...

संपादक की पसंद

मां सरस्वती ...

मां सरस्वती के प्रसिद्ध...

ज्ञान की देवी के रूप में प्राय: हर भारतीय मां सरस्वती...

लोकगीतों में...

लोकगीतों में बसंत...

लोकगीतों में बसंत का अत्यधिक माहात्म्य है। एक तो बसंत...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription