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नुकसान का दुख

ग्रहलक्ष्मी टीम

17th June 2020

नुकसान का दुख

सब कहते हैं कि जब मैं छोटी थी तो बड़ी शरारती थी। हर दिन कोई न कोई शिगुफा सामने आता ही था। ऐसे ही एक दिन मैं अपने भाई यश के साथ 'भूत-भूत' खेल रही थी। भूत दिखने के लिए चॉक से पूरा मुंह सफेद करने के बाद मुझे एक खुराफात सूझी। मैंने दादी के नकली दांतों का सेट धोकर मुंह में लगा लिया, ताकि असली भूत दिखूं। जैसे ही भैया ने मुझे इस रूप में देखा तो वह बुरी तरह डर गया। उसे डरते देख मेरी हंसी छूट गई और एक झटके से नकली दांतों की बत्तीसी जमीन पर आ गिरी। गिरते ही वह टूट गई, फिर तो जबरदस्त डांट पड़ी। मार से तो बच गई, पर नुकसान होने का दुख भी हुआ। खैर बचपन तो होता ही ऐसा है।

2- शर्बत की जगह भांग पी
यह बात तब की है, जब मेरी उम्र 12-13 साल थी। उस दिन होली थी। मैं अपने दोस्तों के साथ होली खेलता हुआ आस-पड़ोस मेंं घूम रहा था। एक मंदिर के बाहर कुछ लोग शर्बत बांट रहे थे। मुझे भी एक-दो लोगों ने शर्बत पीने को कहा तो मैंने एक गिलास शर्बत ले लिया। शर्बत बेहद स्वादिष्ट था और उसमें काजू-बादाम भी खूब डले हुए थे। मेरा मन और हुआ तो मैंने 3-4 गिलास और पी लिया। घर पहुंचते-पहुंचते तो वह शर्बत अपना रंग दिखाने लगा। दरअसल उस शर्बत में भांग मिली हुई थी और नादानी में मैंने छक कर पी ली थी। जब मैं घर पहुंचा तो पड़ोस में डेक पर तेज आवाज में 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली...' गीत बज रहा था। बस फिर क्या था। मैंने उस गीत पर नाचना शुरू किया तो फिर रुकने का नाम ही नहीं लिया। घरवाले मुझे सड़क पर पागलों की तरह नाचता देखकर हैरान रह गए। बाद में तो पिताजी ने वह मार लगाई कि उस दिन के बाद से किसी भी तरह के नशे को गलती से भी नहीं छुआ। आज भी होली आने पर घरवाले 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली...' गीत गाकर मुझे छेड़ते हैं।

3- मैं मम्मी बनना चाहती हूं

बात तब की है, जब मैं 5 साल की थी। उस उम्र के अन्य बच्चों की तरह मैं भी बहुत भोली थी। पापा ने मेरा एडमिशन एक स्कूल में करवा दिया था। एक दिन मेरी टीचर कक्षा में पढ़ने वाले सभी बच्चों से एक-एक कर ये सवाल कर रही थीं, 'बड़े होकर तुम क्या बनना चाहते हो?'
अपनी-अपनी इच्छानुसार सभी बच्चे अलग-अलग जवाब दे रहे थे। किसी का जवाब 'डॉक्टर' था तो किसी का 'इंजीनियर'। जब टीचर ने यही सवाल मुझ से किया तो मैंने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, 'टीचर, मैं बड़ी हो कर मम्मी बनना चाहती हूं।'
मेरा जवाब सुनकर टीचर अपनी मुस्कुराहट नहीं रोक सकी और उन्होंने प्यार से मुझे अपनी गोद में उठा लिया। आज भी जब मुझे वह घटना याद आती है तो मेरे होंठों पर हंसी तैर जाती है।

सब कहते हैं कि जब मैं छोटी थी तो बड़ी शरारती थी। हर दिन कोई न कोई शिगुफा सामने आता ही था। ऐसे ही एक दिन मैं अपने भाई यश के साथ 'भूत-भूत' खेल रही थी। भूत दिखने के लिए चॉक से पूरा मुंह सफेद करने के बाद मुझे एक खुराफात सूझी। मैंने दादी के नकली दांतों का सेट धोकर मुंह में लगा लिया, ताकि असली भूत दिखूं। जैसे ही भैया ने मुझे इस रूप में देखा तो वह बुरी तरह डर गया। उसे डरते देख मेरी हंसी छूट गई और एक झटके से नकली दांतों की बत्तीसी जमीन पर आ गिरी। गिरते ही वह टूट गई, फिर तो जबरदस्त डांट पड़ी। मार से तो बच गई, पर नुकसान होने का दुख भी हुआ। खैर बचपन तो होता ही ऐसा है।

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