आषाढ़ी एकादशी: भगवान विष्णु की आराधना और चौमासे की शुरुआत

चयनिका निगम

22nd June 2020

एकादशी से जुड़ा खास पर्व है आषाढ़ी एकादशी। इस दिन के बाद अगले चार महीने तक माना जाता है कि भगवान विष्णु आराम करते हैं।

आषाढ़ी एकादशी: भगवान विष्णु की आराधना और  चौमासे की शुरुआत
आषाढ़ी एकादशी। ये वो पर्व है जो आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित इस पर्व को कई और नाम भी दिए गए हैं, जैसे देवशयनी एकादशी, हरिशयनी और पद्मनाभा एकादशी। ये एकादशी अक्सर साल के जून या जुलाई महीने में ही मनाई जाती है। लेकिन आषाढ़ी एकादशी मनाने से पहले ये जानना जरूरी है कि एकदशी पर्व में होता क्या है और इसमें भी आषाढ़ी एकादशी कैसे खास है। इस साल 1 जुलाई को मनाई जाने वाली आषाढ़ी एकादशी से जुड़ी कई और बातें जान कर भगवान विष्णु के भक्त जरूर उनकी महिमा को थोड़ा और समझ पाएंगे। चलिए इस पर्व के बारे में जान लेते हैं- 
चंद्र मास की तिथि-
एकादशी चंद्र मास की ग्यारहवीं तिथि होती है और हर चंद्र मास में दो एकादशी होती हैं। एक शुक्ल पक्ष में पड़ती है तो दूसरी कृष्ण पक्ष में। इन्हीं में से एक एकादशी होती है आषाढ़ी एकादशी। ये आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष को मनाई जाती है। 
विष्णु का शयन काल-
ये एक ऐसी तिथि है, जब माना जाता है कि भगवान विष्णु अपने शयन काल में जाते हैं। वो भी अगले चार महीनों के लिए। इस दिन से भगवान विष्णु अगले चार महीने के लिय क्षीरसागर में आराम करते हैं। यही वजह है कि इस तिथि को हरिशयनी  एकादशी भी कहा जाता है। इस समय को चौमासा भी कहते हैं।
पीला रंग और पूजा विधि-
इस पूजा के लिए नहान के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा का षोडशोपचार पूजन करना होगा। इस दौरान सब कुछ पीला रखने की कोशिश करें, जैसे पीले कपड़े, पीला चंदन और पीले फूल भी। अब भगवान को पान और सुपारी अर्पित करें। अब धूप, दीप भी जलाएं। इसके बाद आरती करें और ब्राह्मणों को खाना खिला कर खुद फलाहार ग्रहण करें। 
शुभ कार्य वर्जित होंगे-
आषाढ़ी एकादशी के पर्व से ही विष्णु जी शयनकाल में चले जाते हैं। वो अगले चार महीने तक निद्रा में रहते हैं इसलिए इस दौरान कोई भी शुभ काम वर्जित होता है। चार महीने बाद जब भगवान विष्णु निद्रा से जागते हैं तो उस तिथि को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। 
आषाढ़ी एकादशी से जुड़ी मान्यता-
एकादशी के इस पर्व से जुड़ी एक कथा भी प्रचलित है। इसके अनुसार सतयुग में मान्धाता नाम के राजा के राज्य में हर ओर खुशहाली थी। लेकिन फिर कई सालों तक वर्षा न होने की वजह से जनता बहुत परेशान हो गई। इस दिक्कत से छुटकारा पाने के लिए राजा एक बार जंगल की ओर गए और फिर अंगिरा ऋषि से भी मिले। ऋषि ने राजा को देवशयनी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। राजा ने पूरे विधि विधान से ऐसा किया भी और फिर वर्षा हुई। राज्य में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई। 
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