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प्रारंभ का अंत

grihlaxmi team

24th June 2020

A story

प्रारंभ का अंत

प्रारंभ का अंत

वीरेंद्र शान्त खड़ा था, अचला कह रही थी - - मैंने तुम्हे कभी प्यार नहीं किया था, तुम्हारी तरफ देख क्या लिया ,तुम-से बात क्या कर ली- - तुमने उसे प्यार समझ लिया? और मुझे बदनाम कर बैठे।

          देखो मैं किसी की स्त्री हूँ, और मेरे पति (अरूण )स्वस्थ भी हैं, सुन्दर भी ,और योग्य भी, साथ ही वह मुझे प्यार करते हैं और मैं भी जीवन की समस्त भावनाओं से उन्हें प्यार करती हूँ ," रिश्ते अगर आदर में बने रहें तो उनकी खूबसूरती बनी रहती है।" यह कह, अचला वहाँ से चली गई ।

         वीरेंद्र ने जब आँखे ऊपर की तो अचला जा चुकी थी ।वह वहीं धम से बैठ गया ।

         वीरेंद्र सोचने लगा और उस दिन को याद करने लगा ,कि जब वह एमए प्रीवियस की परिक्षा का अन्तिम पेपर करके लौटा था तो उसके पडौस में नये किरायेदार आ बसे थे, नाम था अरूण, उनकी पत्नी का नाम था अचला ,उसे बहुत दिनो बाद पता चला था ।धीरे-धीरे पडौसियों से घनिष्ठता बढ़ी,एक दूसरे के घर आना जाना हुआ।

         एक दिन वीरेंद्र ने अचला से कहा, " आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।" तब अचला का जवाब था, 

"मुझ से अच्छी तो शहर में और बहुत सी मिल जायेगी।"

       "पर जब पास ही मिले तो दूर जाने की क्या आवश्यकता है।"

 अचला ने कहा, "सम्बन्धो की डोर बहुत कोमल होती है, आपको मेरे लिए ऐसी भावना नहीं रखनी चाहिए , मैं किसी की पत्नी हूँ कृपया कर आप यहाँ से चले जाए।" इतना कह अचला चुप हो गई थी ।

 वीरेंद्र कह तो गया, लेकिन अचला की नाराजगी देख चुप चाप वापिस चला गया, कि कहीं बात बिगड़ न जाए।

       अरूण ने पडौसी के लड़के  (वीरेंद्र )की हरकत उड़ते - उड़ते सुनी थी।

 आफिस से घर आने पर अचला से पूछा, "वीरेंद्र ने कभी तुमसे कुछ कहा था? "

 अचला डर गई, कहाँ- - "हाँ"।

"तुमने मुझ से पहले क्यों नहीं कहा? 

 "क्या कहती? उस की वजह से मेरा आपका झगड़ा हो जाता, बच्चा था मैंने डाट दिया।

 'अरे 'बताना तो था !!

 इस तरह के लड़को को मैं बखूबी समझता हूँ, "उसे कभी घर में न घुसने दिया करो, दरवाजा बन्द रखा करो।"

 पति की चेतावनी के बाद, अचला दरवाजा बंद ही रखती ।एक दिन दोपहर में, वीरेंद्र- दरवाजा खुला देख कर  अचला के पास आया, अचला घर के कामों में व्यस्त थी ,कुछ आहट होने पर मुड़ी, वीरेंद्र को देखकर- - गुस्से से बोली, "कृपया कर आप यहाँ से चले जाए! "

 वीरेंद्र वक्त की नजाकत को देख चला गया ।

 अगले दिन, वीरेन्द्र ने दरवाजा खटखटाया।अचला ने यह सोच पता नहीं कौन है दरवाजा खोला, वीरेंद्र को देख अचला सकपका गई , और कहा - - तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहिए, मैं पहले भी कई बार कह चुकी हूँ?

     "केवल एक मिनट अपने आप को देख लेने दो, अभी चला जाऊँगा ।"

  इस प्रकार वीरेंद्र रोज कोई न कोई बहाने से आने लगा और अचला नाराजगी दिखाती रही ।

           एक दिन अरूण बहुत खुश -खुश घर आया,   उसकी एक ऊँचे पद पर प्रमोशन हो गई थी ,उसने अचला से कहा,अचला भी बहुत खुश थी,  इस खुशी में दोनो शाम के समय पिक्चर देखने गए।

          अगले दिन अरूण की तबियत कुछ ठीक नहीं थी , आफिस से जल्दी उठ शाम होने से पहले ही घर पहुंच गया। दरवाजा खटखटाया दरवाजा नहीं खुला,अचला यह सोच वीरेंद्र होगा बैठी रही ,अरूण के फोन पर ,"अरे क्या हम बाहर ही खड़े रहेगें ,अचला भागी आई और दरवाजा खोला ,आप इतनी जल्दी- - ,वो तबियत ठीक नहीं ।कुछ समय बाद,अरूण' ने 'अचला' से पूछा "उस दिन से वीरेंद्र यहाँ आया तो नहीं? 

       बात का उत्तर ना देकर,अचला ने कहा - - "आपकी तबियत अब कैसी है ?"अभी ठीक नही, इधर - उधर की बातो में बात आई गई हो गई थी।

        कई दिनो बाद, वीरेंद्र अचानक अंदर पहुँचा तो देखा मेड किचन में काम कर रही थी , और अचला कमरे में बाल बना रही थी।उसने एक क्षण कुछ सोचा और बडी फुर्ती से अचला को अपने बाहुपाश में जकड़ लिया।

                 अचला सकपका गई और सोच में पड़ गई, फिर शरीर की पूरी ताकत लगा कर उसे पीछे धकेल कर, भाग कर एक कमरे में चली गई ,दरवाजा बंद कर  अंदर से चटकनी लगा दी।

             वीरेंद्र अपनी इस हरकत से बुरी तरह घबरा गया, वह बाहर आया,उसने अपने घर जाना ठीक न समझा और अपने किसी मित्र के यहाँ चला गया,रात में भी वहीं रहा।बिस्तर पर लेटे - लेटे सीलिंग फेन को निहारता रहा "उसे डर था, कि वह पति से कह देगी?"रात भर करवट बदलता रहा, नींद नहीं आई अजीब सी बेचनी थी,अपने दिल की बात अपने मित्र को बताई भी, मन हल्का न हुआ?रात आँखो में ही कट गई।

             अपने मन मैं सोचने लगा, पता नहीं क्यूँ मुझ से इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई? क्यूँ नहीं मैं अपने आप को कंट्रोल कर पाया?अचला को देख कर पता नही मुझे क्या हो जाता है ?खुद से सवाल करता रहा।               रोज की तरह अरूण जब घर आया तो देखा, अचला कुछ डरी - डरी सी,परेशान है।अरूण के पूछने पर अचला ने डरते  कहा, "आज वीरेंद्र आया था।"

  'क्या?'

 डरते हुए - - 'हाँ '- - मेड काम कर रही थी, दरवाजा पूरी तरह से बंद नहीं था , वह सीधा कमरे में घुस आया और मुझे बाहों मे भर लिया।

 उसकी ये मजाल! ! ! 

       मैंने धकेल कर अपने आप को उसकी गिरफ्त से छुड़ाया और कमरे में जाकर अंदर से दरवाजा बंद कर दिया,"यह बात तुम मुझे मेरे पूछने पर बता रही हो? तुमने मुझे पहले से क्यूँ नही बताया? 

          "आपको गुस्सा आ जाता, फिर आप खाना भी नहीं खाते।

        "किसी स्त्री के साथ यह घटना उसके पति के लिए, बहुत बड़ी बात है।"

       "उसकी यह मजाल, आज मैं उसे छोडूंगा नहीं।"

 नहीं आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे? 

 उस के पिता से कह देना, और आप भी डाट देना, वर्ना लोग सुनेंगे तो, "मुझ पर ऊँगली उठेंगी ।"

        अगले दिन वीरेंद्र जब घर पहुंचा तो, उसके पिता ने उसे बहुत मारा, अरुण ने भी अपना डर बैठाया।

 कहा, "मैं तुम्हारे पिता की बहुत इज्जत करता हूँ, वर्ना मैं तुम्हे पुलिस के हवाले कर देता।"

"तुम शरीफ लोगो के बीच में रहने योग्य नहीं।"

 "वीरेंद्र ने सब कुछ सहा, वह इस हालत के लिए खुद दोषी था,गरदन झुका कर खड़ा रहा।

 माँ ने तो यह तक कह दिया, "मरे वह तेरी चाची के बराबर है।"

 "आसानी से मिलने वाली वस्तु हमें पसंद नहीं आती, और जो प्रयास करने पर भी नहीं मिलती, हम और लालायित हो उठते हैं ।

 इस घटना से वीरेंद्र का प्यार अचला के प्रति और बढ़ गया।अब वह चिलचिलाती धूप में अपनी ऊपर की छत पर सिर्फ अचला को देखने के लिए खड़ा रहता,माँ बाप बेटे की इस दीवानगी को देख कर बहुत भड़के।

           अचला भी वीरेंद्र का यह रूप देखकर सहम गई , उसने अपने आप को घर मे कैद कर लिया।

         गर्मी के दिन थे, घर में कमरे का पंखा काम नहीं कर रहा था, अरूण ने आफिस जाते समय इलैक्ट्रिशियन को कम्प्लेंट लिखा दी थी, अचला गर्मी की वजह से परेशान थी, बार - बार पसीना पौंछ रही थी ,डोर बैल होने पर सोचा, कि इलैक्ट्रिशियन होगा, उठी,पसीना पौछते - पौछते दरवाजा खोला, वीरेंद्र को देख कर चौंक गई और कहा, "अब क्या है? क्यूँ परेशान कर रहे हैं? 

        "तुम्हे उस दिन मेरी शिकायत नहीं करनी चाहिए थी।"

        "यदि शिकायत न करती तो तुम और आगे बढ़ जाते- - ,फायदा? "

वीरेंद्र ने कहा, "तुम्हे देख लेने से मन ठीक हो जाता है।"

 "यह सब उम्र का जोश है, इसी प्रकार कहा करते हैं, आज तुम्हारी शादी हो जाए तो यहाँ आकर भी ना झांकों।"

 "मैं नहीं जानती , कि इन बातों के लिए दोषी कौन है?हो सकता है, मैं ही हूँ, क्योंकि मेरे पति दिन भर आफिस में रहते थे, सारे दिन ऊब कर, मैने तुमसे हँसना - बोलना चाहा था, परन्तु तुम गलत समझे! मैंने तुम्हे देवर बनाना चाहा था, तुम पति बनने दौड़ पड़े ।मैं इस से खुश नहीं, आगे बढ़ने की कोशिश मत करना।   "कृपया कर आप यहाँ से चले जाए।"

      ज्योंही वीरेंद्र गया, फिर डोर बैल हुई, अचला सोचने लगी, फिर आ गया वीरेंद्र? जैसे ही दरवाजा खोला, सामने अरूण को पाया, "अचला डर गई, डरते - डरते पूछा, आज आप इतनी जल्दी कैसे आ गए?

 तुम्हारा ख्याल आ गया, तुम बोर होती होंगी,चलो कहीं घूम आते हैं,अरूण और अचला ने अच्छे से एन्जॉय किया।

समय अपनी रफ्तार से बीतता गया, वीरेंद्र ने अपनी पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में अच्छी तनख्वाह पर नौकरी मिल गई।

          लेकिन जिंदगी में एक कमी हमेशा खलती थी, वो थी अचला।।लाख कोशिश के बाद भी वीरेंद्र अचला को नहीं भूल पाया।

         अगले दिन फिर दरवाजा खुला देख, वीरेंद्र अचला के लिए एक बहुत सुंदर साड़ी खरीद कर ले गया।साड़ी देखते ही अचला रोष पूर्वक बोली, "देखो वीरेंद्र यह बचपना यहाँ मत करो, इसे फौरन यहाँ से ले जाओ"

 "मेरा दिल दुखेगा, तुम्हे यह रखनी पड़ेंगी।"

 "मैं इसे छूने की भी नहीं।"

 "इन्कार मत करो, मेरा दिल से लाया हूँ! !

  "मेरे पास एक से एक सुन्दर साडि़यां हैं।"

  मैं जानता हूँ, होंगी! !लेकिन यह तोहफा समझ कर रख लो।

 नहीं!!

 वह कुछ कहना चाहता था, मगर उसकी आवाज सीने में दबी रह गई, वह कुछ कह न पाया और साड़ी छोड़, बाहर की ओर चला गया।

 अचला आवाज में जोर देकर बोली, "यह इसी तरह पड़ी रहेगी, इसका नतीजा अच्छा न होगा।"

 वीरेंद्र वापिस नहीं आया?

 वीरेन्द्र के जाने के बाद , अचला ने देखा, साड़ी अच्छी थी।परन्तु उसे कोई चाह न थी।उस के पास एक से एक सुंदर साड़ियाँ थी।

           अरूण के आने में थोड़ी देर थी, पति को शब्दों में बताने की हिम्मत नहीं थी, अचला ने अरूण को पत्र लिखा - - - ।

 अरूण, "तुम्हे सब कुछ बता कर भी न बता सकी, वीरेंद्र अब भी आता है, वीरेंद्र को मैंने एक बच्चा ही समझा और कोई भावना,मेरे हृदय में कभी नहीं हुई? आज एक साड़ी लाया था, मैंने नहीं रखी तो छोड़कर चला गया ।

 यह गल्ती मुझ से हुई, इस गल्ती के लिए क्षमा चाहती हूँ, आप उसे साड़ी वापिस कर दीजिएगा।

                               अचला 

 शाम को अरूण आते ही बोला, "अचला तैयारी करो।

 क्यों- - ? क्या हुआ- - ? इतनी जल्दी में क्यूँ हो- - ? 

अरे, प्रमोशन के बाद तो ट्रांसफर होना ही था, जबलपुर की पोस्टिंग मिली है, वक्त बहुत कम है, आज रात की गाड़ी से ही जाना होगा, बस एक कप चाय दे दो, फिर मैं बाजार जा कर कुछ जरूरी सामान ले आता हूँ, तुम पेकिंग कर लो, फटाफट करो ।

      अरूण के चले जाने के बाद, अचला ने पत्र को फाड़ कर जला दिया, साड़ी उठा कर ऊपर छत की स्लेब पर रखी ,और सीढ़ियाँ उतर ,सामान पेकिंग में जुट गई, फिर एकाएक ख्याल आया, एक बार ऊपर छत की ओर नजर की ,आँखे नम हो गई ,सोचने लगी ,इस प्रारंभ के अंत को।

मधु गोयल(गाजियाबाद)

 

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