विविधताओं से भरा भारतीय  नववर्ष 

Sudhir Joshi

26th June 2020

विविधताओं से भरे हमारे देश भारत में त्योहारों की तरह नववर्ष भी एक नहीं बल्कि अनेक हैं। चैत्रीय नवरात्र का पहला दिन भारतीय नववर्ष का शुभारंभ का दिन होता है।

विविधताओं से भरा भारतीय  नववर्ष 

हिन्दू नव वर्ष का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। ब्रह्मपुराण के अनुसार पितामह ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि निर्माण का शुभारंभ किया था, इसलिए यह सृष्टि का प्रथम दिन है, इसकी काल गणना बहुत पुरानी है। सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया, इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम के राज्याभिषेक का दिन भी यही है। शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन भी इसे ही माना जाता है। सिखों के दूसरे गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने भी इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया था। सिंध प्रांत के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार भगवान झूलेलाल भी इसी दिन प्रगट हुए थे। राजा विक्रमादित्य की तरह शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने के लिए भी इस दिन को ही चुना था। वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही माना जाता है, जो  उमंग, प्रसन्नता, उल्लास, आनंद को जीवन में पुष्प के सुंगध की तरह भर देता है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं, अर्थात् किसी भी कार्य का आरंभ करने के लिए दिन बहुत शुभ होता है।   

हिन्दू नव वर्ष अंग्रेजी माह के मार्च अप्रैल में पड़ता है। इसी कारण भारत मे सभी शासकीय और अशासकीय कार्य तथा वित्त वर्ष भी अप्रैल (चैत्र) मास से प्रारम्भ होता है। चैत्र के महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को सृष्टि का आरंभ हुआ था। हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शुरू होता है। इस दिन ग्रह और नक्षत्र मे परिवर्तन होता है। हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होती है। पेड़-ऌपौधों में फूल, मंजर,कली भी इस वक्त से आना शुरू होते हैं, पूरे वातावरण में एक नई उमंग का संचार होता है, जो मन को आनंद से भर देता है। चैत्र मास का वैदिक नाम है मधु मास। मधु मास अर्थात आनंद बांटती वसंत का मास। फसलों की कटाई भी इसी समय होती है। घर में शादी हो या फिर कोई और शुभ कार्य सभी कुछ हिन्दू कैलेंडर या पंचांग देखकर ही किए जाते हैं। 

अलग-अलग प्रांतों के नववर्ष

 

विभिन्न प्रांतों में नववर्ष की तिथियां अलग-अलग हैं और ये तिथियां मार्च, अप्रैल में ही होती हैं। चैत्र नवरात्र के दिन महाराष्ट्र में नववर्ष मनाते हैं जिसे गुडी पाडवा कहते हैं जो इस बार 25 मार्च को मनाया जाएगा। पंजाब में नया साल बैसाखी के रूप में 13 अप्रैल को मनाया जाता है, जबकि सिख नानकशाही कैंलेंडर के अनुसार पंजाब के नए साल की तिथि 14 मार्च बतायी जाती है, इसे वहां के लोग होला मोहल्ला के रूप में मनाते हैं। तेलुगू समाज के लोग भी मार्च, अप्रैल के बीच ही अपना नया वर्ष मनाते हैं। आंध्रप्रदेश में उगादी के रूप में नया वर्ष मनाया जाता है। उगादी पर्व चैत्र माह के पहले दिन मनाया जाता है। इस लिहाज से महाराष्ट्र का नववर्ष और आंधप्रदेश का नव वर्ष के मुर्हूत की तिथि एक ही है। तमिलनाडु में पोंगल के रूप में नया साल 15 जनवरी के दिन मनाया जाता है, इसी दिन सूर्य आराधना का पर्व मकर संक्रांति भी मनाया जाता है। देश के सबसे सुंदर राज्य के रूप में मान्यता प्राप्त कश्मीर का नववर्ष नवरेह के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व कश्मीर कैलेंडर के अनुसार 19 मार्च को मनाया जाता है। सिंधी समाज के लोग चेटी चंद के रूप में नया साल मनाते हैं। चित्रैय तिरूविजा के रूप में मदुरै के लोग अपना नववर्ष मनाते हैं, राजस्थान के मारवाडी लोग दीप पर्व दीपावली को नए वर्ष के रूप में मनाते हैं, जबकि गुजराती लोग दीपावली के दूसरे दिन नया साल मनाते हैं। जैन समाज के लोगों का नया साल भी दीपावली का दूसरा दिन ही होता है।

पंचांग की रूपरेखा

सूर्य तथा चंद्रमा की स्थिति के अनुसार भारतीय कैलेंडर संचालित होता है। दरअसल सभी भारतीय कैलेंजर पंचांग पर आधारित हैं। पंचांग को देखकर ही कैलेंडर तैयार किए जाते हैं, उसी आधार पर पर्व की तारीख निर्धारित की जाती है। भारतीय कैलेंडर की महत्ता इसलिए भी सबसे ज्यादा क्योंकि दुनिया के लगभग सभी देश भारतीय कैलेंडर को ही आधार बनाकर अपने कैलेंडरों का निर्माण करते हैं। भारतीय राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में सबसे पहले पंचांग का निर्माण हुआ। साल में 12 माह तथा सप्ताह में सात दिन का निर्धारण भी विक्रमादित्य के काल में ही हुआ। भारतीय पंचांग की नकल करके यूनानियों ने उसे विश्व के अलग अलग देशों में नई साज सज्जा के साथ फैलाया। 

जानकारों का तो यह भी दावा है कि विक्रम संवत पंचांग या कैलेंडर की सबसे प्राचीन अवधारणा नहीं है, इससे कई हजार वर्ष पहले भी संवत् अस्तित्व में था। विक्रम संवत् से पहले सप्तर्षि संवत् अस्तित्व में था। सप्तर्षि संवत किस आधार पर अस्तित्व में आया था, इसका कोई आधिकारिक प्रमाण तो नहीं है, लेकिन कुछ लोगों का दावा है कि सप्तर्षि संवत् का विधिवत शुभारंभ 2100 ईसा पूर्व में हुआ जबकि कुछ लोग इसका शुभारंभ 6800 ईसा पूर्व मानते हैं। विक्रम संवत का ही दूसरा नाम नव संवत्सर है। ये संवत्सर पांच तरह के बताए गए हैं और इनके नाम हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन तथा अधिकमास। विक्रम संवत को इन पांचों में अलग से उल्लेख नहीं किया गया है। विक्रम संवत के उद्भव को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। ज्यादातर विद्वान इसका शुभारंभ 57 इस्वी पूर्व मानते हैं।

भारत में नव वर्ष की अलग अलग तिथियां क्यों हैं, अगर सवाल उठे तो उसका उत्तर में यही बताना सबसे ज्यादा सटीक होगा कि देश के आधे हिस्से में नव वर्ष चंद्रमा के आधार पर मनाया जाता है तो शेष भारत में नव वर्ष सूर्य के आधार पर मनाया जाता है। इस आधार यह कहना गलत नहीं कि भारत में नववर्ष की तिथि का निर्धारण चंद्रमा तथा सूर्य की स्थितियों के आधार पर किया गया है।  

प्राचीन काल में जिस कैलेंडर को मान्यता थी, वह देववाणी यानि संस्कृत में बनाया गया था। वर्ष के बारह माह के नाम राशि के चिन्हों के नाम पर रखे गए थे। हर नक्षत्र में सूर्य की स्थिति के अनुसार माह के नामों की व्यवस्था की गई। चूंकि कैलेंडर संस्कृत में बनाया गया था तो उनके नाम भी संस्कृत के शब्दों के अनुरूप रखे गए। आमतौर पर चंद्र पर नववर्ष का शुभारंभ 20 मार्च से होता है। चंद्र कैलेंडर के अनुसार वर्ष के जो नाम रखे गए हैं, वे हैं चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण (सावन), भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन। जब पूर्णिमा का चांद चित्रा के करीब जाता है तो वह चंद्र कैलेंडर का पहला माह होता है। 

कुल मिलाकर अगर यह कहा जाए कि भारतीय पर्वों की तरह ही भारतीय नववर्ष विविधताओं से भरे हैं, तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा। 

 

 

 

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