शक्तिपीठों का इतिहास और दुर्गा-पूजा

Niraj Gupta

26th June 2020

दुर्गा-पूजा में शक्तिपीठों की उपासना अतुल्य फलदायक मानी जाती है। मार्च-अप्रैल के मध्य आने वाले चैत्र नवरात्र तथा सितम्बर-अक्टूबर में आने वाले शारदीय नवरात्रों में भक्तगण किसी न किसी शक्तिपीठ में जाकर देवी उपासना का पुण्य-फल प्राप्त करते हैं। नवरात्र के अवसर पर शक्तिपीठों के विषय में जानकारी तथा इनके इतिहास के विषय में संक्षिप्त विवरण देना प्रासंगिक है।

शक्तिपीठों का इतिहास और दुर्गा-पूजा

51 शक्तिपीठों के संदर्भ में यह कथा प्रचलित है कि पुरातनकाल में माता जगदम्बिका ने दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के रूप में जन्म लिया और भगवान शिव से विवाह किया। परन्तु दक्ष अपने दामाद शिव को हमेशा निरादर भाव से देखते थे। एक बार उन्होंने कनखल (हरिद्वार) में एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, परन्तु जान-बूझकर भगवान शिव को निमन्त्रण नहीं भेजा। देवी सती को पता चला तो वह भी अपने पिता के घर जाने लगीं। भगवान् शिव ने उन्हें समझाया कि बिना बुलाए जाना उचित नहीं परन्तु सती जिद करके यज्ञ में शामिल होने चली गईं। यज्ञ-स्थल पर दक्ष सती के सामने ही भगवान् शिव के विषय में अपमानजनक बातें करने लगे। इस अपमान से आहत हुई सती ने वहीं यज्ञ-कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी।

भगवान् शिव को जब इस घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। उनके आदेश पर उनके गण वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य गणों ने यज्ञ विध्वंस कर दिया। फिर सती के वियोग से दग्ध भगवान् शिव ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कर कंधे पर उठा लिया और सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करते हुए उन्मत्त होकर तांडव नृत्य करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो गयी। तब देवताओं के अनुनय-विनय पर भगवान विष्णु ने भगवान् शिव का आवेश समाप्त करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड कर धरती पर गिरा दिया। इस प्रकार जहां-जहां सती के अंग, वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए।

इस प्रकार अस्तित्व में आए ये पवित्र तथा जागृत शक्तिपीठ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न स्थानों पर स्थापित हैं, जिनकी संख्या देवी भागवत में 108 तथा तन्त्र चूडामणि में 52 बतायी गयी, वहीं देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। किंतु परंपरागत तौर पर 51 शक्तिपीठ ही मान्य हैं। 

पूर्वोत्तर तथा पूर्वी भारत में स्थित शक्तिपीठ

1.त्रिपुर सुंदरी

यह शक्तिपीठ त्रिपुरा के उदरपुर के निकट राधाकिशोरपुर गांव में स्थित है, जहां माता सती का दायां पैर गिरा था।

2.कामाख्‍या शक्तिपीठ

असम के गुवाहाटी जिले में स्‍थित नीलांचल पर्वत (कामगिरि) पर माता की योनि (जननांग) गिरी थी, जहां कामाख्या शक्तिपीठ स्थित है। निकट ही ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य उमानंद द्वीप पर भगवान् शिव का मंदिर है।

3.जयंती शक्तिपीठ

यह शक्तिपीठ मेघालय की जयंतिया पहाड़ी पर स्थित है, जहां माता की बाईं जंघा गिरी थी। 

4.किरीट शक्तिपीठ

यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के हुगली नदी तट के जिसका नाम लाल बाग कोट है, वहां स्थित है यहां माता का मुकुट गिरा था।

5.बहुला शक्तिपीठ

पश्चिम बंगाल के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता का बायां हाथ गिरा था। 

6.युगाद्या शक्तिपीठ

पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के महाकुमार-मंगलकोट थानांतर्गत क्षीरग्राम में स्थित है युगाद्या शक्तिपीठ, जहां माता सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था।

7.नलहाटी शक्तिपीठ

पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में जहां माता की उदरनली गिरी थी, नलहाटी शक्तिपीठ स्थित है। 

8.वक्रेश्वर शक्तिपीठ

यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के जिला बीरभूम में स्थित है। यहां पर सती का 'मनÓ गिरा था।

9.नंदीपूर शक्तिपीठ

बंगाल के बीरभूम जिले में बोलपुर के सैन्थया रेलवे जंक्शन के निकट एक वटवृक्ष के नीचे स्थित देवी मंदिर नंदीपुर शक्तिपीठ है। यहां माता के गले का हार गिरा था। 

10.विभाष शक्तिपीठ

पश्चिम बंगाल के जिला पूर्वी-मिदनापुर में जहां माता के बाएं टखने गिरे थे, वहां स्थित है विभाष शक्तिपीठ। 

11.अट्टहास शक्तिपीठ

यह पश्चिम बंगाल के लाबपुरा में स्थित है यहां माता का निचला होठ गिरा था। इसे अट्टहास शक्तिपीठ कहा जाता है। 

12.काली शक्तिपीठ

ऌपश्चिम बंगाल में कोलकाता के कालीघाट में माता को दाएं पांव का अंगूठा छोड़कर 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यह शक्ति पीठ हुगली नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। 

13.रत्नावली शक्तिपीठ

इस स्थान पर माता का दायां कंधा गिरा था, मान्यता है कि बंगाल के हुगली जिले के खानाकुल-कृष्णानगर मार्ग पर रत्नावली शक्तिपीठ स्थित है।

14.त्रिस्तोता शक्तिपीठ

त्रिस्तोता (त्रिश्रोता) शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है, जहां माता का वामपाद (बायां चरण) गिरा था। 

15.विरजा क्षेत्र उत्कल

विरजा क्षेत्र, उत्कल शक्तिपीठ ओडिसा के पुरी एवं याजपुर में माना जाता है। यहां माता की नाभि गिरी थी। 

16.मिथिला शक्तिपीठ

भारत-नेपाल की सीमा पर मिथिला में माता का बायां कंधा गिरा था। परन्तु इसके सटीक स्थान को लेकर तीन स्थानों में मत भिन्नता है। नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा में इसका स्थान माना जाना जाता है।

17.मगध शक्तिपीठ

बिहार की राजधानी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी मंदिर को भी शक्तिपीठ माना जाता है, जहां माता की दाहिनी जंघा गिरी थी। स्थानीय भाषा में इसे 'पटनदेवी' कहते हैं। 

18.वैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ

झारखण्ड के गिरिडीह जनपद स्थित देवघर में वैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ है, जहां माता सती का हृदय गिरा था। शिव का वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग भी यहीं है। मान्यतानुसार यहां सती का दाह-संस्कार हुआ था।

19.श्रीपर्वत शक्तिपीठ

इस स्थान पर माता सती के 'दक्षिण तल्प यानी दायीं कनपटी का निपात हुआ था। परन्तु इसकी स्थिति को लेकर विद्वानों में मतान्तर है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह पीठ लद्दाख में स्थित है, जबकि कुछ इसे असम के सिलहट में मानते हैं।

20.कश्मीर, महामाया शक्तिपीठ

कश्मीर के पहलगांव जिले में अमरनाथ गुफ़ा के भीतर 'हिम' शक्तिपीठ है। यहां माता सती का 'कंठ' गिरा था।

21.ज्वालामुखी शक्तिपीठ

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में धर्मशाला के समीप माता सती की जिह्वा गिरी थी। इस शक्तिपीठ को ज्वालाजी कहते हैं, (जहां अग्नि के रूप में हर समय ज्वाला धधकती रहती है।)

22.जालंध्र शक्तिपीठ 

पंजाब के जालंधर छावनी के पास शहर के केंद्र में देवी तालाब है, जहां माता का बायां वक्ष (स्तन) गिरा था। यह मंदिर मां त्रिपुरमालिनी देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है।

23.भद्रकाली शक्तिपीठ

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में 'द्वैपायन सरोवर' के पास माता का दाहिना चरण गिरा था। इस शक्तिपीठ को 'श्रीदेवीकूप भद्रकाली पीठ' के नाम से जाना जाता है।

24.कात्यायनी शक्तिपीठ

उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले के वृंदावन तहसील में माता के बाल के गुच्छे गिरे थे। मथुरा-वृन्दावन के 'भूतेश्वर मंदिर' के प्रांगण में यह शक्तिपीठ स्थित है।

25.विशालाक्षी शक्तिपीठ

उत्तरप्रदेश के काशी में मणिकर्णिक घाट पर माता के 'कर्णमणि' (दाहिने कान की बाली) गिरे थे। वाराणसी में विश्वेश्वर के निकट मीरघाट पर विशालाक्षी का मंदिर ही शक्ति पीठ है।

26.प्रयाग शक्तिपीठ

उत्तरप्रदेश के प्रयागराज (पूर्ववर्ती इलाहबाद) के संगम तट पर माता के हाथ की अंगुली गिरी थी। लेकिन स्थान को लेकर कुछ मतभेद है, यह अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों पर गिरा माना जाता है।

27.रामगिरि शक्तिपीठ 

उत्तरप्रदेश के चित्रकूट के पास रामगिरि पर्वत पर माता का दायां स्तन गिरा था। इस शक्तिपीठ की स्थिति को लेकर भी मतांतर है, कुछ लोग इसकी स्थिति चित्रकूट-धाम में मानते हैं, तो कुछ लोग मैहर, मध्य प्रदेश, के 'शारदा मंदिर' को शक्तिपीठ मानते हैं। 

28.पंचसागर शक्तिपीठ

पंचसागर शक्तिपीठ में माता सती के अधोदन्त (निचले दांत) गिरे थे। इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु कुछ विद्वानों का मत है कि यह शक्तिपीठ उत्तरप्रदेश में वाराणसी के पास स्थित है।

29.मणिवेदिका शक्तिपीठ

राजस्थान के अजमेर में पुष्कर तीर्थ में सरोवर के एक ओर पर्वत की चोटी पर 'सावित्री मंदिर' और दूसरी ओर मणिवेदिका शक्तिपीठ स्थित है जिसे 'गायत्री मंदिर' के नाम से जाना जाता है, जहां सती की 'कलाइयां' गिरी थीं।

30.विराट शक्तिपीठ

राजस्थान, जयपुर में स्थित महाभारतकालीन विराट नगर के ध्वंसावशेष के निकट 'भीम की गुफा' है। यहीं के वैराट गांव में यह शक्तिपीठ स्थित है, जहां सती के दायें पांव की उंगलियां गिरी थीं। 

31.कालमाधव शक्तिपीठ

मध्यप्रदेश के अमरकंटक के कालमाधव में शोण नदी के पास माता का बायां नितंब गिरा था। इस शक्तिपीठ का निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है।

32.शोणदेश शक्तिपीठ

मध्यप्रदेश के अमरकंटक जिले में स्थित नर्मदा मंदिर में शोण शक्तिपीठ है। यहां पर माता का दायां नितंब गिरा था। दूसरी मान्यतानुसार बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मंदिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है। 

33.भैरवपर्वत शक्तिपीठ

मध्यप्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के तट के पास भैरव पर्वत पर माता के ऊपरी ओष्ठ गिरे थे। ऐसी भी मान्यता है कि गुजरात के जूनागढ़ जिले में गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का ऊर्वओष्ठ गिरा था। अत: दोनों स्थानों पर शक्तिपीठ की मान्यता है। 

34.उज्जयिनी शक्तिपीठ

उज्जैन स्थित हरसिद्धि मंदिर ही उज्जयिनी शक्तिपीठ है, जो पावन क्षिप्रा नदी के दोनों तटों पर/रुद्रसागर के निकट स्थित है। इस स्थान पर माता सती की कोहनी का निपात हुआ था।

35.अंबाजी शक्तिपीठ

गुजरात के जूनागढ़ में स्थित सोमनाथ मंदिर के प्रभास-क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। यहां गिरनार पर्वत के शिखर पर अंबाजी का मंदिर ही शक्तिपीठ है।

36.करवीर शक्तिपीठ

महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित 'महालक्ष्मी' अथवा 'अम्बाबाई का मंदिर' वह शक्तिपीठ है, जहां माता के त्रिनेत्र गिरे थे। देवीगीता में उल्लेख मिलता है कि वर्तमान कोल्हापुर ही पुराण प्रसिद्ध करवीर क्षेत्र है। 

37.जनस्थान शक्तिपीठ

महाराष्ट्र, नासिक के स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का 'चिबुक' (ठुड्डी) गिरा था। 

38.सर्वेशेल या गोदावरीतीर

आंध्रप्रदेश के राजामुंद्री क्षेत्र स्थित कब्बूर में गोदावरी नदी के तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ जहां पर माता के बाया कपोल (गाल) गिरा था। 

39.श्री शैल शक्तिपीठ  

हैदराबाद, आंध्रप्रदेश के कुर्नूल के पास है श्री शैल शक्तिपीठ, जहां माता सती की 'ग्रीवाÓ का निपात हुआ था। 

40.कांची शक्तिपीठ

कांची शक्तिपीठ तमिलनाडु के कांचीपुरम् में स्थित है, जहां माता का 'कंकालÓ गिरा था। कांची मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में से भी एक मानी जाती है। 

41.कण्यकाश्रम कन्याकुमारी (मतांतर से ऊर्ध्वदत)

तमिलनाडु के कन्यकाश्रम में माता की पीठ गिरी थी। कन्याकुमारी तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर, एवं बंगाल की खाड़ी के संगम-स्थल पर स्थित है यह शक्तिपीठ। 

42.शुचींद्रम शक्तिपीठ

तमिलनाडु के कन्याकुमारी में तीन महासागरों के संगम स्थल पर शुचीन्द्रम (शुचितीर्थम) शक्तिपीठ है, वहां माता के उर्ध्वदंत ऊपरी दांत गिरे थे। 

विदेश स्थित शक्तिपीठ

 

43.गुह्येश्वरी शक्तिपीठ

नेपाल के पशुपतिनाथ स्थित इस शक्तिपीठ में माता सती के दोनों घुटने गिरे थे। 'पशुपतिनाथ मंदिर से थोड़ी दूर बागमती नदी की दूसरी ओर 'गुह्येश्वरी शक्तिपीठ' है। यह नेपाल की अधिष्ठात्री देवी हैं। 

44.गंडकी शक्तिपीठ

नेपाल में गंडकी नदी के उद्गमस्थल पर पोखरा नामक स्थान पर मुक्तिनाथ शक्तिपीठ स्थित है, जहां माता का दक्षिण कपोल गिरा था। 

45.मानस शक्तिपीठ

मानस (माणसा) शक्तिपीठ तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है, जहां माता सती की दाहिनी हथेली गिरी थी। 

46.लंका शक्तिपीठ

श्रीलंका में स्थित है लंका शक्तिपीठ, जहां माता के नुपुर गिरे थे। इसे इंद्रक्षी शक्तिपीठ भी कहते हैं। नैनातिवि (मणिप्लालम) नल्लूर में है। परन्तु उसका सटीक स्थान ज्ञात नहीं है।

47.हिंगलाज शक्तिपीठ

पकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में हिंगोस नदी के तट पर हिंगलाज शक्तिपीठ स्थित है, जहां माता का 'ब्रह्मरंध्र' (सिर) गिरा था। एक गुफा के भीतर जाने पर मां आदिशक्ति के ज्योति रूप के दर्शन होते हैं। 

48.सुगंधा शक्तिपीठ

बांग्लादेश के खुलना (शिकारपुर) में 'सुगंधाÓ (सोंध) नदी के किनारे स्थित है, 'उग्रतारा देवीÓ का शक्तिपीठ, जहां माता की नासिका गिरी थी। 

49.करतोया तट/घाट

यह शक्तिपीठ बांग्लादेश में भवानीपुर ग्राम के बेगड़ा में करतोया नदी के तट पर स्थित है। यहां देवी सती की बाईं पायल गिरी थी। 

50.यशोर शक्तिपीठ

बांग्लादेश के खुलना जिला के ईश्वरीपुर के यशोर (जैसोर) में माता की बायीं हथेली गिरी थी। 

51.चट्टल शक्तिपीठ

बांग्लादेश में जिला चटगांव के सीताकुंड स्टेशन के पास चंद्रशेखर पर्वत पर भवानी मंदिर है, जहां माता का दाहिना हाथ गिरा था। इसे चट्टल शक्ति पीठ कहते हैं। 

जैसाकि उक्त लेख में कई स्थानों पर स्पष्ट किया गया है, शक्तिपीठों की संख्या तथा कुछ शक्तिपीठों की स्थिति के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। अत: संभव है कि सटीक जानकारी के अभाव में कुछ ऐसे स्थानों का उल्लेख होने से रह गया हो, जिनकी मान्यता शक्तिपीठ के रूप में है। इसके लिए लेखक ऐसे पीठों की अधिष्ठात्री व श्रद्धालुजनों के प्रति हृदय से क्षमाप्रार्थी है। 

 

 

 

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