मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना 

Sarita Sharma

26th June 2020

हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नव वर्ष का आरंभ होता है और चैत्र नवरात्रि भी। चैत्र नवरात्रि में भी नौ दिन नौ देवियों की आराधना की जाती है।

मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना 

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवरात्रि यानि नौ रात्रियां, जिन्हें मां जगदम्बा के नौ रूपों की आराधना का श्रेष्ठï समय माना जाता है। नौ दिनों में तीन देवियों महालक्ष्मी, सरस्वती देवी व मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है जिन्हें 'नवदुर्गा' भी कहते हैं। ये नौ देवियां है-

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।

पूरे भारतवर्ष में नवरात्रि क्षेत्रानुसार अपने रीति-रिवाजों से मनाई जाती है। गुजरात में कलश- स्थापना कर के उसमें सुपारी, नारियल और चांदी का सिक्का रखने के पश्चात् उसमें दीपक भी जलाया जाता है। कलश में कई छेद भी होते है जिनमें से दीपक की रोशनी बिखरती रहती है। इस मौके पर लोग पारंपरिक गुजराती वेशभूषा में सज-धज कर गरबा और डांडिया खेलते हैं पंडालों को भव्य स्तर पर सजाया जाता है और महोत्सव के दौरान मां दुर्गा की पूजा की जाती है। 

पश्चिम बंगाल में नवरात्र के आखिरी पांच दिनों में दुर्गा पूजा की बहुत धूम रहती है। पण्डालों में अष्टभुजी देवी जोकि शेर पर विराजमान है, की भव्य मूर्ति बहुत ही आकर्षक होती है। मां का शेर धर्म का प्रतिनिधित्व करता है जबकि अस्त्र मन से नकरात्मकता दूर करने का संकेत करते हैं। पांच दिन पूजा के पश्चात् मां की मूर्ति को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। पंजाब में लोग सात दिनों तक फलाहारी या निराहार व्रत रखते हैं और आठवें दिन यानि अष्टमी को हलवा-पूरी और चने का प्रसाद बना कर कंजक-पूजन करते हैं व उन्हें प्रसाद के साथ यथाशक्ति भेंट या धन देते हैं और पूरे श्रद्धा-भाव से उन्हें घर से विदा करते हैं। यहां पर अष्टमी के साथ-साथ नवमी को भी कंजक-पूजन करने का रिवाज है।

हिन्दू धर्म में प्रचलित मान्यतानुसार चैत्र नवरात्रि के ऌप्रथम दिन मां दुर्गा का जन्म हुआ था और मां दुर्गा के आग्रह पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष भी शुरू होता है। चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन भगवान विष्णुजी ने मत्स्य रूप में पहला अवतार लेकर पृथ्वी की स्थापना की थी। इसके पश्चात् भगवान विष्णु का सातवां अवतार जो भगवान श्रीराम का है वह भी चैत्र नवरात्रि में हुआ था। वैज्ञानिक दृष्टि से भी नवरात्रों का अपना महत्त्व है ऋतु बदलने के साथ इंसान कई तरह के रोगों से घिर जाता है तब स्वस्थ रहने के लिए और तन-मन को निर्मल रखने के लिए की जाने वाली एक प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है। हमारे शरीर के नौ द्वार बताए गए हैं, शरीर तंत्र को पूरा वर्ष सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिनों तक मनाया जाता है। वस्तुत: नवरात्र अत: शुद्धि का पर्व है जिसका मूल उद्देश्य है- इंद्रियों पर संयम। आयुर्वेद कहता है कि जब हम व्रत रखते हैं तो कई चीजों से परहेज करते हैं ताकि हमारी पाचन-प्रणाली ठीक रहे। व्रत रखने का प्रयोजन यही है कि हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रख कर मस्तिष्क को केंद्रित कर सकें।

नवरात्रों में व्रत रखते समय कई बातों को जान लेना अति आवश्यक है और इन नियमों का पालन पूरी सख्ती से करना चाहिए-

वैसे तो पूरे नवरात्र व्रत रखे जा सकते हैं परन्तु अंतिम वाला व्रत जोड़े के रूप में रखना होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें व स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात् सूर्य को जल देना और फिर मां दुर्गा की पूरे विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।

इन दिनों में प्याज लहसुन व मांसाहार का सेवन पूर्ण रूप से वर्जित होता है। व्रत में व्रती को फल, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा सांवा चावल, आलू, सैंधा नमक, दूध से बनी वस्तुओं और घर का बना शुद्ध भोजन ही ग्रहण करने चाहिए। नवरात्रों में बाल व नाखून काटना वर्जित होता है। 

नवरात्र और दुर्गा सप्तशती का संबंध

 

नवरात्रों के आते ही सम्पूर्ण भारत में मां दुर्ग के भक्तों में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। भक्तजन पूरे नौ दिनो तक पूरी श्रद्धा और संपूर्ण पूजा-विधि के साथ व्रत रखते हैं। नवरात्रों में भी दुर्गा सप्तशती का पाठ पढ़ना और सुनना बहुत आवश्यक है क्योंकि इस पाठ का बहुत महत्त्व है। मां जगदम्बा का प्राकट्य संपूर्ण मानव जाति की रक्षा और दुष्टों का संहार करने के लिए हुआ। शक्ति के स्वरूप की आराधना के लिए नवरात्रों में श्री दुर्गा सप्तशती पाठ करने से भक्तजन की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। पहले नवरात्र को कलश स्थापना कर के और जौ बीज कर दुर्गा सप्तशती पाठ का संकल्प लिया जाता है। इस ग्रंथ में तेरह अध्याय हैं और हर अध्याय का पाठ करने का अलग-अलग फल मिलता है। मां दुर्गा द्वारा लिए गए अवतारों को इस पुस्तक में विस्तारपूर्वक वर्णित किया गया है।

श्री दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में दैत्य मधु-कैटभ की वध कथा, दूसरे अध्याय में देवताओं की तेज से मां दुर्गा का अवतरण व राक्षस महिषासुर की सेना का नाश तीसरे अध्याय में महिषासुर-वध, चौथे अध्याय में मां जगदम्बा की स्तुति व देवताओं को वरदान, पांचवें अध्याय में चंड-मुंड द्वारा शंभु दैत्यराज के सामने देवी की सुंदरता का बखान करने, छठे अध्याय में धूम्रलोचन वध, सातवें अध्याय में चंड-मुंड वध, आठवें अध्याय में रक्त बीज का वध, नौवें अध्याय में निशुम्भ वध, दसवें अध्याय में शुंभ वध, ग्यारहवें अध्याय में देवताओं द्वारा मां की स्तुति एवं वरदान, बारहवें अध्याय में देवी-चरित्र के पाठ की महिमा व स्तुति का वर्णन, तेरहवें अध्याय में राजा सुरथ व वैश्य को देवी जगजननी द्वारा वरदान देने का संपूर्ण विवरण है। दुर्गा सप्तशती में सात सौ श्लोकों के कारण इसे 'सप्तशती' कहा गया है। जिन्हें तीन भागों मे बांटा गया है नवरात्रों में इसके नियमित पाठ से मां प्रसन्न होती है और आप पर भरपूर कृपा बरसाती हैं।

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ शुरु करने से पहले मां दुर्गा कवच, कीलक स्तोत्र व अर्गला स्तोत्र विशेष रूप से पढ़ने का विधान है। मां दुर्गा कवच संसार के अठारह पुराणों में सबसे शक्तिशाली मार्कण्डेय पुराण का हिस्सा है। दुर्गा कवच मां दुर्गा का पाठ है जो हमें हिम्मत देता है। इस कवच में कुल सैंतालीस श्लोक हैं और अंत के नौ श्लोक फलश्रुति रूप में लिखित हैं। इसका अर्थ है कि ऐसा पाठ जिसे पढ़ने से भगवान का आशीर्वाद मिलता है। दुर्गा कवच में मां के अलग- अलग रूपों का वर्णन किया गया है जिसे पढ़ने या श्रवण करने से हमारी नकरात्मक शक्तियों का नाश होता है।

'प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। 

तृतीयं चंद्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं 

कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रिति महागौरीति चाष्टमम्। 

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:॥ 

ऐसे करें देवी वंदन

श्री दुर्गा सप्तशती में देवी कवच के पश्चात् अर्गला स्तोत्र पढ़ने का विधान है। बिना किसी बाधा के अपने कार्य की सिद्ध करने के लिए इस पाठ को करना जरूरी है। अर्गला स्तोत्र के सभी मंत्र सिद्ध हैं और भक्तजन सभी मंत्रों मे यह कामना करते हैं कि हे देवि हमें रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो। मनुष्य द्वारा अभिलाषित सभी कार्य अर्गला स्तोत्र के पाठ से पूरे होते हैं।

श्री दुर्गा सप्तशती में अर्गला स्तोत्र के उपरान्त 'कीलक स्तोत्र' का पाठ किया जाता है। नवरात्रों में इन सब के पश्चात श्री दुर्गा सप्तशती के अध्यायों को पढ़ा जाता है। 

दुर्गा सप्तशती में मां के पाठ को पढ़ने से यश, मान-सम्मान, सुख-समृद्धि, आयु में वृद्धि होती है क्योंकि 'दुर्गा' का अर्थ है- जीवन से दु:खों को हरने वाली मां। 

 

 

 

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