आस्था एवं संस्कृति को संजोते भारत के तीर्थ

Sanjay

26th June 2020

भारत भूमि सदियों से तीर्थ स्थली कहलाती आई है। तीर्थों की विविधता ने ही समूचे भारतवर्ष को एक सूत्र में बांध रखा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले तीर्थस्थल, हिंदू-मुस्लिम, सिक्ख व ईसाई श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बिंदु रहे हैं।

आस्था एवं संस्कृति को संजोते भारत के तीर्थ

पूरे भारत में रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार और भाषा के कारण विभिन्नता और विविधता पाई जाती है। इसी अंतर को तीर्थ की महत्ता ने मिटाया है। तीर्थभूमि के दर्शनों का संस्कार ही भारत के कोने-कोने में बसे भारतीयों को अपनी ओर खींचता है। इस प्रकार तीर्थ सांस्कृतिक एकता का जीता-जागता उदाहरण बन जाते हैं।

यदि दक्षिणेश्वर जाने वाला मां काली का भक्त, मां वैष्णों के दर्शन करने जाता है तो अमरनाथ जाने वाला तीर्थ यात्री रामेश्वरम् जाकर स्वयं को धन्य मानता है। तीर्थ किसी भी एक समुदाय, धर्म अथवा संप्रदाय के नहीं होते। उन पर प्रत्येक मनुष्य का समानाधिकार है। ये तीर्थ स्थल आज भी पूरे देश की आत्मा हैं, जिनके स्वर में आज भी जन-जन की वाणी ही मुखरित होती है।

शुरुआत करते हैं श्रीनगर की हसीन वादियों से जहां हजरत बल दरगाह मुसलमानों के लिए तीर्थस्थल से कम नहीं है। यहां हजरत मुहम्मद साहब की यादगार के रूप में उनका एक पवित्र बाल रखा गया है जिसे मू-ए-मुबारक के नाम से जाना जाता है। जम्मू शहर में रघुनाथ जी का भव्य मंदिर है। इस मंदिर में हिंदुओं के 33 करोड़ देवी-देवताओं को पिंडियों के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

श्रद्धा व आस्था का दूसरा नाम है मां वैष्णों का दरबार। जम्मू से कुछ दूर त्रिकूट पर्वत पर मां वैष्णों की पवित्र गुफा है। भक्तगण मां की जय-जयकार करते चौदह किलोमीटर की चढ़ाई पैदल पार कर लेते हैं। तीर्थ यात्री कोलकाता का हो अथवा मद्रास का, पंजाब का हो अथवा झारखंड का, सभी एक ही आस्था में रंग जाते हैं।

पवित्र शिवलिंग के दर्शन करने के इच्छुक भक्तगण प्राकृतिक आपदाओं को हंसते-हंसते झेलकर अमरनाथ पहुंच जाते हैं। अमरावती नदी में स्नान के पश्चात् बर्फ से बने शिवलिंग के दर्शन उनकी सारी पीड़ा हर लेते हैं।

पंजाब के पवित्र तीर्थ स्थल, सिक्खों के लिए तो पूजनीय हैं ही, दूसरे धर्मों के अनुयायी भी वहां मत्था टेकना नहीं भूलते। अमृतसर में सिक्खों का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है जिसे  'स्वर्ण मंदिर' कहा जाता है। स्वर्ण मंदिर के श्रद्धालुओं के जत्थे में आपको सभी धर्मों के अनुयायी कड़ाह प्रसाद लेते दिखाई देंगे।

आनंदपुर साहिब भी धार्मिक दृष्टि से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। यहीं पर गुरु गोविंद सिंह जी ने सबसे पहले पांच सिक्खों को अमृत छका कर खालसा पंथ की स्थापना की थी प्रतिवर्ष लाखों सिक्ख उस दिन की स्मृति में यहां उत्सव मनाते हैं।

कुरुक्षेत्र वह पवित्र भूमि है जहां महाभारत के युद्ध क्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर ताल में सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान करने का भी विधान है।

कुल्लू का दशहरा भी विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। कहते हैं कि रघुनाथ जी की मूर्ति अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। यहां दशहरा के मेले में स्थानीय देवी-देवताओं को पालकी में बिठा कर लाया जाता है। इस प्रकार सभी देवी-देवता एक ही स्थान पर एकत्र हो जाते हैं। भक्त और प्रभु का यह मिलन दृश्य सचमुच मनमोहक होता है।

भारत में अनेक स्थानों पर ऐसे अद्भुत मनोहारी मंदिर हैं जो पवित्रता एवं दिव्यता के प्रतीक तो हैं ही, साथ ही अपने उत्कृष्ट शिल्प के लिए भी जाने जाते हैं। माउंट आबू स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर सुंदर वास्तु शिल्प और संगमरमर की नक्काशी सबके लिए आकर्षण का केंद्र है।

पुष्कर तीर्थ में ब्रह्मा जी का पूजन होता है। पुष्कर मेले व स्नान के दौरान आने वाले तमाम तीर्थ यात्रियों की पंक्तियां इस बात का प्रमाण हैं कि तीर्थस्थलों की गरिमा आज भी ज्यों की त्यों है।

अजमेर को ख्वाजा साहब की दरगाह के लिए जाना जाता है। यह स्थान मुसलमानों के लिए तो पूजनीय है ही अन्य धर्मावलंबी भी उर्स में भाग लेने जाते हैं तथा मन्नतें मांगते हैं।

दिल्ली की भव्य जामा मस्जिद हो या गुरुद्वारा शीशगंज, लोटस टैंपल हो या बिड़ला मंदिर। सभी भारतीयों की श्रद्धा के केंद्र हैं। इन स्थलों पर आने वाले श्रद्धालु चाहें किसी भी प्रांत के क्यों न हों, उनकी प्रार्थना ईश्वर तक अवश्य पहुंचती है।

उत्तर भारत की नौ देवियां जितनी पावन हैं उतना ही स्नेह कोलकाता के दक्षिणेश्वर स्थित मां काली पाती हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में बौद्ध मठ तथा हिंदुओं के अनेक मंदिर हैं। असम की कामाख्या देवी तो शक्ति पीठ के नाम से जानी जाती हैं।

उत्तर प्रदेश का मथुरा-वृंदावन आज भी नटखट कान्हा की किलकारियों से गूंजता है। यहां राधा-कृष्ण के इतने भव्य मंदिर हैं जिनकी गणना देश के मनोहर मंदिरों में की जाती है। कहते हैं कि आज भी यहां अनेक स्थान ऐसे हैं जहां कान्हा गोपियों संग रास रचाते हैं। वृंदावन की गलियों में जिस भक्तिभाव से उत्तर प्रदेश के वासी आते हैं उसी श्रद्धा रूपी अमृत का पान दक्षिण भारतीय भी करते हैं।

उत्तरांचल की पावन भूमि पर गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ और केदारनाथ असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र बिंदु हैं। बर्फीली चोटियों पर प्राकृतिक आपदाएं सहते हुए वृद्धजन भी प्रभु के दर्शनों को जा पहुंचते हैं गंगोत्री, यहां गोमुख से गंगा निकलती हैं। यदि आप गंगा के दिव्य तथा महिमामयी रूप का दर्शन करना चाहें तो वह गोमुख में ही संभव है क्योंकि मैदानों तक आते-आते तो मोक्षदायिनी मैया का रूप हम ही विकृत कर देते हैं। गोमुख से निकली गंगा नदी अलकनंदा, मंदाकिनी व रामगंगा आदि नामों के साथ आगे बढ़ती हुई हरिद्वार पहुंचती है और पश्चिम बंगाल तक पहुंचते-पहुंचते हुगली बन जाती है। 

बदरीनाथ का मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और केदारनाथ में भगवान शिव विराजते हैं। यमुनोत्री से यमुना नदी निकलती है। श्रद्धालु खतरनाक यात्राएं करने से नहीं घबराते और मनोवांछित तीर्थ तक पहुंच ही जाते हैं।

दक्षिणी भारत वर्षों से भक्तजनों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर मंदिरों का शहर कहलाती है। यहां लिंगराज के मंदिर में लगभग नौ फुट ऊंचा शिवलिंग है। उड़ीसा राज्य का पुरी क्षेत्र श्री क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। पुरी की रथयात्रा में शामिल होने का अवसर भी किसी भाग्यशाली को ही मिलता है।

कर्नाटक के श्रावण बेलगोला में जैनियों का प्रमुख तीर्थस्थल है। यहां गोमटेश्वर की विशाल मूर्ति है जिसका महामस्तकाभिषेक बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। पूरे देश में प्रभु श्री कृष्ण के भक्त चाहे कहीं भी रहें वे उडुप्पी अवश्य जाते हैं। यहीं माधवाचार्य जी ने 13वीं शताब्दी में श्रीकृष्ण की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की थी।

सोमनाथ गुजरात राज्य के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। इसे बारह ज्योतिर्लिगों में एक माना जाता है। भारत के अंतिम पश्चिमी छोर पर बसी है द्वारिका। मथुरा से जाने के बाद श्रीकृष्ण ने द्वारिका में निवास किया था।

मंदिरों की पुण्य भूमि तमिलनाडु में ही रामेश्वरम है। कहते हैं कि श्री राम ने युद्ध का आरंभ करते समय इसी स्थान पर पुल बनाया था। तमिलनाडु के तीर्थों में चिदंबरम का नाम भी भक्तिभाव से लिया जाता है यहां शिवमंदिर में शिवलिंग के स्थान पर नटराज की मूर्ति विराजमान है। तमिलनाडु का प्रसिद्ध वैष्णव मंदिर है श्रीरंगनाथ। इसका गर्भगृह सात घेरों के बीच स्थित है। शैय्या पर लेटे विष्णु जी के विग्रह का दर्शन मन को परम शांति प्रदान करता है।

कन्याकुमारी में देवी का मंदिर है। यहां हमारे बापू का एक स्मारक भी है क्योंकि उनके अवशेष समुद्र में प्रवाहित करने से पहले यहीं रखे गए थे।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक की इस तीर्थ यात्रा में हम न जाने कितने पावन तीर्थ स्थलों का नाम तक नहीं ले पाए किंतु एक बात पूरी तरह सत्य है कि भारत-भूमि के कण-कण में तीर्थ बसे हैं। इसी माटी की महक ने सभी भारतवासियों को एकता का पाठ पढ़ाया है। हम निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि भारत के पुण्य तीर्थ शताब्दियों से अनेक धर्मों, भाषाओं व जातियों के प्रेरणा स्रोत रहे हैं तथा रहेंगे।

 

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