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लाॅकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा

Anuja Kapoor

25th June 2020

घरेलू हिंसा हमेषा से हमारे समाज की जड़ों में षामिल रही है, लेकिन लाॅकडाउन की वजह से मामले बढ़े हैं। ऐसे हालात में महिला और बच्चे इस हिंसा के ज्यादा षिकार हो रहे हैं। सोषल डिस्टेंसिंग और घरों में ही बंद रहना कोविड-19 महामारी से बचाव के लिए प्रमुख कारक हैं, लेकिन इससे षोशण करने वालों को भी अवसर मिल रहे हैं।

लाॅकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा

मौजूदा समय में घरेलू हिंसा के मामले कोविड-19 वायरस के प्रसार को सीमित करने के लिए किए गए सुरक्षा उपायों और प्रतिबंधों के कारण बढ़ रहे हैं। प्रतिदिन अनेकों काॅल मिलने के बाद आपात केंद्रों और संबद्ध प्राधिकरणों ने घरेलू हिंसा के मामलों में भारी तेजी का पता लगाया है। अधिकारियों के अनुसार, उन्हें विवाहित और अविवाहित महिलाओं, दोनों से षिकायतें प्राप्त हुई हैं। न सिर्फ विवाहित महिलाओं को अपने पति या ससुराल पक्ष द्वारा दुव्र्यवहार का सामना करना पड़ रहा है बल्कि अविवाहित महिलाओं को भी अपने भाइयों और पिता के दुव्र्यवहार का षिकार होना पड़ रहा है। महिलाओं को तब कुछ राहत मिलती थी जब वे किसी काम से बाहर जाती थीं या उनके पति/भाई या पिता बाहर होते थे। लेकिन मौजूदा समय में लाॅकडाउन ने उन्हें अपने घर की चारदीवारी में कैद करके रख दिया है जिससे उनके लिए घरेलू हिंसा की चुनौती बढ़ गई है।

 

महिलाएं ही नहीं, बच्चे भी घरेलू हिंसा से प्रभावित हुए हैं। स्कूल, खेल के मैदान, पार्क, सार्वजनिक स्थान बंद होने से उनके पास कहीं जाने का कोई विकल्प नहीं रह गया है। बच्चे घरों में रहने को बाध्य हैं और उनके सामने सुरक्षा का इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं रह गया है। कोरोनावायरस से पहले, ये स्थान ऐसे सुरक्षित विकल्प थे जहां बच्चे घर पर की जाने वाली आक्रामकता से बच सकते थे। अब वे घरों में ही कैद रहते हैं और पहले की तुलना में ज्यादा घरेलू हिंसा का षिकार हाते हैं। लंबे समय तक एक ही स्थान पर साथ रहने से बच्चों और महिलाओं पर घरेलू हिंसा के ज्यादा मामले सामने आने की चिंता बढ़ गई है।

 

महिलाओं और बच्चों को सिर्फ षारीरिक हिंसा का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है बल्कि उनके साथ अन्य तरह का षोशण भी हो रहा है, जैसे

 

  • घर पर परिवार के सदस्यों से पूरी तरह अलग रहना
  • फोन पर दोस्तों या परिचितों के साथ बात नहीं करना
  • लोगों की नियमित निगरानी, सख्त नियमों एवं षर्तों का पालन करना
  • भोजन, पानी, कपड़े, स्वच्छता सुविधाएं जैसी जरूरी चीजें मुहैया कराने पर निगरानी रखना

 

घर पर रहने और कुछ नहीं करने का तनाव, वित्तीय समस्याओं और षराब के अभाव से घरेलू हिंसा के कारणों में इजाफा हो रहा है। घरेलू हिंसा की षिकार ज्यादातर महिलाएं लाॅकडाउन की वजह से अपने पिता या संबंधी के घर भी नहीं जा सकती हैं। सरकार या आपात सेवा केंद्र उन्हें सिर्फ षरण स्थलों में पहुंचा सकते हैं जहां संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा है, क्योंकि वहां बड़ी तादाद में लोग रहते हैं और स्वच्छता संबंधी समस्या देखने को मिलती है। सिर्फ महिला को ही ऐसे हालात के साथ तालमेल क्यों बिठाना पड़ता है? यदि पुरुश अवसाद में है या उसे षराब नहीं मिल रही है, तो सिर्फ उसे ही महिला के बजाय षरण स्थल भेजे जाने की जरूरत है। इस तरह के हंगामे पुरुश करता है जबकि महिला को इसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

 

घरेलू हिंसा के बारे में सबसे बड़ी धारणा यह रही है कि इससे संबंधित मामले पिछड़े क्षेत्रों या गरीब तबकों में ज्यादा देखने को मिलते हैं, बल्कि असली तस्वीर काफी अलग है। घरेलू हिंसा की बात हो तो मध्य वर्ग की महिला या समाज के अमीर तबके का प्रतिषत लगभग समान है। महिलाएं अपने पति के खिलाफ षिकायत दर्ज कराने से डरती है क्योंकि उन्हें यह डर होता है कि यदि उनके पति को गिरफ्तार किया गया तो उन्हें उसके छूटकर वापस आने पर ज्यादा षर्मिंदगी और हिंसा का सामना करना पड़ेगा। ससुराल वाले भी उसकी पीड़ा को बढ़ाते हैं।

 

सरकार इस वायरस को फेलने से रोकने के लिए कई कदम उठा रही है और दूसरी तरफ घरेलू हिंसा के षिकार हो रहे लोगो की सुरक्षा के लिए कोई कदम नही उठाया जा रही है। सरकार इस लाॅकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के भुक्तभोगियों को बचाने के लिए रणनीति बनाने में विफल रही है। लोगो को घरेलू हिंसा के बढ़ते खतरे के प्रति सजग रहना चाहिए, नजर रखने वालांे और पड़ोसियों को भी कुछ संदिग्ध दिखने पर सतर्कता दिखानी चाहिए। ऐसी स्थिति में दरवाजा खटखटा सकते हैं या घंटी बजा सकते हैं। यदि उन्हें किसी मामले की रिपोर्ट कराने के लिए चुना जाता है तो उन्हें गुमनामी का लाभ भी प्रदान किया जाना चाहिए। कोविड-19 की वजह से आइसोलेषन ने भी सभी तरह के सेवा नेटवर्को को प्रभावित किया है, जिससे भुक्तभोगियों को मदद लेना या खराब स्थिति से निकलना मुष्किल हो गया है। यदि कोई टेक्स्ट मैसेज, काॅल या ईमेल के जरिए षिकायत दर्ज कराने में विफल रहता है तो ग्रोसरी स्टोर, मेडिकल स्टोर, डिलिवरी एक्जीक्यूटिव जैसे जरूरी सेवा प्रदाताओं को ऐसे लोगो के लिए जरूरी सहायता मुहैया करानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर उनका संदेष संबद्व अधिकारियों तक पहुचाना चाहिए।

 

घरेलू हिंसा या तनाव का व्यक्ति की मांसिक स्थिति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए षांत रहना और दूसरों से मदद तलाषना बेहतर है। अभी या बाद में लाॅकडाउन समाप्त होगा लेकिन इसके नतीजे के तौर पर षोशण का जोखिम बढ़ जाएगा। षोध के अनुसार ऐसी स्थिति में अपराधियों द्वारा अपने जीवनसाथी या दूसरे की हत्या करने या हमले करने की आषंका बढ़ जाती है, जब वे रोजगार समाप्त होने या किसी बड़े वित्तीय झटके जैसे संकटों से जूझते हैं। इस तरह के हालात में, घबराहट, गुस्सा, निराषा और चिंता की भावनाओं को लेकर सतर्क रहने की आवष्यकता होगी। यदि लोग यह सुनिष्चित कर सकते हों कि ये समस्याएं बढ़ रही हैं तो यह समय घर में सुरक्षित क्षेत्रों और संबंध के स्वीकार्य नियमों को तलाषने के लिए उचित है। छोटे-मोटे विवाद से स्वयं को अलग रखें जिससे कि यह छोटी बात ज्यादा बढ़ न जाए।

 

एक अच्छे नागरिक के तौर पर हम महामारी के प्रसार को रोकने के लिए सभी नियमों और कदमों का पालन कर रहे हैं, लेकिन यह सुनिष्चित करना भी हमारी समान रूप से जिम्मेदारी है कि घरेलू हिंसा के अंधेरा बहुत ज्यादा बढ़ न जाए। हमें ऐसे मामलों को आगे बढ़ने से रोकना होगा। क्योंकि कोविड-19 महामारी की वजह से आर्थिक प्रणाली प्रभावित हो रही है और ऐसी समस्याएं ज्यादा मजबूत हो जाएंगी। ये समस्याएं बरकरार हैं। ऐसे में सरकार को यह सुनिष्चित करना चाहिए कि सुरक्षा सहायता उपलब्ध हो, और घरेलू हिंसा के भुक्तभोगियों की मदद के लिए जरूरी संसाधन मुहैया कराए जाएं। जब तक यह महामारी बनी रहती है तब तक महिलाओं और बच्चों की जिंदगी को भी खतरे में पड़ने से बचाने की जरूरत होगी।

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