मैंने किसी को थप्पड़ नहीं मारा - तापसी पन्नू

ग्रहलक्ष्मी टीम

25th June 2020

बॉलीवुड एक्ट्रेस तापसी पन्नू ने अपनी एक्टिंग और दमदार फिल्मों से सबका दिल जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। 'गेम ओवर', 'मिशन मंगल' जैसी फिल्में करने के बाद तापसी पन्नू ने फिल्म 'थप्पड़' से एक बार फिर दर्शकों के दिल में जगह बना ली है। गृहलक्ष्मी के लिए तापसी से खास मुलाकात की अर्पणा यादव ने।

मैंने किसी को थप्पड़ नहीं मारा - तापसी पन्नू

बिना किसी गॉडफादर/मदर के बॉलीवुड में कदम रखना कितना मुश्किल भरा रहा?
जब मैंने बॉलीवुड में अपना पहला कदम रखा था तब मुझे पता नहीं था कि इस इंडस्ट्री के लिए गॉडफादर का होना जरूरी है, क्योंकि इस प्रोफेशन के बारे में मुझे कोई आईडिया नहीं था। लेकिन थोड़े दिनों बाद ही मुझे इस बात का अहसास हो गया था कि अगर गॉडफादर या कोई सपोर्ट होता तो शायद सफर में आसानी होती, क्योंकि बिना किसी सपोर्ट के इस इंडस्ट्री में गुजारा करना मेरे लिए मुश्किल भरा था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इसको डील कैसे करूं? क्योंकि मुझे लगता था कि अगर मैं बोल कर गुस्सा निकालूंगी या फिर अंदर ही अंदर घुटती रहूंगी तो प्रॉब्लम मेरे साथ ही होगी। मैं डर-डर कर लाइफ खराब नहीं करना चाहती थी और न ही मुझे अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाना था, इसलिए मैंने डिसाइड किया कि मैं इसको रूल ऑफ द गेम बना कर सॉल्व करुंगी और मेरा ये निर्णय मेरे लिए सही साबित हुआ। ऐसा नहीं है कि आज मुझे प्रॉब्लम फेस नहीं करनी पड़ती। आज भी काफी फिल्में और रोल हैं, जिससे मुझे निकाल दिया जाता है, क्योंकि उनका कोई और फेवरेट होता है या फिर किसी और का कॉल आ जाता है किसी और को साइन करने के लिए। अक्सर ऐसे चीजे मेरे साथ होती रहती हैं पर अब ये चीजे उतनी बुरी नहीं लगती हैं, जितनी पहले लगती थीं। अब मुझे आदत हो गई है। मैं इतनी स्ट्रॉन्ग हो गई हूं कि आज मैं बिना गॉडफादर के अपना रास्ता बना रही हूं। इन सब चीजों को अब मैं पॉजिटिव साइड से देखती हूं क्योंकि मेरे फैंस मुझसे कनेक्ट हो चुके हैं और वो कहीं न कहीं अपनी छवि मेरे अंदर देखते हैं और उनको भी पता है कि मेरा कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं है इसलिए मुझे उनका प्यार ज्यादा मिल रहा है। उनके इसी प्यार को मैंने अपना कवच बना लिया है और अब वो मेरी ताकत बन हैं। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं यहां किसी गॉड फादर के साथ नहीं हूं और यही मेरी सबसे बड़ी यूएसपी बन चुकी है।

कोई भी फिल्म साइन करने से पहले क्या आप किसी से एडवाइस लेती हैं?
जी नहीं, मैं किसी से कोई एडवाइस नहीं लेती। यहां तक कि मेरे घरवालों को भी नहीं पता होता कि मैं कौन सी मूवी कर रही हूं। मेरे फादर को भी तब ही पता चलता है कि मैं कौन सी पिक्चर कर रही हूं? जब उनके पास रिक्वेस्ट जाती है कि इनवॉइस बनाकर भेज दीजिये क्योंकि वो मेरा फाइनेंशियल हैंडल करते हैं। बाकी मेरा करियर है और राइट और रॉन्ग मेरे डिसीजन होते हैं इसलिए मैं ना तो मैनेजमेंट से पूछती हूं और ना ही घरवालों से। मैं एक रेगुलर ऑडियंस रह चुकी हूं और अभी भी हूं इसलिए मुझे पता है कि मैं किस चीजें पर पैसा खर्च करुंगी और उसी तरह से सोचती भी हूं। कई बार मेरा मैनजमेंट मेरे को मना करता है कि ये सेफ प्रोजेक्ट नहीं है सिर्फ इतना ही नहीं काफी पिक्चरों के लिए बोला कि ये क्यूं कर रही हो? पर मेरा जो मन करता है मैं वही करती हूं, क्योंकि मेरे अंदर इतनी कैपेसिटी है कि मैं अकेले डिसीजन ले सकूं।



जब आप फिल्में चुनती हैं तो आप किस बात को ध्यान में रखती हैं?
मैं जब भी कोई फिल्म सेलेक्ट करती हूं तो सिर्फ एक ही बात ध्यान में रखती हूं कि क्या मैं इस फिल्म को अपनी मेहनत की कमाई के रुपये से देख सकती हूं या नहीं या फिर जिंदगी के वापस ना लौटने वाले तीन घंटे मैं इस फिल्म पर खर्च कर सकती हूं या नहीं। क्योंकि मुझे लगता है कि पैसा तो मैं फिर भी कमा लूंगी लेकिन वह समय तो वापस नहीं आ सकता है। जितना मेरा समय महत्वपूर्ण है उतना ही लोगों का भी इसलिए मैं हमेशा यही चाहती हूं कि लोगों का समय और पैसा बर्बाद ना हो।


क्या रियल लाइफ में आपने कभी किसी को 'थप्पड़' मारा हैं?
आज तक मैंने किसी को एक थप्पड़ तक नहीं मारा है और न ही स्कूल-कॉलेज में कभी जरूरत पड़ी किसी को थप्पड़ मारने की। मुझे लगता है कि मेरी बातें ही काफी हैं।

'थप्पड़' फिल्म आपको कैसे मिली?
'मुल्क' के प्रमोशन के दौरान मैंने अनुभव से बोला था कि मुझे घरेलू हिंसा पर फिल्म करनी है। पर ये नहीं पता था कि स्क्रिप्ट कहां से और कैसे आयेगी। उन्होंने कहा कि उनके दिमाग में एक वन लाइनर टाइप आइडिया है, जिसे वह डेवलप कर सकते हैं और 'आर्टिकल 15' के तुरंत बाद उन्होंने मुझे इस फिल्म की स्क्रिप्ट भेजी।

आपको क्या लगता है कि फिल्म 'थप्पड़' को देखने के बाद महिलाओं और लोगों में जागरूकता आएगी?
मुझे लगता है कि इस पिक्चर को देख कर उन्हें ये तो जरूर फील हुआ होगा कि इस बात को दबाना ठीक नहीं है, अब टाइम आ गया है कि इसके बारे में बात की जाए। रही बदलाव की बात तो आप चेंज होंगे कि नहीं उसकी गारंटी मैं नहीं ले सकती क्योंकि ये इंसान की सोच पर डिपेंड करता है। मैं जबरदस्ती अपनी पिक्चर बनाकर किसी को बदल नहीं सकती। मुझे लगता है कि ये गलतफहमी किसी को पालनी ही नहीं चाहिए कि फिल्मों से लोग बदल जाते है। बदल नहीं जाते बल्कि जब वो टॉपिक को बड़े परदे पर कई लोगों के साथ बैठकर देखते हैं तो वो टैबू नहीं रहता बल्कि खुले रूप से सबके सामने आता है और मूवी खत्म होने के बाद उस टॉपिक के बारे में भी चर्चा करते हैं।


आप 'थप्पड़' के विषय से कितनी अंतरंग हैं?
जब मुझे थप्पड़ की स्क्रिप्ट पहली बार पढ़ने को मिली तो मैं पढ़कर बहुत रोई थी। मुझे लगा कि अगर मैं इतनी दुखी हो सकती हूं वो भी स्क्रिप्ट पढ़कर, तो जिनके साथ ये होता है उनकी पीड़ा कौन समझेगा इसलिए मुझे लगा कि एक एक्टे्रस होने के नाते ही अगर मेरे पास ताकत है तो मुझे उसका इस्तेमाल करके ऐसा मुद्दा उठाना ही चाहिए। आज के समय में भी कई ऐसी पढ़ी-लिखी महिलाएं हैं, जिनके साथ यह होता है। पर महिलाएं घर टूटने और बेइज्जती के डर से इसके बारे में बात नहीं करतीं।

आपको क्या लगता है घरेलू हिंसा में गलती किसकी होती है?
इस फिल्म के अंदर एक सीन है, जहां मेरा कैरेक्टर ये बोलता है कि शायद थोड़ी गलती मेरी भी है कि मैंने अपने आपको ऐसा बना दिया कि वह मुझे थप्पड़ मार सके। शायद थोड़ी बहुत गलती मेरी मां की भी है, जिन्होंने मुझे सिखाया कि औरतों को सहनशील होना चाहिए। थोड़ी बहुत गलती शायद उसकी मां की भी है कि उन्होंने उसे कुछ नहीं बोला और मुझे बोला कि औरत को थोड़ा बर्दाश्त करना चाहिए। देखा जाए तो ताली दोनों हाथों से बजती है। मैं ये नहीं कह रही कि लड़की गलत है उसने उकसाया पति को मारने के लिए, पर लड़की उस समय गलत हुई जब उसने थप्पड़ खाया और उसके बाद कुछ किया नहीं। अगर उस टाइम पर लड़की ने सबकी सुनकर या शर्म के मारे वो चीज जाने दी होती ये सोच कर कि ये तो चलता है। तो फिर ये गलती लड़की की है। अगर उसी समय वो इन चीजों को हैंडल कर लेती तो शायद किसी भी तरह से दोबारा ऐसा नहीं होता। क्या पता उस रिलेशनशिप से वो बाहर निकल जाती और बेटर लाइफ जीती। इस पिक्चर में ये सारी चीजें सामने आएंगी, जिसको देखकर औरतों को फील होगा कि वो भी काफी भगीदार हैं, इस क्राइम को नजरअंदाज करने में। मेरा मतलब है कि कुल मिलाकर गलती हम सभी की है और हम सभी को अपनी-अपनी गलती सुधारनी होगी।

सुनने में आया एक थप्पड़ के लिए आपने सात थप्पड़ खाए, तो फाइनल टेक कब हुआ?
(हंसते हुए) मेरे को पहले टेक के बाद से ही थप्पड़ ठीक से लगने शुरू हो गए थे, पर कैमरे पर कौन सा सही दिख रहा है वह ज्यादा महत्वपूर्ण था क्योंकि उस पर पूरी पिक्चर बनी है तो इसलिए हर तरह का थप्पड़ खा लिया है ताकि जो भी सही लगे वो हम एडिट में रखें।

आप दिल्ली की हैं तो आपको दिल्ली कितनी याद आती है?
बहुत याद आती है। मेरी पहचान दिल्ली से ही है। मैं हमेशा से दिल्ली की रही हूं और हमेशा दिल्ली की ही रहूंगी। मेरी कर्मभूमि मुंबई है लेकिन मेरी जन्मभूमि तो हमेशा दिल्ली ही रहेगी।  

आप प्राइम वीडियो पर स्टैंडअप कॉमेडी करती हैं, हास्य और व्यंग्य के बारे में क्या सोचती हैं?
मुझे कॉमेडी देखना और करना दोनों ही पसंद है। रोजमर्रा जिंदगी में मैं थोड़ा बहुत मजाक कर लेती हूं। लेकिन वहां खड़े होकर सबके सामने ये करना मुश्किल होता है। मेरा हास्य काफी व्यंगात्मक होता है इसलिए आधे लोगों को समझ नहीं आता। फिर भी मैंने सोचा करके देखते हैं। इसके बाद मुझे स्टैंड अप के ऑफर भी आने लगे।

हमेशा सीरियस फिल्में करने का ही सोचा है या कभी कॉमेडी फिल्म भी करेंगी?
ऐसा तो बिलकुल भी नहीं है। अगर कॉमेडी की बात करें तो 'जुड़वां 2' और 'चश्मेबद्दूर' की है ना । अब आप मुझे कॉमेडी-थ्रिलर फिल्म 'लूप लपेटा' देखेंगे जो फुल कॉमेडी फिल्म है। ये सब मिथ्य बातें हैं कि मैं स्टिरियोटाइप हो चुकी हूं। अगर लोगों को लगता है कि मैं ऐसी हूं तो मैं खुश हूं स्टिरियोटाइप होकर। मैं हमेशा सेंसेबल कैरेक्टर करती हूं और कोई बेकार कैरेक्टर कभी नहीं करुंगी।

जब आप खुद की फिल्म देखती हैं तो कैसा फील होता है
मुझे अपनी हर पिक्चर में प्रॉब्लम ही प्रॉब्लम दिखती है। मैंने आज तक कोई भी पिक्चर देखकर ये कभी नहीं बोला कि यार, इसमें मैंने ठीक काम किया है। मैं उसमें इतनी गलतियां निकालती हूं कि पहली बार देखकर ही डिप्रेस हो जाती हूं कि मैंने कितनी गलतियां की हैं। हर पिक्चर में मेरे साथ ये प्रॉब्लम रहती है। मैंने इस पिक्चर को भी देखा था और देखने के बाद मैंने सर को बोला था कि मेरे अलावा बाकी सबने अच्छा काम किया है। मेरी आदत है कि पहली बार में मैं एक ऑडियंस की तरह पिक्चर देख नहीं पाती हूं बल्कि अपनी कमियां निकालने के लिए देखती हूं। फिर दूसरी तीसरी बार में मैं ऑडियंस की तरह देखना शुरू करती हूं।

ऐसी कौन सी बात आप अपने भीतर पाती हैं, जो दूसरों से जुदा है?
मुझे लगता है कि मेरी एक लाइफ है, जो फिल्मों से हटकर है। इस इंडस्ट्री में ज्यादातर एक्टर बचपन से ये ड्रीम लेकर आते हैं कि वो अपनी पूरी जिंदगी इस इंडस्ट्री को देंगे। मैं इन सबसे थोड़ी अलग हूं। मेरे लिए यह सिर्फ जॉब है। मैं सुबह काम पर जाती हूं और खत्म करके शाम को घर आ जाती हूं। मैं जब घर आती हूं तो मेरे घर में भी किसी को पिक्चरों से कोई लेना देना नहीं होता है। मैं फिल्मों के अलावा एक वेडिंग प्लानिंग चला रही हूं मेरी रबिन्टन टीम भी है। मेरी लाइफ में जो भी लोग पर्सनल सर्कल में है वो भी फिल्म इंडस्ट्री के नहीं हैं। मेरी एक ऐसी लाइफ है, जो फिल्मी दुनिया से अलग है। मैं सुबह से लेकर शाम तक फिल्मों में नहीं घुसी रहती हूं। मुझे लगता है ये सारी चीजे बाकी फिल्म एक्टर से अलग है और शायद इस वजह से फिल्मों में मैं अपना किरदार काफी हद तक रियल दिखा पाती हूं क्योंकि मैं एक रियल लाइफ जी रही हूं। मैं एक स्टार के नजरिये से चीजे नहीं देखती हूं बल्कि लाइफ में रेगुलर एवरेज पर्सन के प्वॉइंट ऑफ व्यू से भी चीजे देखती हूं।


फेमिनिज्म आपके लिए क्या है?
मैं बस यही चाहती हूं कि एक औरत होने के नाते मुझे अधिक चीजें मत दो, पर एक औरत होने के नाते छीनो भी नहीं। मुझे मेरी प्रतिभा से जज करो और उसी अनुसार मौके दो। मुझे बस बराबरी चाहिए और एक्स्ट्रा कुछ भी नहीं।

अभी आप कौन-कौन सी फिल्में कर रही हैं?
अभी मैं 'हसीन दिलरुबा' 'रश्मि रॉकेट' 'मिताली' कर रही हूं और मुझे उम्मीद है कि मैं लोगों को निराश नहीं करूंगी।

अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगी युवतियों को अपने अनुभवों से क्या संदेश देना चाहती हैं?
देखिए, मैं इतना कहूंगी कि सब कुछ संभव है। इसलिए यह मत सोचो कि नहीं हो पायेगा। हां, आपको दूसरों की अपेक्षा ज्यादा समय लगेगा, टेस्ट भी ज्यादा होंगे, मेहनत ज्यादा करनी पड़ेगी, लंबा रास्ता होगा लेकिन अगर टिके रहेंगे और मेहनत करते रहेंगे और बीच में गिवअप नहीं करेंगे तो फिर आपकी जीत पक्की। इन सबमें सबसे बड़ी बात जो बहुत महत्वपूर्ण होती है, वो है पैशन। अगर आपमें पैशन है तो आप जीत सकते हो। मैं इसका जीता जागता उदाहरण हूं।

क्या आप धैर्यवान हैं?
(हंसते हुए) पहले मैं बहुत शॉर्ट टेम्पर और हाइपर होती थी। पर अब नहीं हूं। इंडस्ट्री में आकर मेरे अंदर बहुत धैर्य आ गया है क्योंकि जब आप इंडस्ट्री में काम करते हैं तो कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं होता तो गलतियों से ही सीख-सीखकर आप मैच्योर हो जाते हैं। आप कह सकती हैं कि एक उम्र का भी तकाजा होता है जब आप उम्र के साथ मैच्योर होते जाते हैं। हम औरतें तो आदमियों की तुलना में जल्दी मैच्योर होती हैं।  

कौन सी चीजें पसंद नहीं हैं आपको?
जो लोग अपने काम को हल्के में लेते हैं, वह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है।

किस हीरो के साथ काम करना चाहती हैं?
अभी मैंने काम ही कितनों के साथ किया है। अभी बहुत सारे लोगों के साथ काम करना है। इंडस्ट्री में बहुत सारे एक्टर हैं जैसे- रनवीर , राजकुमार राव और भी हैं , जिनके साथ काम करने का मन है।

आपके बैग में ऐसी कौन सी चीजे हैं जो हमेशा रहती हैं?
मेरा वॉलेट, घर की चाभी, चार्जर और लिप बाम।

खाली समय में क्या करती हैं?
मैं सोती हूं। 

शादी कब कर रही हैं?
जब मेरे को बच्चा करना होगा।

खूबसूरती का राज?
अच्छे से सोइए और खुश रहिए।

फिटनेस फंडा
मुझे जिम जाना पसंद नहीं है इसलिए मैं फिटनेस के लिए स्क्वेश स्पोर्ट्स खेलती हूं।

 

गृहलक्ष्मी के रीडर्स को क्या क्या मैसेज देना चाहेंगी?
जितने भी पुरुष और महिलाएं गृहलक्ष्मी मैगजीन पढ़ते हैं या पढ़ती हैं उनसे मैं ये कहना चाहती हूं कि दूसरे पर इल्जाम लगाने से पहले ये जरूर देखें कि आपने क्या किया है। अपने पर होने वाले किसी भी तरह के वायलेंस पर आवाज जरूर उठाएं, बिना ये सोचे कि मैं एक औरत हूं और मुझे सब कुछ सहन करना पड़ेगा। दूसरी बात, अपनी जिन्दगी की कमान अपने हाथ में रखिए ना कि दूसरों के हाथ में दीजिए फिर चाहे वो पति ही क्यूं ना हो।

 

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