नारी आंदोलन की मशाल और मिसाल- सावित्रीबाई फुले

Dr. Vibha Khare

4th July 2020

सावित्रीबाई फुले उन्नीसवीं सदी की वह सुनहरी किरण थीं जिसने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के भीतर न केवल अपनी आभा बिखेरी बल्कि अंधविश्वास, पाखंड, धार्मिक कर्मकांडों को ध्वस्त कर ज्ञान के स्रोत को अछूतों व स्त्रियों के लिए रेखांकित किया। उन्होंने स्त्री जीवन को गौरवान्वित किया एवं सामाजिक न्याय को लक्षित किया।

नारी आंदोलन की मशाल और मिसाल- सावित्रीबाई फुले

तत्कालीन प्रतिकूल परिस्थितियों में समाज सुधारक  सावित्री बाई फुले युग नायिका बनकर उभरीं। अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, निर्भीक व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत ज्योतिबा ‘फुले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दकियानूसी समाज को बदलने हेतु इन्होंने अपने तर्कों के आधार पर बहस की। 

सावित्रीबाई का जीवन परिचय 

सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को नायगांव में हुआ। उनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे एवं माता का नाम लक्ष्मी था। वह तथाकथित दबे-पिछड़े समाज की माली जाति में जन्मी थीं। जब वह नौ वर्ष की अल्पायु में थीं तो उनका विवाह महान् क्रांतिकारी ज्योतिबा फुले (तेरह वर्ष) से हुआ। ज्योतिबा फुले उनके जीवन में शिक्षक बनकर आए। विवाह के बाद सवित्री घर गृहस्थी के साथ-साथ कठोर परिश्रम करके स्वयं पढ़ीं और गांव-गांव जाकर दीन-हीन दुखी दलित और स्त्रियों के लिए पाठशाला खोलने में अग्रसर हुईं।

भारत की प्रथम शिक्षिका 

भारत की प्रथम शिक्षिका होने का गौरव उन्हें ही प्राप्त है। उन्होंने ऐसे समय में शिक्षा पर कार्य करना शुरू किया, जब शिक्षा के सारे द्वार स्त्रियों के लिए लगभग बंद थे। 1 जनवरी 1848 में भिडे वाड़ा, पूना में सावित्रीबाई फुले एवं फातिमा शेख द्वारा पहला महिला स्कूल खोला गया जिसमें सावित्रीबाई फुले अध्यापिका हुईं। उनके शिक्षिका बनने का समाज में प्रखर विरोध हुआ। उन्हें धर्म को डुबाने वाली कहकर एवं अश्लील गालियां देकर प्रताड़ित किया गया। गाली-गलौच, पत्थर मारने, गोबर फेंकने पर भी सावित्रीबाई फुले ने अपना काम बंद नहीं किया। वह अपने साथ हमेशा एक अतिरिक्त साड़ी रख लेती थीं और स्कूल पहुंचकर कपड़े बदल लेती थीं। 

सावित्री बाई फुले के साथ-साथ फातिमा शेख व सगुणा भी ज्योतिबा की छात्राएं थीं। फुले दम्पति ने शूद्रों-अतिशूद्रों और औरतों के बीच शिक्षा की ज्योति जलाकर गुलामी से मुक्ति की राह दिखाई। गांव-गांव जाकर विद्यालय खोले।

समाज सुधारकों में 'सावित्री बाई फुले' का नाम अग्रणीय

यदि हम भारतीय स्त्री आंदोलन को समझना चाहते हैं तो हमें सावित्री बाई फुले के सामाजिक कार्यों को तत्कालीन समाज के समक्ष रखकर आंकना चाहिए।  उस दौर में स्त्रियों की दशा अत्यंत दयनीय थी। उनका जीवन चूल्हे-चौके और बच्चे पैदा करने, पति की सेवा करने तक ही सीमित था। उनकी इच्छा, रुचि, अभिरुचि व मान-सम्मान का कोई मूल्य नहीं था। महिलाओं का जीवन बेहद कठिन था। एक ओर ऊंची जातियों में बाल-विवाह से हुई विधवाएं यौन शोषण और गर्भवती होने पर भ्रूण हत्या करतीं या शर्म से स्वयं आत्महत्या कर लेतीं तो दूसरी ओर अछूत औरतें एक बूंद पानी के लिए भी सवर्णों की दया पर जीतीं। वे सामाजिक बहिष्कार की शिकार होतीं। एक दिन जब सावित्री बाई फुले बच्चों को पढ़ाने पाठशाला जा रही थीं तो उन्होंने देखा कि रास्ते में कुएं के पास कुछ औरतें फटे-पुराने कपड़े पहनकर धनी औरतों से मिन्नतें कर रही हैं ''हमें मार लो, पीट लो, हमारी मार-मार कर खाल उधेड़ लो, परन्तु हमें दो लोटे पानी दे दो।' चिलचिलाती धूप में कुएं से दूर खड़ी इन औरतों को देखकर ऊंची जाति की औरतें हंस रही थीं और हंसते-हंसते डोल भर-भर कर पानी उनके ऊपर फेंक देतीं। अछूत महिलाएं घंटों दया की भीख मांगतीं, बदले में थोड़ा-सा पीने का पानी मिलता। सावित्रीबाई फुले यह कृत्य सहन न कर सकीं। वे उन अछूत औरतों के पास गईं और उन्हें अपने घर लिवा लाईं। अपना तालाब दिखाते हुए बोलीं, ''जितना चाहे पानी भर लो, आज से यह तालाब तुम सबके लिए है।' यह कहते हुए उन्होंने 1868 में अपना तालाब अस्पृश्यों के लिए खोल दिया। अंतत: शिक्षा एवं अछूतों का साथ न छोड़ने पर फुले दंपती को कई सामाजिक बहिष्कारो का भी सामना करना पड़ा।

'सत्यशोधक समाज' की स्थापना

1848 में एक तरफ इंग्लैंड में स्त्री शिक्षा की मांग हो रही थी तो दूसरी ओर फ्रांस में मानव अधिकार के लिए संघर्ष चल रहा था। भारत में सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने शूद्रों अतिशूद्रों व स्त्री शिक्षा एवं सामाजिक सुधार की नींव रखकर नए युग का सूत्रापात किया। 1849 में पूना में उस्मान शेख के यहां उन्होंने प्रौढ़ शिक्षा आरंभ की। 1849 में ही पूना, सतारा व अहमदनगर जिले में उन्होंने अन्य पाठशालाएं शुरु की। स्कूली शिक्षा के साथ-साथ ही सावित्रीबाई फुले ने महसूस किया कि स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए स्त्रियों को संगठित करना चाहिए। 1852 में उन्होंने 'महिला मंडल' का गठन किया और बाल-विवाह के तहत हुई विधवाओं के साथ हो रहे जुल्म व शारीरिक शोषण का विरोध किया। स्त्रियों के बाल काटने के विरुद्ध नाइयों से अनुरोध किया तथा इसमें सफलता हासिल की। 'भ्रूण  हत्या', 'बाल हत्या' के विरुद्ध विधवा मांओं को शरण देना शुरू किया। अंतत: उनके लिए 1852 में बाल-हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की। 1864 में अनाथाश्रम की स्थापना की। उस समय छुआछूत बहुत ज्यादा थी। शूद्र सामाजिक जीवन से केवल बहिष्कृत ही नहीं थे, प्रताड़ित भी किए जाते थे। उनका खाना-पीना, रहना सब दूसरों की दया पर था, अत: उनका जीवन पशु समान था। फातिमा शेख भी स्त्री शिक्षा में सावित्री बाई फुले के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही थी। 24 सितम्बर 1873 में ''सत्यशोधक समाज' की स्थापना की गई और सैकड़ों विवाह साधारण तरीके से कम खर्च में करवाए गए। उन्होंने 1875 से 1877 तक महाराष्ट्र में अकाल पीड़ित लोगों की मदद के लिए सरकार पर दबाव डालकर अनेक रिलीफ केन्द्र एवं भोजन केन्द्र शुरू करवाए।

प्रखर लेखिका व तार्किक विदुषी

सावित्रीबाई फुले न केवल सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षिका थीं बल्कि वे कोमल हृदय चेतनाशील कवयित्री भी थीं। 'काव्य ‘फुले' नाम की उनकी कविता संग्रह में उन्होंने अनेक मार्मिक कविताएं लिखीं। उनका यह कविता संग्रह 1854 में छपा तथा दूसरा कविता संग्रह 'बाबन्न कशी सुबोध रत्नाकर' 1891 में अपने पति ज्योतिबा फुले को याद करते हुए आया। वे प्रखर लेखिका व तार्किक विदुषी थीं, जब भी कोई समस्या आती वे उस पर गंभीरता से विचार करके सटीक जवाब देतीं।

दलित व पिछड़े समुदायों के आंदोलन की नायिका सावित्री बाई फुले आज अपने समूचे अस्तित्व के साथ उनमें स्थापित हो चुकी हैं। सावित्री बाई फुले दंपति को अपना कोई बच्चा नहीं था। अत: उन्होंने एक काशीबाई नामक ब्राह्मण विधवा से हुए बच्चे को गोद लेकर उसे पढ़ाया-लिखाया व डॉक्टर के रूप में अपने जैसा अच्छा इंसान बनाया। अपने पति की मृत्यु के बाद वे सत्य शोधक समाज की अध्यक्ष बनीं। उनकी अध्यक्षता में अनेक सुधारात्मक काम हुए। 

जीवन के अंतिम दिनों में पुणे में प्लेग के प्रकोप से अछूत बस्तियों में लोगों की सेवा करते हुए 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई की मृत्यु हो गई। 

 

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