घूंघट से बाहर निकल रहा है देश का भविष्य

Shweta Rakesh

4th July 2020

समाज का स्तंभ होती हैं महिलाएं। समाज तभी शिक्षित होता है, जब महिला शिक्षित होती है। शिक्षित स्त्री ही घर को संपन्न बना सकती है और बच्चों को उचित संस्कार दे सकती है। लेकिन आज भी दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जो समाज में महिलाओं की भागीदारी को नजरअंदाज करते हैं। भारत भी इस सोच से अछूता नहीं है।

घूंघट से बाहर निकल रहा है देश का भविष्य

हम अपनी भारतीय संस्कृति में तो महिलाओं को उच्च स्थान देते हैं, लेकिन समाज में नहीं। हम शक्ति के लिए मां दुर्गा को पूजते हैं, धन-वैभव के लिए मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं और ज्ञान व सद्बुद्घि के लिए मां सरस्वती का ध्यान करते हैं। देवी के रूप में हम इन स्त्रियों को पूजते हैं लेकिन उनके हाथों में कलम थमाना तो दूर उसे जन्म लेने से ही रोक देते हैं और गर्भ में ही उसकी हत्या कर देते हैं।

भारतीय समाज में यह सोच जड़ जमाए बैठी है कि बेटों के जन्म से वंश बढ़ता है और बेटी के जन्म से अनचाही जिम्मेदारियों का बोझ। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि वंश बढ़ाने के लिए लड़कों को जन्म भी तो एक स्त्री ही देती है। यदि स्त्री न हो तो वंश कहां होगा? हम अपने आप को आधुनिक कहते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारे विचारों में आधुनिकता की बजाय संकीर्णता आ रही है और यह संकीर्णता दर्शाती है पिछले कुछ सालों की जनगणना रिपोर्ट। हर दशक में लड़कियों की संख्या में गिरावट आई है। 2001 की जनगणना के अनुसार देश में प्रति 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 927 थी और 2011 में यह घटकर 918 हो गई। पूरे देश में हरियाणा में लिंगानुपात 1000 लड़कों पर 775 लड़कियों का है, जो बेटियों की दयनीय स्थिति दर्शाता है।

यदि हमारे देश में लिंगानुपात का ऐसा दृश्य नहीं होता तो शायद माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को बेटियों को जन्म देने, उन्हें बचाने और शिक्षित करने के लिए 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' जैसे अभियान को लाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। इस अभियान की शुरुआत उन्होंने 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत जिले से की थी। यह योजना भारत सरकार के तीन मंत्रालयों- महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संयुक्त पहल है। देश के कई हिस्सों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या कम है, जिसमें हरियाणा अव्वल है।

वर्तमान परिवेश में यह योजना हम सबकी जिम्मेदारी बन गई है। सरकार के साथ-साथ यूनिसेफ भी अपनी कार्टून किरदार 'मीना' के माध्यम से बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित कर रहा है। 'मीना' का काल्पनिक किरदार एनीमेटेड फिल्मों एवं किताबों के द्वारा लिंग, स्वास्थ्य एवं सामाजिक असमानता के मुद्दों पर दक्षिण एशिया के बच्चों को शिक्षित करता है।

'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' योजना की शुरूआत के एक साल के भीतर ही प्रथम चरण में शामिल किए गए 100 में से 58 जिलों में जन्म लिंग अनुपात में सकारात्मक वृद्धि हुई। ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभियान चलाकर इस बारे में जानकारी दी गई। महिला सरपंचों व अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया। आम लोगों में सजगता बढ़ाने के लिए कई इलाकों में डिजिटल बोर्ड पर जन्म लिंग अनुपात आंकड़ों को सार्वजनिक भी किया गया है।

आजकल आधुनिक उपकरणों की मदद से अजन्मे बच्चे का अल्ट्रासाउंड कर लिंग पता लगाकर कन्या भू्रण हत्या के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। आए दिन हम समाचार पत्रों में, न्यूज चैनलों पर कन्या भ्रूण हत्या की खबरें पढ़ते हैं। कई बार तो नवजात बालिका शिशु को मारकर फेंकने या झाड़ियों अथवा मंदिरों की सीढ़ियों पर छोड़ देने की खबरें सुनते हैं। बेटियों के जन्म से पहले ही उनके अधिकारों का हनन शुरू हो जाता है। 

इसे रोकने के लिए ही 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' योजना की शुरुआत की गई जिसका प्रमुख उद्देश्य है-

कन्या  भ्रूण  हत्या को रोकना।

लिंग भेद खत्म करना।

बालिकाओं की शिक्षा को आगे बढ़ाना।

बेटियों के जन्म, शिक्षा और पोषण को समानता देना।

उन्हें सुरक्षित माहौल देना।

हमारे समाज में लोग लड़कियों की शिक्षा की बजाय उनके विवाह पर ज्यादा खर्च करते हैं। उन्हें दहेज देना मंजूर है, लेकिन बेटियों को शिक्षित करना नहीं। दहेज प्रथा से बचने के लिए वे बेटियों को जन्म ही नहीं देना चाहते। वे यह भूल जाते हैं कि लड़की का जन्म लेना और शिक्षित होना उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना एक लड़के का। शिक्षित लड़कियां अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती हैं। गौर करें तो पाएंगे कि हमारे देश में अधिकतर विद्यालयों में पुरुषों की तुलना में महिला शिक्षिकाओं की संख्या ज्यादा है, जो यह सिद्घ करती है कि एक पढ़ी-लिखी महिला सिर्फ अपना घर-परिवार ही नहीं, बल्कि और भी कई बच्चों का भविष्य संवार सकती है जो एक अनपढ़ महिला नहीं कर सकती। एक शिक्षित महिला नर्स, डॉक्टर, शिक्षक, पुलिस, एथलीट आदि कई क्षेत्रों में अपना और देश का नाम उज्ज्वल कर सकती है। वहीं अनपढ़ महिला सिर्फ घर की चहारदिवारी तक ही सीमित रहने को विवश होती है।

एक शिक्षित और समझदार लड़की राष्ट्र के विकास में अहम भूमिका निभाती है। वह अपना भविष्य संवार सकती है। वक्त आने पर माता-पिता या पति एवं बच्चों का आर्थिक सहारा बन उनका बोझ कम कर सकती है। पति के साथ-साथ पत्नी भी अगर आर्थिक रूप से सक्षम हो तो घर चलाना भी आसान हो जाता है। महिलाएं यदि आर्थिक रूप से मजबूत हों तो वे गरीबी को कम करने में भी सक्षम होती हैं। उनके शिक्षित होने के कारण बाल मृत्यु दर और कन्या भ्रूण हत्या का जोखिम भी कम होता है।वे पारिवारिक आय में योगदान कर सकती हैं। यदि किसी दुर्घटनावश पति की मृत्यु हो जाए तो वह नौकरी कर अपना व अपने परिवार की जीविका चला सकती है। उसे किसी दूसरे पर वित्तीय सहायता हेतु निर्भर होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वहीं दूसरी ओर यदि महिला अशिक्षित है तो उसे कोई भी ढंग का रोजगार नहीं मिलता। अपने बच्चों की देखभाल और परवरिश के लिए उसे दूसरे घरों में बर्तन धोने, सफाई करने और बच्चे-बूढ़ों की देखभाल का काम करना पड़ता है।

एक शिक्षित महिला की घरेलू या यौन हिंसा के शिकार होने की संभावना भी कम होती है क्योंकि वह अपने अधिकारों को लेकर सजग होती है और आत्मविश्वास से भरी होती है। वहीं एक अनपढ़ महिला अपने अधिकारों के प्रति सजग न होने के कारण घरेलू हिंसा का भी शिकार होती है और यौन हिंसा का भी।

एक शिक्षित लड़की के पास प्रतिभा, कौशल और आत्म-विश्वास होता है, जो उसे एक बेहतर मां, बेहतर नागरिक और बेहतर कर्मचारी बनाता है। शिक्षा के बलबूते ही आज महिलाएं देश-सेवा के कई प्रतिष्ठित पदों पर आसीन हैं। उदाहरण के लिए केरल की सी वानमत्थी अपनी शिक्षा के दम पर आइ.ए.एस अधिकारी हैं। उनका परिवार पशुपालन करता था। पशुपालन के साथ-साथ उनके पिता ड्राइवर भी थे। वानमत्थी का बचपन गाय-भैंस चराते बीता था। लेकिन उनमें पढ़ाई को लेकर हमेशा से ही रूझान था। कम उम्र में ही उनपर रिश्तेदारों की ओर से शादी का दबाव पड़ने लगा। लेकिन उनके गरीब मां-बाप ने अपनी बेटी का पूरा साथ दिया। कई विपरीत परिस्थितियों से गुजरकर वानमत्थी ने अपनी पढ़ाई पूरी की और देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित पद पर आसीन हुईं।

ऐसे कई उदाहरणों से हमारा देश भरा पड़ा है। जरूरत है तो इस बात को समझने की कि जब एक गरीब और ग्रामीण परिवार बेटी की शिक्षा के महत्त्व को समझ सकता है तो फिर खुद को आधुनिक और शहरी कहलाने वाला शिक्षित समाज क्यों नहीं?

 

 

 



 

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