जिन्होंने बदल दिया शहादत के मायने...

Prince Bhaan

4th July 2020

23 मार्च 1931, भारत में दमनकारी ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में उठे तीन क्रांतिकारियों को फांसी दी गई। इस दिन से पहले तक इन तीनों युवाओं भगत सिंह, शिवराम राजगुरू और सुखदेव थापर को केवल भारत के लोग जानते थे। लेकिन फांसी के बाद ये तीनों विश्व भर में क्रांति के प्रतीक बन गए।

जिन्होंने बदल दिया शहादत के मायने...

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने वाले सभी क्रांतिकारियों का व्यक्तित्व इतना विराट था कि आप एक शब्द विशेष सुनते ही सीधे उन्हीं को याद करते हैं। जैसे कि अहिंसा से महात्मा गांधी, समाजवाद से जवाहर लाल नेहरू, समानता से भीमराव अम्बेडकर और शहादत से भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव।

शहादत...क्रांति के इस सबसे ऊंचे मुकाम को हासिल करने का मौका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कई लोगों को मिला फिर चाहे वो खुदीराम बोस हों, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, लाला लाजपत राय, शहीद कुयिली या फिर जतिन दास।

लेकिन भगत सिंह और उनके साथियों ने शहादत के मायने बदल दिए। अदालत में ट्रिब्यूनल के सामने दिए गए उनके तर्कों और जवाबों ने ऐसी चोट मारी कि इतिहास के पन्नों पर सदा के लिए के लिए निशान छोड़ गए। लाहौर षड्यंत्र अभियोग की सुनवाई में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। ऐसा नहीं है कि उनकी शहादत का दर्जा अन्य किसी भी स्वतंत्रता सेनानी से ऊपर या नीचे है लेकिन उन्हें अलग बनाया उनके मरने के तरीके ने...

ब्रिटिश असेम्बली में बम फेंकने के बाद वहां इंकलाब के नारे लगाने का फैसला, सांडर्स हत्याकाण्ड में वॉन्टेड होने के बावजूद सबके सामने जाने का फैसला, एचएसआरए (पहले एचआरए) का सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्य होने के बावजूद अपनी गिरफ्तारी की पेशकश देना ये सब इन 22-23 साल के लड़कों ने खुद ही तय किया। उस कच्ची उम्र में जब आजकल के युवा अपनी नौकरी और शादी की तैयारी के लिए दौड़ भाग रहे होते हैं तब इन्होंने बिना निजी स्वार्थ की चिंता करते हुए भारत की जनता के लिए आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत किसलिए खास है इसका जवाब भगत सिंह पर आधारित पीयूष मिश्रा के नाटक 'गगन दमामा बाज्यो' के एक संवाद से समझा जा सकता है- 

भगत सिंह कहते हैं 'खून बहाना कोई बड़ी बात नहीं, फिर चाहें वो अपना हो या सामने वाले का। बड़ी बात ये है कि जिस्म से टपकी हुई लहू की एक बूंद आने वाली पीढ़ी के खून में आग लगा सकती है या नहीं। आजादी जरूरी नहीं आजादी के बाद का हिन्दुस्तान जरूरी है और मुझे डर है कि अगर ये आजादी हमें गलत तरीके से मिल गई तो कुछ न बदलेगा। गोरे चले जाएंगे और उनकी जगह भूरे आ जाएंगे। कालाबाजारी का साम्राज्य होगा, अमीर और अमीर होते चले जाएंगे, गरीब और गरीब। रिश्वतखोरी सर उठाकर नाचेगी, धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर वो आग लगेगी कि जिसे बुझाते-बुझाते आने वाली पीढ़ियों की कमर टूट जाएगी'

यह बात भगत सिंह ने उस वक्त कही थी जब वो एचआरए के सदस्य बने थे। एक बीस वर्ष के बालक के विचारों में इतनी स्पष्टता ऐसी दूरदृष्टि शायद ही विश्व के इतिहास में कभी देखी गई हो। और यह बहादुरी, ये जज्बा केवल भाषण सभाओं तक ही सीमित नहीं था, अदालत में भगत सिंह और सुखदेव ने भरी अदालत में अंग्रेजी व्यवस्था की जो धज्जियां उड़ाई उसकी मिसालें साम्राज्यवादी इतिहास में अमर रहेंगी।

यहां तक कि सुनवाई के बाद जज द्वारा फांसी की सजा मिलने पर भगत सिंह ने स्वयं कहा कि 'हम पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का जो अभियोग लगाया गया है वह बिल्कुल ठीक है, और यह युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक विदेशी और देशी जमीदारों और अफसरों ने भारतीय जनता के साधनों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर रखा है।' 

जहां एक तरफ लोग केवल उम्र कैद की सजा से ही कांप रहे थे, वहां भगत सिंह ने फांसी की सजा को मानने से इंकार करते हुए गोली मार दिए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि वे युद्धबंदी हैं और उनसे युद्धबंदी जैसा ही व्यवहार किया जाए, फांसी के बदले उन्हें गोली से उड़ा दिया जाए।

अपने काल को चुनौती देकर इन तीनों विभूतियों ने वो उदाहरण स्थापित किया जिसे सुनकर ही हर भारतीय के मन में क्रांति की अलख जग जाती है तो दूसरी तरफ ब्रिटिश व्यवस्था की चूलें ढीलीं हो गई थीं। इसीलिए तो ब्रिटिश हुकूमत इन तीन कच्ची उम्र के लड़कों से इतना डर गई कि फांसी की तय तारीख 24 मार्च 1931 से एक दिन पहले 23 मार्च की रात को ही चुपचाप इन तीनों को ले जाकर फांसी दे दी और पीछे की दीवार तोड़कर उनकी लाशों को जैसे-तैसे जलाकर सतलुज नदी के किनारे फेंक दिया।

जिस वक्त भगत सिंह को फांसी के लिए लेने के लिए हवलदार उनके कक्ष में आया उस वक्त वो अपने आदर्श और रूसी क्रांति के नायक पर लिखी किताब 'लेनिन की जीवनी' पढ़ रहे थे। जब हवलदार ने बताया कि उन्हें सुबह के बजाय अभी फांसी दी जा रही है तो हाथ में किताब की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोले थे 'कुछ ही पन्ने पढ़ने बाकी रह गए थे, खैर फिर कभी' और उसी मुस्कान के साथ फंदे की तरफ चल पड़े थे।

इन तीनों ने 23 साल की उम्र में वो मुकाम हासिल कर लिया जिससे लोग जीवन भर मेहनत करके भी चूक जाते हैं।  भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव केवल व्यक्ति नहीं थे, एक विचार थे और जैसा कि भगत सिंह ने कहा था, 'व्यक्तियों को मारने से उनके विचार नहीं मारे जाते…..' 

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