बारिश में वृद्धों को होने वाली परेशानियाँ

Dr. Hanuman Prasad Uttam

13th July 2020

वर्षा ऋतु में दूषित वात, पित्त, कफ के कारण जठराग्नि अत्यंत क्षीण हो जाती है। बरसात अपने साथ कई बीमारियां भी लाती है। इस कारण इस मौसम में लोग बीमार हो जाते हैं। बदलते मौसम में बुजुर्गों के बीमार होने की आशंका अधिक रहती है। इसीलिए जरुरी है कि उनके स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखा जाए।

बारिश में वृद्धों को होने वाली परेशानियाँ

​वर्षा​ ​ऋतु में जठराग्नि धीमी होने से वृद्धों को अक्सर पेचिश, गैस बनना,उल्टी, दस्त, पाचन क्रिया में गड़बड़ी, भूख न लगना, जोड़ों में दर्द, कमजोरी होना आदि बीमारियां घेर लेती हैं। वर्षा ऋतु में नमी रहती है, जिससे त्वचा रोगों का जोर भी रहता है साथ ही सर्दी-जुकाम, फ्लू, खांसी, बुखार, दमा भी इस ऋतु में सताने लगता है।

पेचिशः-पेचिश को आयुर्वेद की भाषा में प्रवाहिका एवं एलोपैथी में डीसेन्ट्री के नाम से जाना जाता है। इस रोग से ग्रस्त होने पर पेट में मरोड़ व ऐंठन, हाथ-पैरों में टूटन के साथ-साथ कमजोरी आने लगती है। रोगी को दस्त के साथ आंव (चिकना द्रव्य) गिरता है। रोग की मात्रा बढ़ने पर आंव के साथ खून भी आने लगता है। अधिक समय तक रोग बने रहने पर रोगी को चलने-फिरने में दिक्कत होने लगती है।

उपचार

1. उल्टी दस्त व आंव में अमृत धारा या कपूर के पानी में बना घोल लाभ करता है।

2. कुटज प्रवाहिका, पेचिश एवं अतिसार (पतले दस्त) जैसे उदर रोगों की सर्वश्रेष्ठ औषधि है। कुटज की छाल का काढ़ा बनाकर सेवन करने से पुराना से पुराना अतिसार व प्रवाहिका से राहत मिलती है।

3. इन रोगों में इन्द्रयव (कुटज के बीज) का काढ़ा सुबह सेवन करना विशेष लाभप्रद सिद्ध होता है। इसमें यदि मोचरस (सेमल का गोंद) मिला दिया जाए, तो आश्चर्यजनक लाभ होता है।

4. कुटज के नए मूल (जड़) की छाल खूनी पेचिश के लिए रामबाण औषधि है। इसकी जड़ की छाल को खट्टे मट्ठे में पीसकर दिन में तीन बार देने से रोगी को खूनी पेचिश से राहत मिलती है।

5. अधपका बेल लाकर उसका गूदा पानी में उबालें फिर छानकर उसमें शहद मिलाकर सेवन करें।

6. 10 ग्राम आंवले भिगो दें। जब नरम हो जाए, तो पीसकर थोड़ा काला नमक मिलाकर जंगली बेर के बराबर गोलियां बना लें। प्रातः-सायं एक-एक गोली चूसने से पेचिश रोग दूर हो जाता है।

गैस बननाः- वर्षा ऋतु में पेट में गैस की शिकायत होने की आशंका बन जाती है। इन दिनों वात रोगों का उभरना भी इस वजह से होता है। कुपित हो रही वायु की शांति के लिए विशेषकर मधुर, खट्टे और नमकीन (खारे) रस का सेवन करना चाहिए। चूंकि वर्षा ऋतु में शरीर आद्र् (भीगा) हो जाता है, इस क्लेश की शांति के लिए तीक्ष्ण, कड़वे और कैसले रस का भी सेवन करना चाहिए।

उपचार

1. पुदीना रस की 4-5 बूंदें आधा कप जल में डालकर पिएं।

2. हिंग्वाष्टक चूर्ण की एक छोटी चम्मच भर मात्रा कुनकुने जल से लें।

3. भुनी हींग, अजवाइन और काला नमक तीनों की बराबर मात्रा लेकर बारीक पीसकर 30 ग्राम, एक पुती लहसुन (एक कली वाला लहसुन) डालकर बारीक पीस लें। इस तैयार मिश्रण की मूंग के दाने जितनी छोटी-छोटी गोलियां बनाएं। गैस के कारण होने वाले पेट दर्द में यह बहुत जल्दी लाभ करती है।

4. प्रतिदिन चक्रासन करने से गैस ट्रबल की समस्या का निदान होता है।

पाचन क्रिया में गड़बड़ीः-वर्षा ऋतु में वात का प्रबल रहता है। शारीरिक दुर्बलता के चलते जो जठराग्नि ग्रीष्म ऋतु में कमजोर हो जाती है, वह वर्षा के कारण और कमजोर हो जाती है। पाचन अग्नि मंद होने से कम मात्रा में ग्रहण किया गया आहार भी नहीं पचता, जिससे अजीर्ण, उल्टी, शिथिलता एवं पेट में भारीपन रहता है।

उपचार

1. पाचन शक्ति कमजोर होने पर पुदीना, कालीमिर्च, सेंधानमक एवं जीरा की चटनी सेवन करना चाहिए। इससे भोजन में रुचि बढ़ती है। भोजन स्वादिष्ट लगता है एवं पाचन शक्ति में वृद्धि होती है। इसके सेवन से वायु विकार एवं पेट के अन्य विकार भी ठीक हो जाते हैं।

2. ताजी सब्जी और फलों (जैसे टमाटर, गाजर, सलाद, चुकंदर, संतरा, मौसमी आदि) का रस वृद्धावस्था में अत्यधिक लाभदायक होता हे। इनमें विटामिन, खनिज एवं अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं और ये आसानी से पच भी जाते हैं।

3. आंवले भूनकर गुठली निकालकर पीसकर घी में भूनें फिर जीरा, अजवाइन, सेंधानमक तथा थोड़ी भूनी हींग मिला दें। सुखाकर गोली बनाकर खाने से भूख बढ़ती है, पाचन होता है, डकार, चक्कर और दस्त मेंं लाभदायक है।

दमा (अस्थमा)-दमा एक जटिल पीड़ादायी, जानलेवा रोग है। यह कफ वातात्मक रोग है। फेफड़ों की सूक्ष्म नलिकाओं में कफ सूखकर इतना जम जाता है कि वह बराबर नहीं निकल पाता जिससे फेफड़ों की सूक्ष्म नलिकाओंं में सिकुड़न आ जाने से सांस न भीतर आ सकती है और न ही बाहर निकल पाती है, जिससे वायु लेने में रोगी पर जोर पड़ता है। अनेक बार सांस की यह परेशानी प्राणलेवा साबित हो सकती है।

उपचार

1. 7 ग्राम हल्दी, चार चम्मच देशी घी में सेंककर शीशी में भर लें। रोज आधा-आधा चम्मच गरम दूध के साथ फांकें। साथ ही हल्दी के टुकड़ों को घी में भूनकर धुंआ लें। दमा का नया दौर नहीं पडे़गा।

2. पीपल के पके फल छाया में सुखाकर पीस लें। 21 दिन ताजे जल के साथ सेवन करने से फायदा होता है।

3. दमा रोग में चार लहसुन (कली) छीलकर पीस लें। आधा गिलास दूध में लहसुन डालकर धीमी आंच पर गरम करें। जब यह आधा रह जाए, तो इसमें शक्कर डालकर पी जाएं। सांस सहज करने के लिए हल्के गरम पानी में लहसुन की बूंदें मिलाएं और रोगी को सुंघाएं। दो बूंद नाक में भी टपकाएं, उसे पिला भी दें। बहुत आराम होता है।

4. 6 ग्राम मेथी के बीजों को पानी में उबालकर छान लें फिर उसमें 20 ग्राम शहद मिलाकर पिएं। इससे दमे में लाभ मिलता है।

त्वचा रोगः-बरसात में दूषित पानी और नमी रहने के कारण विभिन्न त्वचा रोग कुछ अधिक ही होते हैं।

उपचार

1. खुजली से बचने के लिए नमक का कम सेवन करें।

2. नीम की पत्तियां उबालकर इस जल को और ताजे जल में मिलाकर स्नान करें या डिटॉल की 8-10 बूंदें पानी में डालकर नहाएं। नीम का साबुन प्रयोग करते रहने से खुजली के अलावा अन्य मौसमी त्वचा रोगों से बचाव बना रहेगा।

3. नीम की पत्तियां पीसकर दही में मिलाकर दाद-खाज-खुजली वाले हिस्से पर मलें। फायदा होने तक नित्य प्रयोग करें।

4. एरण्ड की जड़ का काढ़ा बनाकर देने से त्वचा रोगों में लाभ होता है।

5. तुलसी के पत्तों का रस ओर नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर खुजली वाली जगह पर रुई के फाहे से लगाएं।

यह भी पढ़ें -किडनी प्रॉब्लम को न करें अनदेखा

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