भारतीय संस्कृति में आषाढ़ मास का महत्त्व

Naresh Sharma

13th July 2020

हमारी संस्कृति में आषाढ़ मास को बेहद ही पवित्र और महत्त्वपूर्ण माना गया है। इस मास में वर्षा के आगमन एवं कई पर्वोंत्सवों विशेषकर गुरु पूर्णिमा के होने से इस मास की महत्ता और बढ़ जाती है।

भारतीय संस्कृति में आषाढ़ मास का महत्त्व

हमारी संस्कृति में आषाढ़ मास को बेहद ही पवित्र और महत्त्वपूर्ण माना गया है। इस मास में वर्षा के आगमन एवं कई पर्वोंत्सवों विशेषकर गुरु पूर्णिमा के होने से इस मास की महत्ता और बढ़ जाती है।समय की गणना एवं किसी कालखंड अथवा मास विशेष के मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का जितना सूक्ष्म विश्लेषण भारतीय पंचांग, ज्योतिष के ग्रंथों में किया गया है वैसा उदाहरण विश्व की किसी भी सभ्यता में संभव नहीं। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारतीय संस्कृति के ऐसे विलक्षण पहलू पूर्णरूपेण वैज्ञानिक आधार भी रखते हैं। इसी दृष्टि से यदि आषाढ़ मास का विश्लेषण किया जाए तो ज्ञात होता है कि साल के बारह महीनों में आषाढ़ मास का माहात्म्य निराला है। भारतीय पंचांगों में चौथा महीना आषाढ़ कहलाता है। चैत्र, वैशाख और ज्येष्ठ की भीषण गर्मी के पश्चात् आषाढ़ वर्षा के आगमन, ऋतु परिवर्तन तथा ऋतु संधिकाल का प्रतीक भी है। आषाढ़ मास में ही जगन्नाथपुरी में रथ महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की निराली-अनूठी पहचान बन चुका है। तमिल में आषाढ़ मास को 'अदि' भी कहा जाता है। सौर पंचांग के अनुसार सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश से आषाढ़ मास का प्रारंभ होता है जबकि चंद्र पंचांग के हिसाब से कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आषाढ़ मास की शुरुआत होती है। इस मास के अधिष्ठात्र विष्णु स्वरूप वामन हैं। ऐसी मान्यता है कि जल नक्षत्र उत्तराषाढ़ा के साथ इस मास की पूर्णिमा का विशेष संबंध है इसलिए इसे आषाढ़ नाम दिया गया है।

साहित्य में आषाढ़ मास

संस्कृत साहित्यिक समालोचना में आषाढ़ मास का अत्यन्त महत्त्व है। प्राय: इस मास का प्रयोग ऋतु वर्णन में आदि कवि से लेकर अर्वाचीन कवियों ने अपने महाकाव्यों, गीतिकाव्यों, गद्य-साहित्य एवं नाटकों में कर इसे अतीव गौरवान्वित मास माना है।

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के किष्किन्धा कांड में आषाढ़-मास के प्रारंभ में भगवान श्री राम के जनक नन्दनी की विरह में वर्षा ऋतु प्रवास का हृदय स्पर्शी वर्णन किया है। लौकिक साहित्य में आषाढ़ मास का सर्वाधिक वर्णन महाकवि कालिदास के विविध काव्यों यथा-रघुवंशम, कुमार सम्भवम, ऋतुसंहार, मेघदूत, अभिज्ञान शाकुन्तलम में मिलता है एवं मेघदूत का तो प्रारंभ ही आषाढ़ मासस्य प्रथमेदिवसे से कर महाकवि ने इस मास को वियोग एवं संयोग शृंगार हेतु सर्वाधिक विशिष्ट मास की संज्ञा दी है।

महाकाव्य कुमारसंभवम में भी पार्वती जब वर्षा ऋतु में तपस्या प्रवृत्त होती हैं तब महाकवि ने पार्वती एवं प्रकृति के सौन्दर्य में सन्जुल साम्यता का वर्णन किया है। इसी प्रकार भवभूति के एकमात्र नाटक उत्तरामचरित में भी अपहृत जानकी के वियोग से व्याकुल राम वर्षा ऋतु में साधारण जन के समान फूट-फूट कर रोए थे, उनकी इस मनोदशा से पत्थर भी द्रवित हो गए थे। आषाढ़ मास का ऐसा चित्रण साहित्य में निराला महत्त्व रखता है। महाकवि माध, भारवि, श्रीहर्ष के क्रमश: शिशुपाल वध, किरातार्जुनीयम नैषधीचरितम जैसे प्राचीन एवं पं. अम्बिकादत्त व्यास के शिवराजविजयम से अर्वाचीन साहित्य में वर्षा ऋतु के प्रथम मास आषाढ़-मास का न केवल प्रकृति चित्रण में अपितु श्रृंगार रस के दोनों पक्ष संयोग और वियोग श्रृंगार पर अपनी लेखनी द्वारा मनोहारी वर्णन कर इसे मार्मिक-अभिव्यंजक माना है।

चित्रकला एवं स्थापत्य कला में आषाढ़ मास

भारतीय चित्रकला की विभिन्न शैलियों जैसे मुगल, राजस्थानी, पहाड़ी, कांगड़ा शैलियों में बारहमासा, रागमाला, रसिप्रिया, नायक-नायिका नामक चित्रों में, भित्ति चित्रों में ऋतु वर्णन, प्रणय निवेदन के संदर्भ मे आषाढ़-मास का बड़ा सजीव चित्रण मिलता है। चित्रकारों ने चटकीले रंगों से आषाढ़ मास के प्राकृतिक सौन्दर्य, रिमझिम-रिमझिम वर्षा की सुहावनी फुहारों को श्रृंगार रस में लपेटकर अपनी तुलिकाओं से चित्रों पर सजीव ढंग से उकीर्ण कर दिखाया है। स्थापत्य शैलियों, मूर्त शिल्प में प्रकृति का सूक्ष्म चित्रण भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। बारह महीनों में आषाढ़ मास का मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को तक्षण कला में प्रयोग कर अमूर्त रूप को मूर्त रूप देकर कलाकारों ने कला के क्षेत्र में निराला कार्य किया है, जो आषाढ़ मास के सांस्कृतिक महत्त्व को प्रकट करता है।

आषाढ़- पावस फलदर्शक के रूप में

भारतीय ज्योतिष में आषाढ़ मास को वर्षा-के पूर्वानुमान के मास के रूप में आधार मास माना गया है। यह 'प्रावट काल' अथवा वर्षा के आरंभ का महीना है। यही कारण है कि आषाढ़ को ग्रीष्म-पावस के संधि मास की संज्ञा दी गई है। ज्योतिष, संहिताओं जैसे प्राचीन ग्रंथों में वर्षा विज्ञान के फलदर्शक के रूप में इसका गहन विश्लेषण किया गया है।

आषाढ़ी तोल

वराहमिहिर की वृहतसंहिता सदृश्य ग्रंथों में वर्षा और कृषि फसलों के उत्पादन के पूर्वानुमान के लिए आषाढ़ी तोल का उल्लेख मिलता है। पूर्णिमा के दिन विभिन्न अनाजों को तोलकर वर्षा के अनुमान का विधान है। इस क्रिया में अनाजों को दो बार तोला जाता था। इसमें वजन में कमी या वृद्धि को सांकेतिक रूप में समझकर वर्षा और फसलों के कम अथवा अधिक उत्पादन का अनुमान लगाने की विधि वर्णित है। आज भी भारत के ग्रामीण अंचलों में आषाढ़ी तोल की रस्म निभाई जाती है, जिसके शुभाशुभ संकेतों का अनुमान कर कृषक लाभ उठाते हैं।

पताका से वायु परीक्षण की परंपरा

प्राचीन भारतीय वेधशालाओं में आषाढ़ी योग में पताका बांधकर वायु परीक्षण करने की तकनीक बताई गई है। ऋषि पाराशर के अनुसार यदि पूर्णिमा को पूर्व दिशा से वायु प्रवाह हो, तो इसे सुवृष्टि का शुभ संकेत माना जाता है। इसी प्रकार यदि अग्निकोण से वायु चले तो फसल की हानि, दक्षिण से वायु का प्रवाह हो, तो मध्यम वर्षा का सूचक है। यदि नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ईशान दिशा से पवन चले तो क्रमश: फसल का विनाश, अच्छी वर्षा, वायु प्रकोप और फसल की वृद्धि का संकेतांक माना जाता है।

ऋषि नारद के मतानुसार आषाढ़ी पूर्णिमा को सूर्यास्त काल में यदि ईशान कोण से वायु का प्रवाह हो, तो धरती जल से परिपूर्ण होकर अन्न की वृद्धि करती है। गौधन, दुग्ध, कृषि फसलें, फल-फूल आदि का उत्पादन प्रचूर मात्रा में होता है। वेधशालाओं में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को वर्षा की स्थिति को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

आषाढ़स्य सिते पक्षे नवम्या यदि वर्षाति।

वर्षत्मेव तदा देवस्तात्रावृष्टौ कुतो जलम्॥

अर्थात् यदि नवमी को वर्षा होती है तो इसे वर्षभर के लिए अत्यन्त शुभ संकेत माना जाता है। अन्यथा जल के दर्शन भी दुर्लभ होते हैं। इस स्थिति में अकाल का संकेत समझा जाना चाहिए।

आषाढ़ मास में स्वाति नक्षत्र के फल का परीक्षण

भारतीय ज्योतिष ग्रंथों में आषाढ़ मास के स्वाति नक्षत्र का परीक्षण कर वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता है। इस विधान में दिन और रात्रि को तीन-तीन भागों में विभाजित किया जाता है। यदि रात्रि के प्रथम भाग में जिस क्षेत्र विशेष में वर्षा हो, तो उस क्षेत्र के सब धान्यों में वृद्धि का सूचक माना जाना चाहिए। दूसरे भाग में वर्षा होने पर तिल, मूंग, उड़द आदि में वृद्धि का अनुमान लगाया जाता है। तीसरे भाग में वर्षा खरीफ की फसल अच्छी लेकिन रबी की फसल के कम होने का सूचक होता है। इसी प्रकार के पहले, दूसरे तथा तीसरे भाग में वर्षा होने पर इसे क्रमश: अच्छे मानसून, कीट पतंगे, सर्पादि की व्याधा तथा मध्यम वर्षा के योग की संभावना मानी जाती है और यदि इस अवधि में दिन-रात वर्षा हो तो संपूर्ण वर्ष के दोष रहित होने का अनुमान लगाया जाता है।

आषाढ़: वर्षा के आगमन का सूचक

वर्षा ऋतु से जुड़े होने के कारण भारतीय जनमानस पर आषाढ़ का प्रभाव साफ नजर आता है। भारतीय अर्थव्यवस्था 21वीं सदी में भी मानसून पर टिकी है। अत: भारत में वर्षा के महत्त्व को कौन नहीं समझेगा। यह माह तप्त ज्येष्ठ मास के पश्चात् वर्षा की मीठी, सुगंधित फुहारों के लिए जाना जाता है। आषाढ़ लगते ही कृषक भाई आसमान पर काले बादलों की उम्मीद में नजरें टिकाने लगते हैं तो आम आदमी भी भीषण गर्मी से मुक्ति के लिए वर्षा का बेसब्री से इंतजार करता हैं। वर्षा की पहली फुहारें चेहरों पर नई रौनक उत्पन्न करती है। वर्षा के आगमन के साथ धरती पर हरियाली छाने लगती है। यह अमृत तुल्य वर्षा जीवनदान की तरह वरदान साबित होती है। किसान लोग खेतों की जुताई में लग जाते हैं। सबके जीवन में उमंग, जोश और उल्लास का संचरण होने लगता है। वर्षा का ऐसा उल्लास कवियों की कालजयी रचनाओं में खूब प्रस्फुटित हुआ है। पावस जनित उल्लास और आषाढ़ की मस्ती का वर्णन संस्कृत के महान कवि कालिदास की मेघदूत नामक कृति में देखते ही बनता है। प्रेम, सौन्दर्य और ​शृंगार​ ​ इस आषाढ़ मास में हिलोरें लेने लगता है। वन भोज, पिकनिक का दौर प्रारंभ हो जाता है। काले सघन मेघ देखकर प्रकृति नृत्य करने लगती है।

रथयात्रा महोत्सव

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से दशमी तक जगन्नाथपुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है जो देश-विदेश में प्रख्यात है। इस नौ दिवसीय महोत्सव में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा को तीन अलग-अलग अलंकृत रथों में विराजमान कर श्री गुण्डिचा मन्दिर ले जाया जाता है। दशमी के दिन भगवान की यात्रा वापस पुरी स्थित मूल मंदिर लौटती है। आषाढ़ मास का यह सबसे महत्त्वपूर्ण पर्व माना जाता है जो करोड़ों भक्तों की आस्था से जुड़ा है।

आषाढ़ मास का धार्मिक महत्व

धर्मशास्त्रों में आषाढ़ मास में भगवान विष्णु की पूजा-उपासना का विशेष उल्लेख मिलता है। हरिभक्ति विलास ग्रंथ के अनुसार अकाल मृत्यु, असाध्य रोगों के निवारण, कल्याण और यथेष्ठ समृद्धि की प्राप्ति हेतु आषाढ़ मास में शालिग्राम स्वरूप विष्णु भगवान को जलशायी कर विभिन्न प्रकार के पुष्पों से उनकी पूजा-उपासना करने का विधान वर्णित है। इस कार्य से यम-यातना से मुक्ति मिलती है। विष्णु जी को जल का सृष्टा एवं जलप्रिय माना गया है, अत: जलस्थ विष्णु के पूजन से कुटुम्ब का कल्याण होता है। इस विधान से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में वर्षा न होने की स्थिति में शालिग्राम को जलशायी करने की परंपरा थी जो कालान्तर में शिवलिंग के साथ भी जुड़ गई।

आषाढ़ मास के प्रमुख पर्व-त्योहारों में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा महोत्सव, तो सर्वप्रमुख है ही इसके अतिरिक्त आषाढ़ कृष्ण पक्ष में कोकिला पंचमी, योगिनी एकादशी तथा शुक्ल पक्ष में विनायक चतुर्थी, स्कन्द पंचमी, कांसुबा षष्ठी (बंगाल), भीमाष्टमी, भडल्या नवमी, आशा दशमी, देव शयनी एकादशी, चौमासी चौदस और गुरु पूर्णिमा इत्यादि प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से इन सभी पर्वों-व्रतों का खास महत्त्व है। इनमें से कुछ प्रमुख पर्वों का वर्णन निम्न प्रकार है:-

देवशयनी एकादशी

आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी पर मान्यता है कि इस दिन देवता शयन करना प्रारंभ करते हैं, अत: इस अवधि में समस्त शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। कार्तिक मास में देवोत्थान एकादशी के दिन देवताओं का शयन समाप्त होता है, अत: शुभ कार्य पुन: प्रारंभ हो जाते हैं।

गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ पूर्णिमा गुरु के प्रति श्रद्धा को समर्पित है। इस दिन लोग अपने गुरु को मिलन, भेंट, उपहार प्रदान कर अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

योगिनी एकादशी

आषाढ़ के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। इसे बड़े से बड़े पापों का नाश करने वाली माना गया है। भव सागर में डूबे प्राणियों के लिए इसे सारभूत व्रत माना गया है। इस पर्व से जुड़ी अंतर्कथा के अनुसार एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से इस व्रत का माहात्म्य पूछा। तब श्री कृष्ण ने बतलाया कि अलकापुरी के शिव भक्त कुबेर ने अपने एक दास हेममाली को शिव पूजन हेतु पुष्प लाने भेजा किन्तु हेममाली अपनी सुन्दर पत्नी विशालाक्षी के सौन्दर्य में डूबकर कुबेर की आज्ञा का उल्लंघन कर बैठा। अत: कुबेर के शाप से हेममाली कोढ़ग्रस्त हो गया। कालान्तर में मुनिवर मार्कण्डेय ने हेममाली को योगिनी एकादशी के व्रत का सुझाव दिया। इस व्रत को करने से हेममाली शाप मुक्त हुआ। अत: इस व्रत को पाप विनाशक तथा पुण्य फलदायक माना गया है।

कोकिला व्रत

यह व्रत आषाढ़ी पूर्णिमा से प्रारंभ कर श्रावणी पूर्णिमा तक किया जाता है। इसे अखंड सौभाग्य का व्रत माना जाता है। इस व्रत में महिलाएं गौरी का कोकिला के रूप में पूजन करती हैं। इस व्रत से भगवान शिव और सती की कथा जुड़ी हुई है। शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए सती ने तप किया और अंत में पार्वती के रूप में जन्म लेकर आषाढ़ कोकिला पूर्णिमा से एक मास का यह पावन व्रत किया। फलस्वरूप उन्हें भगवान शिव को पति के रूप में पाने में सफलता प्राप्त हुई।

जैन धर्म और आषाढ़ मास

जैन धर्म में चातुर्मास का प्रारंभ भी प्राय: आषाढ़ मास से होता है। जो कार्तिक मास के पूर्व पक्ष तक चलता है। जैन दर्शन में चातुर्मास आध्यात्मिक जागृति का पर्व माना जाता है।

आयुर्वेद और आषाढ़ मास

आयुर्वेद वात, पित्त और कफ के संतुलन को मानव जीवन का आधार मानता है। इस क्रम में आषाढ़ मास के विषय में आयुर्वेद का मत है कि इस माह में वर्षाजनित प्रभाव से मानव शरीर में वात का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे शरीर की जैविक एवं पाचन क्रियाएं प्रभावित होती हैं। अत: इस मास में टायफाइड, डायरिया, मलेरिया, डेंगू जैसे रोगों के संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए इस समय खट्टा-नमकीन खाद्य पदार्थों से परहेज तथा उनके कम सेवन की सलाह दी जाती है। शुद्ध पेयजल पर अधिक जोर दिया जाता है।

 

 

 

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