श्रीराम द्वारा स्थापित शिवधाम है रामेश्वरम्

Dr. Hanauman Prasad Uttam

21st July 2020

रामेश्वरम् भारत के दक्षिणी सिरे पर हिंद महासागर के पास तमिलनाडु के रामनाथपुरम् जिले में स्थित है। यह हिंदुओं का मुख्य पवित्र तीर्थस्थल है। यह चार धामों में से एक है। यह 61 किलोमीटर क्षेत्रफल का एक द्वीप यानि टापू है जो एक लम्बे पुल द्वारा प्रमुख भूमि से संलग्न है। यह द्वीप शंख की आकृति का है। बंगाल समुद्र को हिंद महासागर से जोड़ने वाला यह इलाका भूगोल में 'पाक स्ट्रीट (palk strait)' यानि जलडमरु मध्य कहलाता है।

श्रीराम द्वारा स्थापित शिवधाम है रामेश्वरम्

दक्षिण रेलवे के मद्रास एगमोर-तिरुच्चिराप्पल्लि-रामेश्वरम् रेल मार्ग पर तिरुच्चिराप्पल्लि से 270 किलोमीटर की दूरी पर रामेश्वरम् स्टेशन है। रेलवे स्टेशन से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण भारत का आकार के अनुसार तृतीय वृहतम मंदिर ‘रामेश्वरम् मंदिर' है। इसकी विशालता और भव्यता अद्भूत है। इस मंदिर को स्वामीनाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह भव्य मंदिर 151 एकड़ जमीन पर बना हुआ है। यह मंदिर द्रविड़ शैली का उत्कृष्ट नमूना है। इस मंदिर के पूर्वी द्वार पर दस मंजिला और पश्चिमी द्वार पर सात मंजिला गोपुरम् बना है। इस मंदिर के बरामदे चार हजार फुट लंबे हैं, जो विश्व के वृहतम् लंबे बरामदे माने जाते हैं। बरामदों के स्तंभों पर की गई नक्काशी अपनी कला तथा सुंदरता से दर्शकों को मुग्ध कर देती है। यह मंदिर 12 सदी में बनना शुरु हुआ था। श्रीलंका के राजा पराक्रम बाहु ने मंदिर का गर्भगृह बनवाया था। बाद में तमाम राजा निर्माण तथा विस्तार कार्य कराते रहे तथा 350 वर्षों में यह पूरा हुआ। यह भारत का अद्वितीय मंदिर है

रामेश्वरम् मंदिर के गर्भगृह में रामनाथ स्वामी के प्रतीक के रुप में एक शिवलिंग है। कहा जाता है कि इसकी स्थापना स्वयं श्रीराम और सीता जी ने की थी। इसलिए इस लिंग को ‘रामलिंग' भी कहते हैं। रामनाथ शिवलिंग के दाहिनी ओर पार्वती का मंदिर है। प्रत्येक शुक्रवार को पार्वती की प्रतिमा का आकर्षक शृंगार  किया जाता है। उन्हें सोने की पालकी में बिठाकर पूरे मंदिर की परिक्रमा कराई जाती है। रामनाथ मंदिर के उत्तर में भगवान शिवलिंगम् का मंदिर है और उसके पास ही विशालाक्षी का भी मंदिर है।

रामनाथ स्वामी मंदिर के विस्तृत परिसर में तमाम मंदिर हैं जिनमें शेषनारायण भगवान का मंदिर उल्लेखनीय है। इस मंदिर में भगवान विष्णु शेषनाग को बिछौना बनाकर शयन कर रहे हैं। रामनाथ मंदिर परिसर में बाइस कुंड हैं। मान्यता है कि इन कुंडों में स्नान करने से तमाम रोग नष्ट हो जाते हैं। मंदिर के पूर्वी गोपुरम् के सामने समुद्र तट है जो अग्नि तीर्थम् कहलाता है। श्रद्धालु पहले अग्नि तीर्थ में स्नान करते हैं फिर उन्हीं गीले वस्त्रों में मंदिर में आकर उन समस्त बाइस कुंडों में स्नान करते हैं।

कहा जाता है कि सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए श्रीराम ने यहीं से रावण के विरुद्ध युद्ध प्रारंभ किया था। श्रीराम ने अपनी वानर सेना की सहायता से यहां लकड़ी, घास-फुस तथा पत्थरों का पुल बनाकर समुद्र पार किया था। यह स्थान सेतुबंध रामेश्वरम् के नाम से भी जाना जाता है। लंका विजय के पश्चात् श्रीराम ने धनुष की नोंक से पुल तोड़ दिया था जो कि धनुष कोटि कहलाया। आज धनुष कोटि एक बंदरगाह के रुप में विख्यात है। इस बंदरगाह से श्रीलंका के लिए जहाज आया-जाया करते हैं। यहां से श्रीलंका की दूरी मात्र 25 किलोमीटर है।

पौराणिक कथानुसार लंका में विजय के पश्चात् श्रीराम ने रावण की हत्या से लगे पाप से मुक्ति पाने के लिए शिव की उपासना करने का संकल्प किया। श्रीराम ने हनुमान जी से कैलाश जाने को तथा स्वयं शंकर भगवान से ही उनकी कोई उपयुक्त मूर्ति लाने को कहा। हनुमान जी कैलाश गए, लेकिन उन्हें अभीष्ट मूर्ति नहीं मिल सकी। अतः हनुमान जी ने उसके लिए तपस्या प्रारंभ कर दी। इधर हनुमान जी को देरी होते देख श्रीराम और ऋषियों ने मूर्ति स्थापना कर शुभमुहूर्त गवाना यथेष्ट नहीं समझा। इसलिए सीता जी द्वारा बनाए गए बालू के शिवलिंगों को उन्होंने स्वीकार कर लिया तथा सीता और राम ने उस ज्योतिर्लिंग को ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार को, जब चन्द्रमा हस्त-नक्षत्र में सूर्य वृष राशि में था, स्थापना की, जो कि रामेश्वरम् के नाम से प्रख्यात हुआ।

कुछ समय उपरांत जब हनुमान कैलाश से शिवलिंग सहित लौटे, तो वहां पहले से स्थापित शिवलिंग को देखकर नाराज हो गए। हनुमान की नाराजगी समाप्त करने के लिए राम ने पहले से स्थापित शिवलिंग के बगल में ही हनुमान जी द्वारा लाए गए शिवलिंग को भी स्थापित कर दिया तथा यह घोषणा भी की रामेश्वरम् की आराधना करने से पूर्व लोग हनुमान द्वारा लाए गए शिवलिंग, जिसका नाम काशी विश्वनाथ रखा गया था, की आराधना करेंगे। आज तक यह रिवाज चला आ रहा है कि श्रद्धालुगण रामेश्वरम् की आराधना से पूर्व काशी विश्वनाथ की ही आराधना करते हैं।

रामेश्वरम् से करीब दो किलोमीटर दूरी पर गंधमदन पर्वत अथवा पहाड़ी पर श्री रामचन्द्र जी के चरण बने हैं। यहां से रामेश्वरम् मंदिर और द्वीप का मनोहर दृश्य दिखाई देता है। यहां ‘राम झरोखा' भी है। ऐसी मान्यता है कि श्रीराम ने इस झरोखे से झांककर समुद्र का अवलोकन किया और समुद्र विस्तार नापकर लंका आक्रमण की योजना बनाई थी। ‘राम झरोखे' में अगस्त्य मुनि का आश्रम भी है। ऐसा माना जाता है कि लंका जाने से पूर्व दर्भघास पर श्रीराम ने विश्राम किया था। रामेश्वरम् के उत्तर पूर्व में 16 किलोमीटर की दूरी पर नौ ग्रहों वाला नव पाशनम मंदिर है। यह देवी परनम के नाम से भी जाना जाता है। रामेश्वरम् से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्मण तीर्थ है। जहां श्रद्धालुगण स्नान करते हैं। लक्ष्मण तीर्थ में मुडन ओर श्राद्ध भी होता है। यहां पर लक्ष्मणेश्वर शिव मंदिर भी है। यहां से लौटते समय सीता तीर्थ मिलन है। यहां श्रीराम तथा पंचमुखी हनुमान की मूर्ति है। उससे कुछ आगे रामतीर्थ नामक बड़ा सरोवर है। इसका जल खारा है। इसी सरोवर के किनारे श्रीराम मंदिर दर्शनीय है।

रामेश्वरम् मंदिर में वर्ष भर उल्लास, उमंग तथा उत्सव का वातावरण रहता है। जनवरी-फरवरी में तैराकी पर्व की धूम रहती है। फरवरी-मार्च में महाशिवरात्रि के वजह भक्ति तथा उपासना का वातावरण रहता है। जुलाई-अगस्त का मास तिरुकल्याणम् अथवा प्रभु के विवाह की धूम से बीत जाता है। लाखों भक्त रामेश्चरम् आकर अग्नितीर्थम् में डुबकी लगाते हैं तथा अपने पूर्वजों की सुख-शांति और मुक्ति की कामना करते हैं।

समुद्र ने रामेश्वरम् घाट को मुख्य भूमि से विलग कर दिया है। मंडपम् तथा पमवन रेल स्टेशनों के बीच पमवन रेल पुल है। यह देश का सबसे बड़ा पुल है। जिसका निर्माण कार्य करीब 10 वर्ष में पूरा हुआ था। पुल के निर्माण के पश्चात् सड़क मार्ग से रामेश्वरम् की यात्रा सुगम हो गई है। मदुरै से रेल या बस द्वारा रामेश्वरम् सुगमता से पहुंचा जा सकता है। समुद्र के बीच रेलगाड़ी बड़ी मनोहारी लगती है। रामेश्वरम् का निकटम हवाई अड्डा मदुरै है जो रामेश्वरम् से करीब 173 किलोमीटर की दूरी पर है।

रामेश्वरम् पर्यटन की यादें संजोकर रखने के लिए यहां से शंख, मनके और ताड़ के पत्तों से निर्मित विभिन्न आकर्षक वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं जो कि रामनाथ स्वामी मंदिर के आसपास के बाजार में सरलता से मिल जाती हैं। 

 

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