गणेश जी ने क्यों दिया था चंद्रमा को श्राप

Jyoti Sohi

26th August 2020

मानवीय शरीर पर गज का सिर होने के बावजूद भी गणेशजी की बनावट हर मन को भाती है और वो सबके प्रिय भी हैं। पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार चंद्रमा गणेशजी के भयंकर गुस्से का शिकार हुए थे, जिसका असर आज भी जारी है। इसी सर्दभ में धर्मशास्त्रों में एक नहीं बल्कि कई कथाएं प्रचलित हैं। आइए आज हम आपको सुनाते हैं इसी विषय से जुड़ी रोचक कथाएं।

गणेश जी ने क्यों दिया था चंद्रमा को श्राप
नाटा कद, मोटा पेट, गज का सिर और मूषक को अपनी सवारी बनाने वाले गणेश जी हिंदू धर्म में विध्नहर्ता के नाम से जाने जाते हैं। मानवीय शरीर पर गज का सिर होने के बावजूद भी गणेशजी की बनावट हर मन को  भाती है और वो सबके प्रिय भी हैं। पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार चंद्रमा गणेशजी के भयंकर गुस्से का शिकार हुए थे, जिसका असर आज भी जारी है। इसी सर्दभ में धर्मशास्त्रों में एक नहीं बल्कि कई कथाएं प्रचलित हैं। आइए आज हम आपको सुनाते हैं इसी विषय से जुड़ी रोचक कथाएं। 
1. एक पौराणिक कथा के अनुसार एक दिन कैलाश पर ब्रहम देव महादेव के दर्शनों के लिए गए। तभी वहां देवर्षि नारद ने प्रकट होकर अतिस्वादिष्ट फल भगवान शंकर को अर्पित किए। उसी क्षण कार्तिकेय और गणेश दोनों ही उस फल की मंाग करने लगे। ब्रहम देव ने महादेव को परामर्श देते हुए कहा कि फल कार्तिकेय को दे दिया जाए। इस बात से गजानन गुस्सा हो गए और दुखी होकर ब्रहम देव के सृष्टि रचना के कार्य में विघ्न डालने लगे। गणपति का उग्र रूप देख ब्रहम देव भयभीत हो उठे। अब इन लालाओं को देखकर चंद्रदेव के चेहरे पर मुस्कान आ गई और वो ज़ोर से हंसने लगे। चंद्रमा की हंसी की आवाज़ गणेश जी के कानों तक पहुंच गई। उनकी हंसी सुनकर गणेश जी रूष्ठ हो गए और फिर उन्होंने गुस्से में चंद्रमा को श्राप दे दिया और कहा कि तुम अब किसी को देखने योग्य नहीं रहोगे। कहा जाता है कि श्रापित चंद्रदेव ने 12 बरसों तक गणपति का तप किया। उसके तप से प्रसन्न होकर उन्होंने श्राप को मंद कर दिया। मंद श्राप के अनुसार जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी चंद्रमा को देखता है वो निश्चय ही अभिशाप का भागी होता है और उस पर मिथ्यारोपण लगते हैं।   
2. शास्त्रों के मुताबिक एक अन्य कथा में भगवान गणेश को गज का मुख लगाया गया, तो वे गजवदन कहलाए। सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की पर चंद्रमा मंद मंद मुस्कुराते रहा। उन्हें मन ही मन अपने सौंदर्य पर अभिमान हो रहा था। उनके व्यवहार को देखकर गणेशजी समझ गए कि चंद्रमा अभिमान वष  उनका उपहास कर रहा है। क्रोध में आकर भगवान श्री गणेश ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि तुम्हें अपनी सुदंरता पर घमण्ड है, तो तुम अब काले हो जाओ। तो चंद्रमा को अपनी भूल का अहसास हो गया। तो उन्होंने बिना विलंम्भ के श्री गणेश से क्षमा मांगी, तो श्रीगणेश ने कहा सूर्य के प्रकोष को पाकर तुम एक दिन पूर्ण होगे यानि पूर्ण प्रकाशित होंगे। लेकिन आज का दिन तुम्हे दंड देने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इस दिन को याद करके अब कोई भी अपने सौंदर्य पर अभिमान नहीं करेगा। जो कोई व्यक्ति भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन तुम्हारे दर्षन करेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा। 
 
3. एक अन्य पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार देवताओं ने एक सभा का आयोजन किया । उसमे सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया। सभी देवगण समय से सभा में पहुंच गए ,लेकिन गणेशजी को थोड़ी देरी हो गई। अब सभा में उनका तीव्रता से इंतजार हो रहा था, वो दौड़ते-दौड़ते सभा में पहुंचे। कहते हैं कि उनकी यह दशा और जल्दबाज़ी देखकर चंद्रमा को हँसी आ गई । इस पर गणेशजी को गुस्सा आ गया और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दे दिया "कि आज से जो भी तुम्हें देखेगा उस पर चोरी का इल्जाम लगेगा । अब ये सब सुनकर सारे देवता हैरान रह गये की ऐसा कैसे हो सकता है चंद्रमा तो रोज रात में उदय होता है और रोज सब लोग इसे निहारते भी हैं और चंद्रमा की छायां में विश्राम भी करते हैं, तब तो सारी दुनिया ही कलंकित हो जाएगी ।अब सभी देवताओ ने मिलकर गणेशजी से प्रार्थना की "कि प्रभु अगर ऐसा हुआ तो चंद्रमा कभी उदय नहीं होगा और यदि उदय हुआ तो सारी दुनिया ही कलंकित हो जाएगी । अब सभी देवता गणेश को मनाने की जुगत में जुट गए। जब गणेशजी का गुस्सा शांत हुआ तो वे बोले "कि भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को जो चंद्रमा को देखेगा उसे कलंक जरूर लगेगा "। देवताओं ने कहा ठीक है फिर पूछा "कि इससे बचने का कोई उपाय है प्रभु "। तब गणेशजी बोले "कि मेरी जन्म तिथि से पहले जो दूज तिथि आती है उस दिन चाँद के दर्शन कर लेगा उस पर इस श्राप का असर नहीं पड़ेगा "। इस प्रकार गणेशजी के श्राप की वजह से ही गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन निषेध माना जाता है ।
4. एक बार कुबेरजी भगवान शिव तथा माता पार्वती के पास एक आमंत्रण लेकर कैलाश पर्वत पहुंचे। वे चाहते थे कि शिव तथा पार्वती उनके महल आकर उनके यहां भोजन करें लेकिन शिवजी कुबेर की मंशा को समझ गए थे। अंत में कुबेर गणेश को ही ले जाने के लिए राज़ी हो गए। गणेशजी ने उस रात कुबेर के महल में पेट भरकर भोजन किया। निकलते समय गणेशजी ने ढेर सारी मिठाइयों को अपनी गोद में रखा और अपने मूषक पर सवार होकर निकल पड़े। तभी गणेशजी के मूषक ने मार्ग में एक सर्प देखा और भय से उछल पड़े। इस कारण गणेशजी अपना संतुलन खो बैठे और काफी तेजी से नीचे गिर पड़े। उनकी आंखें आकाश पर पड़ीं तो उन्होंने चंद्रमा को हंसते हुए देखा। वे पल भर में क्रोध से भर गए और चंद्रमा को चेतावनी देते हुए बोलेए श्घमंडी चंद्रमा! जाओ मैं तुम्हे श्राप देता हूं कि आज के बाद तुम इस विशाल गगन पर राज नहीं कर सकोगे। श्गणेशजी के मुख से श्राप के लफ्ज़ निकलते ही चारो ओर अंधेरा छा गया। चंद्रमा की रोशनी कहीं गायब हो गई। वह भयभीत हो गया और अगले ही पल गणेशजी के चरणों में आकर माफी मांगने लगाए श्हे देवए मुझे क्षमा कीजिए और मुझे अपने इस श्राप से मुक्त कीजिए। चंद्रमा को यूं लाचार देखकर गणेशजी का गुस्सा कम होने लगा। वे मुस्कुराए और उन्होंने चंद्रमा को माफ किया परन्तु बोलेए मैं अब चाहकर भी अपना श्राप वापस नहीं ले सकता। गणेशजी ने चंद्रमा से कहा कि ऐसा अवश्य होगा कि तुम अपनी रोशनी खो दोगे लेकिन एक माह में ऐसा केवल एक ही बार होगा। इसके बाद तुम फिर से समय के साथ वापस बढ़ते जाओगे और फिर 15 दिनों के अंतराल में अपने सम्पूर्ण वेष में नजर आओगे। गणेशजी का दिया हुआ यह श्राप आज भी कार्य करता है। आज भी चंद्रमा धीरे.धीरे कम होता है और माह में एक दिन अपने पूर्ण आकार में आता हैए जिसे पूर्णमासी कहा जाता है।
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