साईं बाबा की समाधि से जुड़ी विशेष बातें, दशहरे के दिन ही क्यों ली समाधि

Jyoti Sohi

24th October 2020

सांईं बाबा ने शिर्डी में यहीं 15 अक्टूबर दशहरे के दिन 1918 में समाधि ली थी। यह समाधि सवा दो मीटर लंबी और एक मीटर चैड़ी है। समाधि मंदिर के अलावा यहां द्वारकामाई का मंदिर चावड़ी और ताजिमखान बाबा चैक पर सांईं भक्त अब्दुल्ला की झोपड़ी है। मान्यता है कि महज 16 वर्ष की उम्र में सांईं बाबा शिर्डी आए थे और फिर वहीं रहने लगे।

साईं बाबा की समाधि से जुड़ी विशेष बातें, दशहरे के दिन ही क्यों ली समाधि
साईं बाबा के अनमोल वचन लोगों के लिए एक मार्गदर्शन है। दरअसल, साईं बाबा किसी धर्म का नहीं बल्कि अनमोल विचारों का प्रचार करते थे। उनकी महिमा का गुणगान हर ओर है। वे जीवनभर अच्छाई के राह पर चलने के लिए प्रेरित करते रहे और सबका मालिक एक जैसे वचन से लोगों में एकता की भावना को बढ़ावा भी दिया। शिर्डी, महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले की राहटा तहसील में विश्वप्रसिद्ध संत सांईं बाबा ने समाधि ली। यहां दुनियाभर से सांईं बाबा के भक्त उनके समाधि दर्शन के लिए आते हैं। सांईं बाबा ने शिर्डी में यहीं 15 अक्टूबर दशहरे के दिन 1918 में समाधि ली थी। यह समाधि सवा दो मीटर लंबी और एक मीटर चैड़ी है। समाधि मंदिर के अलावा यहां द्वारकामाई का मंदिर चावड़ी और ताजिमखान बाबा चैक पर सांईं भक्त अब्दुल्ला की झोपड़ी है। मान्यता है कि महज 16 वर्ष की उम्र में सांईं बाबा शिर्डी आए थे और फिर वहीं रहने लगे।
समाधि से पहले
दो-तीन दिन पूर्व ही प्रातःकाल से बाबा ने भिक्षाटन करना स्थगित कर दिया और वे मस्जिद में ही बैठे रहने लगे। वे अपने अंतिम क्षण के लिए पूर्ण सचेत थे इसलिए वे अपने भक्तों को धैर्य बंधाते रहते। जब बाबा को लगा कि अब जाने का समय आ गया है, तब उन्होंने श्री वझे को रामविजय प्रकरण (श्री रामविजय कथासार) सुनाने की आज्ञा दी। श्री वझे ने एक सप्ताह प्रतिदिन पाठ सुनाया। तत्पश्चात ही बाबा ने उन्हें आठों प्रहर पाठ करने की आज्ञा दी। श्री वझे ने उस अध्याय की द्घितीय आवृत्ति 3 दिन में पूर्ण कर दी और इस प्रकार 11 दिन बीत गए। फिर 3 दिन और उन्होंने पाठ किया। अब श्री. वझे बिलकुल थक गए इसलिए उन्हें विश्राम करने की आज्ञा हुई। बाबा अब बिलकुल शांत बैठ गए और आत्मस्थित होकर वे अंतिम क्षण की प्रतीक्षा करने लगे। इन दिनों काकासाहेब दीक्षित और श्रीमान बूटी बाबा के साथ मस्जिद में नित्य ही भोज करते थे। महानिर्वाण (15 अक्टूबर) के दिन आरती समाप्त होने के पश्चात बाबा ने उन लोगों को भी अपने निवास स्थान पर ही भोजन करके लौटने को कहा। फिर भी लक्ष्मीबाई शिंदे, भागोजी शिंदे, बयाजी, लक्ष्मण बाला शिम्पी और नानासाहेब निमोणकर वहीं रह गए। शामा नीचे मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठी थीं।
लक्ष्मीबाई शिंदे को 9 सिक्के देने के पश्चात बाबा ने कहा कि मुझे मस्जिद में अब अच्छा नहीं लगता है इसलिए मुझे बूटी के पत्थरवाड़े में ले चलो, जहां मैं सुखपूर्वक रहूंगा। ये ही अंतिम शब्द उनके श्रीमुख से निकले। इसी समय बाबा बयाजी के शरीर की ओर लटक गए और अंतिम श्वास छोड़ दी। भागोजी ने देखा कि बाबा की श्वास रुक गई है तब उन्होंने नानासाहेब निमोणकर को पुकारकर यह बात कही। नानासाहेब ने कुछ जल लाकर बाबा के श्रीमुख में डाला, जो बाहर आया। तभी उन्होंने जोर से आवाज लागाई... अरे। देवा! बाबा समाधिस्थ हो गए। यहाँ उनका मंदिर भी है और श्रद्धालु हर साल समाधि पर चादर चढ़ाते हैं।
साईं बाबा की समाधि की कहानी
कहते हैं कि विजयादशमी के दिन साईं बाबा ने भविष्यवाणी करते हुए अपनी परम भक्त बैजाबाई के बेटे के निधन की बात कही थी। उसका नाम तात्या था और साईं बाबा को वह मामा कहकर बुलाता था। साईं बाबा ने उसका जीवन बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने का फैसला लिया। अंतिम दो दिन उन्होंने भिक्षा नहीं ली और अपने भक्तों को धैर्य बंधाते रहे। जीवन के अंतिम समय में उन्होंने श्री रामविजय कथासार अपने भक्तों से सुना। समाधि से पहले साईं बाबा ने भक्तों को मस्जिद छोड़कर बूटी के पत्थरवाड़े में लेकर जाने का निवेदन किया।  साईं बाबा ने अपनी भक्त लक्ष्मीबाई शिंदे को 9 सिक्के दिए और अंतिम सांस ली।  बैजाबाई के पुत्र तात्या की तबियत उस समय काफी खराब थी और बचने की उम्मीद भी नहीं थी और उसे बचाने के लिए साईं बाबा ने पहले ही दशहरा के दिन महापर्याण का फैसला लिया था।
साईं बाबा की ईंट 
सांईं बाबा के पास एक ईंट हमेशा रहती थी। वे उस ईंट पर ही सिर रखकर सोते थे। दरअसलए यह ईंट उस वक्त की हैए जब सांईं बाबा वैंकुशा के आश्रम में पढ़ते थे। वैंकुशा के मन में बाबा के प्रति प्रेम बढ़ता गया और एक दिन उन्होंने अपनी मृत्यु के पूर्व बाबा को अपनी सारी शक्तियां दे दीं और वे बाबा को एक जंगल में ले गएए जहां उन्होंने पंचाग्नि तपस्या की। वहां से लौटते वक्त कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी लोग सांईं बाबा पर ईट.पत्थर फेंकने लगे। बाबा को बचाने के लिए वैंकुशा सामने आ गए तो उनके सिर पर एक ईंट लगी। वैंकुशा के सिर से खून निकलने लगा। बाबा ने तुरंत ही कपड़े से उस खून को साफ किया। वैंकुशा ने वहीं कपड़ा बाबा के सिर पर तीन लपेटे लेकर बांध दिया और कहा कि ये तीन लपेटे संसार से मुक्त होने और ज्ञान व सुरक्षा के हैं। जिस ईंट से चोट लगी थीए बाबा ने उसे उठाकर अपनी झोली में रख लिया। इसके बाद बाबा ने जीवनभर इस ईंट को ही अपना सिरहाना बनाए रखा। सन् 1918 ईण् के सितंबर माह में दशहरे से कुछ दिन पूर्व मस्जिद की सफाई करते समय बाबा के एक भक्त माधव फासले के हाथ से गिरकर वह ईंट टूट गई। द्वारकामाई में उपस्थित भक्तगण स्तब्ध रह गए। सांईं बाबा ने जब उस टूटी हुई ईंट को देखा तो वे मुस्कुराकर बोले. श्यह ईंट मेरी जीवनसंगिनी थी। अब यह टूट गई है तो समझ लो कि मेरा समय भी पूरा हो गया।
शिरडी में साईं बाबा के मंदिर का निर्माण साईं की समाधि के ऊपर किया गया है। साईं के परोपकारी कामों को आगे बढ़ाने के लिए 1922 में यह मंदिर बनवाया गया था। साईं 16 साल की उम्र में शिरडी आए थे और समाधि में लीन होने तक वे यहीं रहे।  साईं बाबा को मनने वालों में केवल हिंदू ही नहीं बल्कि देश में मौजूद लगभग सारे धर्म के लोग अपने.अपने तरह से साईं बाबा की पूजा करते हैं और उन्हें खुश करने का प्रयास करते हैं। दरअसलए ऐसा कहा जाता है कि साई बाबा का न तो कोई धर्म था न ही कोई जात। यहां तक की उन्हें उनका नाम भी पंडित के पुजारी ने दिया था। इन सबके बावजूद शिरडी में मौजूद साईं बाबा मंदिर में भक्तों का मेला लगा रहता है। सभी धर्म के लोग यहां आते हैंए साईं बाबा के आगे माथा टेकते हैं और मन्नत मांगते हैं। 

 

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