बहू को ही दोष क्यों

Jyoti Sohi

11th February 2021

किचन में घंटों बिताने वाली एकमात्र बहू ही होती है जो तारीफ की हकदार होती है, लेकिन अगर कोई गलती से खाने की तारीफ कर दे, तो सासू मां छूटते ही कहती हैं, इतने सालों से बना रही है, क्या अब भी खाना बनाना नहीं आएगा।

बहू को ही दोष क्यों

बेटी की बात हो, तो वो हर पैमाने पर सही और अगर बहू की बात हो तो वो हमेशा गलत। क्यों भई, बहू ने कुछ अच्छा किया तो हमनें सिखाया है इसे,  और अगर बेटी ने अच्छा किया, तो भई ये तो इसके संस्कारों में है। ये तो हर काम समझ बूझ के साथ करती है। बेहद गुणकारी है, हो भी क्यों न मां बाप की लाडो जो है। तो क्या बहुएं किसी की लाडो नहीं है, क्या उनके अंदर दिल नहीं है, क्या उन्हें खुश रहने का हक नहीं है। बेटी को मालकिन का दर्जा और दूसरी ओर बहू को नौकरानी जैसा जीवन। अरे भाई ऐसा क्यों। हम सब के घरों में आमतौर पर कुछ ऐसा ही नज़ारा होता है कि कोई अगर मेहमान घर पर आ जाए, तो बेटी और बाकी सदस्य तो ठाठ से बैठे और गप हांकते हुए नज़र आते हैं और एकमात्र बहू ही एक ऐसा प्राणी है, जो एक पैर पर खड़े रहकर रसोई संभालती है और महमान नवाज़ी में जुटी होती है। बहू गुड़िया के लिए काॅफी बना दो, तभी देवरजी बोलते है, भाभी मैं तो ग्रीन टी लूंगा। सबकी अलग फर्माइष है, सबको अपनी पसंद का खाना खाना है। मगर बनाने वाला सिर्फ एक। अगर गलती से बहू कुछ देर के लिए महमानों के साथ बैठकर बातचीत करने लगे, तो ये खासकर सास को गवारा नहीं है। बहू के बैठते ही सासू मां प्यार से बोलती हैं, बहू ज़रा देखना दाल अभी हुई यां नहीं। अगर हो गई, तो रात के खाने की तैयार कर लो। किचन में घंटों बिताने वाली एकमात्र बहू ही होती है जो तारीफ की हकदार होती है, लेकिन अगर कोई गलती से खाने की तारीफ कर दे, तो सासू मां छूटते ही कहती हैं, इतने सालों से बना रही है, क्या अब भी खाना बनाना नहीं आएगा। ऐसे में अगर कोई इतना कह दे कि बहू इस बार रिंकू का रिजल्ट बढ़िया नही रहा, तो इसके लिए उसी वक्त बहू दोषी ठकरा दी जाती है। हां ये ध्यान जो नहीं देती बच्चों की पढ़ाई पर। ये कहना तो आसान है, लेकिन आप बहू को कितना वक्त देते हैं कि वो अपने बच्चों पर ध्यान दे सके। बिल्कुल भी नहीं, मगर फिर भी हर जगह दोषी वही है। गलती सिर्फ इतनी है की, वो पराई है। जी हां बिल्कुल ऐसी ही सोच आज भी हम लोगों के ज़हन में बैठी हुई है। एक बार सोचकर देखिए, हम ऐसा क्यों करते हैं। इसलिए करते हैं कि हमारे साथ भी ऐसा हुआ था, तो हम अपनी बहू के साथ भी वैसा करेंगे। वजह जो भी हो मगर इसमें बहू दोषी क्यों। वो घर परिवार, बच्चे, पति और मेहमान हर तरह से वो पूरे परिवेष को पूरी शालीनता के साथ सहेज कर रखती है। लेकिन क्या कोई उसके जख्मों पर मरहम लगाता है, कोई उसे निवाला खिलाता है यां कोई उसकी पीठ को गर्व से थपथपाता है। ऐसे में लोगों की गिनती केवल मुट्ठी भर है, जो अपनी बहुओं को बेटी का दर्जा देने में सफल साबित हुए है। खैर, एक नज़र डालते हैं, रोजमर्रा की उन बातों पर, जिनमें जाने अनजाने में दोषी बहू ही होती है। 

 

पति टिफिन भूल गए

अगर किसी दिन पतिदेव अपना खाने का डिब्ब टेबल पर गलती से भूल जाएं, तो दिनभर बहू को न जाने कितनी बातें सुननी पड़ती है। आज राजेश न जाने लंच में क्या खाएगा। बहू फोन कर देना कि समय से खाना खा ले, अगर तुम एक बार खुद टिफिन उसके बैग में रख देती, तो कोई दिक्कत ही नहीं थी। कल से ध्यान रखना, नही ंतो बेचारा दिनभर भूखा रहेगा। यहां पर गलती अपने बेटे की है, मगर दोषी करार बहू को दे दिया गया।

 

अगर सासू मां की दवा खत्म हो गई

अब रात के खाने से पहले जो दवा लेनी थी, वो खत्म हो गई। हांलाकि बहू दो दिन पहले से बता रही है कि माजी दवा मंगवा लीजिए। पर अपनी गलती कौन मानता है। पूरा कसूर बहुओं का हो जाता है कि अगर तुम चाहती तो दिनभर में किसी से मंगवा सकती थी। अब देखना सुबह तक मेरी शुगर बढ़ जाएगी। हर परिस्थ्तिि में बहू को दोष देने से अच्छा है, उसे प्यार से बैठाकर ज़िम्मेदारियों का एहसास कराएं और काम को किसी एक पर थोपने की बजाय आधा आधा बांट लें।

 

अगर बहू बीमार पड़ गई

बीमारी कभी पूछकर यां बताकर नहीं आती है। वो किसी को भी अपनी चपेट में ले सकती है। अगर गलती से बहू बीमार हो जाए, तो सब लोग अपने अपने कामों के बारे में चिंतित होने लगते हैं। बहू का हाल जानने की बजाय, बार बार कहा जाता है, जल्दी से दवा लो और ठीक हो जाओ अन्यथा बच्चों का ख्याल कौन रखेगा, तुम तो खु बच्चों की तरह से बीमार पड़ गई हो और न जाने क्या क्या।

 

अगर कामवाली नहीं आई

गलती से किसी दिन कामवाली न आए, तो कह दिया जाता है कि तुम कल ज्यादा बात कर रही थी उससे, तभी वो आज नहीं आई। तुमने कहा होगा कि सारा काम मैं कर लेती हूं। तभी वो दो दिन की छुट्टी पर चली गई है। वगैरह, वगैरह। अगर बहू कोई गलती कर रही है, तो आप उसे उसी वक्त समझाकर उसकी गलती को ठीक कर सकते हैं। 

 

अगर बच्चे पढ़े तो

बच्चों की पढ़ाई हर काम से ज्यादा जरूरी होती है। लेकिन गृहणियां घर के कामों में कुछ इस कदर मसरूफ हो जाती हैं कि उन्हें अपनी सूधबुध नहीं रहती है। क्यों की हर काम के लिए उन्हें बार बार खोजा जाता है। ऐसे में वो बाकी कामों को प्रमुखता से करना नहीं भूलती हैं। दूसरी तरफ बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटककर खेलने कूदने यां टीवी के इर्द गिर्द भटकता रहता है। नतीजन अंक कम आना और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी बहू को दे दी जाती है। 

 

घर में बहू का रोल अहम है। मगर ज़रूरी नहीं कि बहू हर जगह सही हो। बड़े बुजुर्गों का फर्ज बनता है कि वो बहू को किसी भी मामले में दोषी ठहराने से पहले उसकी अच्छाईयों को परखें और अपने घर की बहुओं का सही मार्गदर्शन 

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