कृष्ण की मैया यशोदा को श्री हरि ने दिया था ये आशीर्वाद, जानें कथा

Jyoti Sohi

6th April 2021

एक पौराणिक कथा के अनुसार, यशोदा ने श्रीहरि की घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से विष्णु जी खूब प्रसन्न हो उठे और उसी प्रसन्नता मे विष्णु जी ने उन्हें वर मांगने के लिए कहा, अब यशोदा बेहद खुश हो गईं और उन्होंने कहा हे ईश्वर! मेरी तपस्या तभी पूर्ण होगी जब आप मुझे मेरे पुत्र रूप में प्राप्त होंगे।

कृष्ण की मैया यशोदा को श्री हरि ने दिया था ये आशीर्वाद, जानें कथा

भारत के प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में बालक कृष्ण की लीलाओं के अनेक वर्णन मिलते हैं। जिनमें यशोदा को ब्रह्मांड के दर्शन, माखनचोरी और उसके आरोप में ओखल से बाँध देने की घटनाओं का सूरदास ने सजीव वर्णन किया है। यशोदा ने बलराम के पालन पोषण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जो रोहिणी के पुत्र और सुभद्रा के भाई थे। उनकी एक पुत्री का भी वर्णन मिलता है जिसका नाम एकांगा था। 

 

एक पौराणिक कथा के अनुसार, यशोदा ने श्रीहरि की घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से विष्णु जी खूब प्रसन्न हो उठे और उसी प्रसन्नता मे विष्णु जी ने उन्हें वर मांगने के लिए कहा, अब यशोदा बेहद खुश हो गईं और उन्होंने कहा हे ईश्वर! मेरी तपस्या तभी पूर्ण होगी जब आप मुझे मेरे पुत्र रूप में प्राप्त होंगे। अब भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें कहा कि आने वाले काल में मैं वासुदेव एवं देवकी के घर मैं जन्म लूंगा लेकिन मुझे मातृत्व का सुख आपसे ही प्राप्त होगा।

 

यशोदानंदन श्रीकृष्ण जैसे जैसे बढ़ने लगे। मैया का आनन्द भी उसी क्रम में बढ़ रहा था। जननी का प्यार पाकर श्रीकृष्ण 81 दिनों के हो गये। मैया एक दिन अपने सलोने श्रीकृष्ण को नीचे पालने में सुला आयी थीं तभी कंस के द्वारा भेजा गया उत्कच नामक दैत्य आया और शकट में प्रविष्ट हो गया। वह शकट को गिराकर श्रीकृष्ण को पीस डालना चाहता था। इसके पूर्व ही श्रीकृष्ण ने शकट को उलट दिया और शकटासुर का अंत हो गया।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने माखन लीला, उखल बंधन, कालिय उद्धार, गोचारण, धेनुक वध, दावाग्नि पान, गोवर्धन धारण, रासलीला आदि अनेक लीलाओं से यशोदा मैया को अपार सुख प्रदान किया। इस प्रकार ग्यारह वर्ष छह महीने तक माता यशोदा का महल श्रीकृष्ण की किलकारियों से गूंजता रहा। आखिर श्रीकृष्ण को मथुरापुरी ले जाने के लिए अक्रूर आ ही गये। अक्रूर ने आकर यशोदाजी के हृदय पर मानो अत्यंत क्रूर वज्र का प्रहार किया। पूरी रात नन्दजी श्रीयशोदा को समझाते रहे पर किसी भी कीमत पर वे अपने प्राणप्रिय पुत्र को कंस की रंगशाला में भेजने के लिए तैयार नहीं हो रही थीं। आखिर योगमाया ने अपनी माया का प्रभाव फैलाया। श्रीकृष्ण चले गये तो यशोदा विक्षिप्त−सी हो गयीं। उनका हृदय तब शीतल हुआए जब वे कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण से मिलीं।

 

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, वसुश्रेष्ठ द्रोण और उनकी पत्नी धरा ने ब्रह्माजी से यह प्रार्थना की,  जब हम पृथ्वी पर जन्म लें तो भगवान श्री कृष्ण में हमारी अविचल भक्ति हो ब्रह्माजी ने तथास्तु कहकर उन्हें वर दिया, इसी वर के प्रभाव से ब्रजमंडल में सुमुख नामक गोप की पत्नी पाटला के गर्भ से धरा का जन्म यशोदा के रूप में हुआ और उनका विवाह नंद से हुआ। नंद पूर्व जन्म के द्रोण नामक वसु थे, भगवान श्री कृष्ण इन्हीं नंद.यशोदा के पुत्र बने।

 

 

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