नारदजी के किस श्राप के कारण अलग हो गए थे भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी

Jyoti Sohi

21st April 2021

कहते हैं कि मां लक्ष्मी की पूजा करने से पैसों की कमी कभी नहीं खलती है। धर्मग्रंथों और वेदो पुराणों में देवी लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी बताया गया मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए लोग कई तरह के उपाय करते हैं। उनके विवाह को लेकर एक पौराणिक कथा बेहद प्रसिद्ध है।

नारदजी के किस श्राप के कारण अलग हो गए थे भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी

कहते हैं, कि मां लक्ष्मी की पूजा करने से पैसों की कमी कभी नहीं खलती है। धर्मग्रंथों और वेदो पुराणों में देवी लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी बताया गया मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए लोग कई तरह के उपाय करते हैं। उनके विवाह को लेकर एक पौराणिक कथा बेहद प्रसिद्ध है। आइए जानते हैं, मां लक्ष्मी के विवाह की ये अद्भुत कथा।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार जब नारद जी बैकुंठ से लौट रहे थे तो रास्ते में उन्हें एक बहुत सुंदर और समृद्ध नगर नज़र आया, जिसमें बहुत बड़ा राजमहल था। यह नगर श्रीहरि ने अपनी योगमाया से निर्मित किया था। नारद मुनि अपनी धुन में होने के कारण कुछ समझ नहीं पाए और इस नगर के राजमहल में जा पहुचें। राजा ने उनका भव्य स्वागत किया और अपनी पुत्री को बुलाकर नारद मुनि से कहा कि मुझे अपनी राजकुमारी का स्वयंवर करना है। आप इसका हाथ देखकर इसके भविष्य के बारे में कुछ बताएं। अब राजकुमारी बेहद सुंदर थी और उसके रूप को देखकर नारद जी मोहित हो गए। जब नारद जी ने उसका हाथ देखा तो हथेली की रेखाएं देखते ही रह गए। उसकी रेखाओं के अनुसार, उसका पति विश्व विजेता रहेगा और समस्त संसार उसके चरणों में नतमस्तक होगा। नारद जी ने यह बात राजा को ना बताकर दूसरी अच्छी बातें कहीं और वहां से चले गए। राजकुमारी का रूप और उसके हाथ की रेखाएं देखकर नारद जी वैराग्य को भूल चुके थे। अब लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। हांलाकि माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णुजी को पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे। नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गए। दरअसल, जब उन्होंने देखा तो उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था। हरि का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद जी को भगवान पर बड़ा क्रोध आया। अब नारद गुस्से में सीधा बैकुंठ जा पहुंचे जहां श्रीहरि विष्णु के साथ उन्होंने राजकुमारी को भी देखा। इस पर उन्होंने श्रीहरि को बहुत भला.बुरा कहा और शाप दिया कि आपने बंदर का मुख देकर मेरा उपहास कराया है। मैं आपको शाप देता हूं कि आप पृथ्वी पर जन्म लेंगे और इन्हीं बंदरों की सहायता आपको लेनी होगी। आपने मुझे स्त्री वियोग दिया है, आपको भी स्त्री वियोग सहना होगा। श्रीहरि विष्णु भगवान, नारद जी की बात सुनकर मुस्कुराते रहे। तभी राजकुमारी लक्ष्मी माता के रूप में समा गई। यह दृश्य देख नारद जी को समझ आया कि वह राजकुमारी कोई और नहीं स्वयं माता लक्ष्मी थीं, ज्ञान होने पर नारद मुनि भगवान से क्षमा मांगने लगे। लेकिन शाप को वापस नहीं ले सकते थे। श्रीहरि ने भी उनकी वाणी का मान रखा और श्रीराम के रूप में अवतार लिया। इसमें उन्हें माता सीता से वियोग भी सहना पड़ा और वानर रूपी रुद्रावतार हनुमानजी ने संकट के समय उनका साथ भी दिया।

 

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