शनि की यह दशा कहलाती है साढ़े साती, करें ये उपाय

Jyoti Sohi

29th April 2021

शनि की साढ़े साती वास्तव में शनि का गोचर ही है। जिस प्रकार अन्य ग्रह अपना गोचर करते हैं उसी प्रकार शनि ग्रह भी गोचर करता है। सबसे मंद गति से चलने के कारण शनि को शनैश्चर भी कहा जाता है। शनि ग्रह का गोचर एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहता है।

शनि की यह दशा कहलाती है साढ़े साती, करें ये उपाय

शनिदेव को सूर्य पुत्र एवं कर्मफल दाता माना जाता है, साथ ही पितृ शत्रु भी कहे जाते हैं। हमें सबसे पहले ये समझना होगा कि  शनि उतना अशुभ और मारक नहीं जितना उसे माना जाता है। शनि शत्रु नहीं बल्कि मित्र है। शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है और हर प्राणी के साथ उचित न्याय करता है। अनुराधा नक्षत्र के स्वामी शनि हैं।

ज्योतिष के अनुसार सभी ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण करते रहते हैं। ऐसे में शनि ग्रह जब लग्न से बारहवीं राशि में प्रवेश करता है तो उस विशेष राशि से अगली दो राशि में गुजरते हुए अपना समय चक्र पूरा करता है। शनि की मंथर गति से चलने के कारण यह एक राशि में लगभग ढाई वर्ष यात्रा करता है। इस प्रकार एक वर्तमान के पहले, एक पिछले तथा एक अगले ग्रह पर प्रभाव डालते हुए शनि तीन गुणा अर्थात साढ़े सात वर्ष की अवधि का काल होता है। शनि की यही दशा साढ़े साती कहलाती है। शनि अमावस्या को शनि से संबंधित उपाय करने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है।

 

शनि की साढ़े साती क्या है

शनि की साढ़े साती वास्तव में शनि का गोचर ही है। जिस प्रकार अन्य ग्रह अपना गोचर करते हैं उसी प्रकार शनि ग्रह भी गोचर करता है। सबसे मंद गति से चलने के कारण शनि को शनैश्चर भी कहा जाता है। शनि ग्रह का गोचर एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहता है। गोचर के दौरान जब शनि ग्रह जन्म कालीन चन्द्र से बारहवें भाव में प्रवेश करते हैं तो साढ़ेसाती का आरंभ माना जाता है। इसके बाद जब शनि का गोचर जन्म कालीन चंद्रमा पर अर्थात चंद्र राशि जिसे हम पहला भाव भी कहते हैंए उस पर होता है तो साढ़ेसाती मध्य में होती है और यह साढ़ेसाती का दूसरा चरण कहलाता है और अंत में जब शनि जन्म कालीन चंद्रमा से दूसरे भाव मे गोचर करता है तो यह अवधि साढ़ेसाती का अंतिम अर्थात तीसरा चरण कहलाती है। इस प्रकार चंद्रमा द्वारा अधिष्ठित राशि से बारहवें भाव से प्रारंभ होकर चंद्र राशि से गुजरते हुए चंद्रमा से द्वितीय भाव में रहने तक की अवधि कुल मिलाकर तीन भावों में ढाई.ढाई वर्ष जोड़ने के बाद साढ़े सात वर्ष की होती है। इसी के आधार पर इसे साढ़ेसाती कहा जाता है।

चंद्रमा मन का कारक है और शनि उस मन को नियंत्रित करने वाला अर्थात व्यक्ति को सीख देने वाले होते हैं। ऐसे में साढ़ेसाती की अवस्था में चंद्रमा पर शनि का विशेष प्रभाव होने के कारण आमतौर पर साढ़ेसाती मानसिक तनाव देने वाली होती है और ऐसे में व्यक्ति को अधिक मेहनत भी करनी पड़ती है। 

 

शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव

लोगों का मानना है कि यह हमेशा बुरा फल देती है, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है। सबसे पहले देखना होगा कि आपकी व्यक्तिगत दशा क्या हैण्।इसके बाद कुंडली में शनि की स्थिति देखनी होगी, तब जाकर यह समझा जा सकता है कि साढ़ेसाती या ढैया का फल बुरा होगा या अच्छा। आम तौर पर अगर शनि अच्छा है तो साढ़ेसाती अच्छे परिणाम देती है। अगर शनि प्रतिकूल है तो साढ़ेसाती या ढैया में समस्या होती है। वैसे साढ़ेसाती या ढैया शुरू हो तो लाभकारी होती है और खत्म हो तो समस्या होती है।

शनि की साढ़ेसाती और ढैया चलने के दौरान अलग फल देती है और उतरने के दौरान अलग इस समय धनुए मकर और कुम्भ राशि पर साढ़ेसाती चल रही है, इसमें भी धनु राशि पर से साढ़ेसाती उतर रही है। इस समय मिथुन और तुला राशि पर ढैया है।साढ़ेसाती और के दौरान रिश्तों की समस्या जरूर होती है। उसमें भी वैवाहिक जीवन में सबसे ज्यादा समस्या होती है। खास तौर से साढ़ेसाती के उतरने के  समय में माता या पिता के निधन के योग भी होते है। 

 

लक्षण

शनि की साढ़े साती के समय आमतौर पर इस प्रकार की घटनाएं होती है जैसे घर का कोई भाग अचानक गिर जाता है। घर के अधिकांश सदस्य बीमार रहते हैं। घर में अचानक आग लग जाती है। आपको बार.बार अपमानित होना पड़ता है। घर की महिलाएं अक्सर बीमार रहती हैं। एक परेशानी से आप जैसे ही निकलते हैं दूसरी परेशानी आ जाती है। व्यापार एवं व्यवसाय में असफलता और नुकसान होता है। घर में मांसाहार एवं मादक पदार्थों के प्रति लोगों की रूचि बढ़ जाती है। घर में हमेशा कलह होते है, अकारण ही आपके ऊपर कलंक या इल्ज़ाम लगता है। आंख व कान में तकलीफ महसूस होती है एवं आपके घर से चप्पल.जूते गायब होने लगते हैं।

 

शनि की साढ़े साती के उपाय

शनिदेव भगवान शंकर के भक्त हैं, भगवान शंकर की जिनके ऊपर कृपा होती है उन्हें शनि हानि नहीं पहुंचाते, नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा व आराधना करनी चाहिए

पीपल में सभी देवताओं का निवास कहा गया है इस लिए पीपल को अर्घ्य देने अर्थात जल देने से शनि देव प्रसन्न होते हैं

अनुराधा नक्षत्र में जिस दिन अमावस्या हो और शनिवार का दिन हो उस दिन आप तेलए तिल सहित विधि पूर्वक पीपल वृक्ष की पूजा करें तो शनि के कोप से आपको मुक्ति मिलती हैण् शनिदेव की प्रसन्नता हेतु शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए

साढ़ेसाती के दौरान आप शनिवार के उपाय अथवा शनि चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं जिनके द्वारा शनिदेव की कृपा सहज ही प्राप्त हो सकती है।

शनिदेव की कृपा पाने के लिए आप शनिवार के दिन धतूरे की जड़ धारण कर सकते हैं अथवा उत्तम गुणवत्ता का नीलम रत्न भी पहन सकते हैं।

इसके अतिरिक्त सात मुखी रुद्राक्ष पहनना या फिर शनि यंत्र की स्थापना कर उसकी नियमित रूप से पूजा करना भी शनिदेव की कृपा प्राप्ति का सहज उपाय है।

 

 

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