ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

Jyoti Sohi

4th May 2021

श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच मन्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है। यहां ओंकारेश्वर.ज्योतिर्लिंग दो स्वरूप में मौजूद है। एक को ममलेश्वर के नाम से और दूसरे को ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। ममलेश्वर नर्मदा के दक्षिण तट पर ओंकारेश्वर से थोड़ी दूर स्थित है। अलग होते हुए भी इनकी गणना एक ही तरह से की जाती है। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे भी एक पौराणिक कथा विशेष तौर पर प्रचलित हैं।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच मन्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है। यहां ओंकारेश्वर.ज्योतिर्लिंग दो स्वरूप में मौजूद है। एक को ममलेश्वर के नाम से और दूसरे को ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। ममलेश्वर नर्मदा के दक्षिण तट पर ओंकारेश्वर से थोड़ी दूर स्थित है। अलग होते हुए भी इनकी गणना एक ही तरह से की जाती है। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे भी एक पौराणिक कथा विशेष तौर पर प्रचलित हैं। 

 

प्रचलित पौराणिक कथा 

एक बार नारायण भक्त ऋषि नारद मुनि गिरिराज विंध्य पर्वत पर घूमते घूमते पहुंच गए। वहां उनका स्वागत बड़े ही आदर सम्मान के साथ किया गया। विन्ध्याचल ने कहा कि वो सर्वगुण सम्पन्न हैं और उनके साम्राज्य में दूर दूर तक किसी भी चीज की कमी नहीं है। उनके पास हर प्रकार की सम्पदा है। उनकी वाणी में अंहकार भाव साफतौर पर झलक रहा था। इसी भाव में विन्ध्याचल नारद जी के समक्ष खड़े हो गए। श्री नारद जी को अहंकारनाशक भी कहा जाता है। ऐसे में उन्होंने मन ही मन विन्ध्याचल के अहंकार का नाश करने की बात सोची। 

 

नारद जी ने विन्ध्याचल से कहा कि उसके पास सब कुछ है। लेकिन मेरू पर्वत के बारे में तुम्हें पता है जो तुमसे बहुत ऊंचा है। उस पर्वत के शिखर इतने ऊंचे हो गए हैं कि वो देवताओं के लोकों तक अब पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि तुम्हारे शिखर वहां तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे। ये वचन कहकर नारद जी वहां से चले गए। अब नारद जी की कही बात को सोचकर विन्ध्याचल को बहुत दुख हुआ।

 

इस पछतावे में विध्यांचल ने फैसला किया कि वो शिव जी की आराधना करेगा। उसने मिट्टी के शिवलिंग बनाए और वो भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगा। उसने कई महीनों तक शिव की आराधना की। शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे दर्शन भी दिए। साथ ही आशीर्वाद भी दिया। शिव जी ने विध्यांचल को वरदान मांगने को कहा। उसने भगवान शिव से कहा कि अगर आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे कार्य की सिद्धि करने वाली अभीष्ट बुद्धि प्रदान करें। शिव ने विन्ध्यपर्वत के मांगे गए वरदान को पूरा किया। उसी समय देवतागण तथा कुछ ऋषिगण भी वहां पहुंच गए। इन सभी ने अनुरोध किया कि वहां स्थित ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो जाए। इनके अनुरोध पर ही ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभक्त हुआ जिसमें से एक प्रणव लिंग ओंकारेश्वर और दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।  ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश में स्थित है, जहां पर बाबा ओंकारेश्वर स्थित है उसके समीप नर्मदा नदी बहती है। पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ओम का आकार बनता है। कहा जाता है कि ओम शब्द की उत्पति ब्रह्मा जी के मुख से हुई है। विशेष बात ये है कि यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ओम का आकार लिए हुए है। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को ओंकारेश्वर कहा जाता है।

 

राजा मान्धाता ने की तपस्या

एक कथा के अनुसार सूर्य वंशी राजा मान्धाता ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। राजा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वरदान मांगने के लिए कहा। इस पर राजा ने कहा कि प्रभु जनकल्याण के लिए इस स्थान को अपना लें, अर्थात वे इस स्थान को अपना निवास स्थान बना लें। भगवान शिव ने राजा की इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और यहां पर भोलेनाथ शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए। राजा के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत पड़ाण् यह पर्वत सदैव जलमग्न रहता है। कहा जाता है कि माता नर्मदा नर्मदा ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर का जलाभिषेक करती हैं, सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस ज्योतिर्लिंग का निर्माण किसी मनुष्य ने नहीं किया है बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है।

 

गुप्त आरती 

ऐसी मान्यता है कि रोज रात में भगवान शिव और पार्वती इस मंदिर में आते है और यहां चौसर पांसे खेलते हैं। यही कारण है कि रात में मंदिर के गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग के सामने रोज चौसर पांसे की बिसात सजाई जाती है। ये परंपरा मंदिर की स्थापना के समय से ही चली आ रही है। कई बार ऐसा हुआ है कि चौसर और पांसे रात में रखे स्थान से हटकर सुबह दूसरी जगह मिले। ओंकारेश्वर शिव भगवान का अकेला ऐसा मंदिर है जहां रोज गुप्त आरती होती है। इस दौरान पुजारियों के अलावा कोई भी गर्भगृह में नहीं जा सकता। इसकी शुरुआत रात 8:30 बजे रुद्राभिषेक से होती है। अभिषेक के बाद पुजारी पट बंद कर शयन आरती करते हैं। आरती के बाद पट खोले जाते हैं और चौसर.पांसे सजाकर फिर से पट बंद कर देते हैं। साल में एक बार शिवरात्री के दिन चौसर पांसे की पूरी बिसात बदल दी जाती हैं। इस दिन भगवान के लिए नए चौसर.पांसे लाए जाते हैं।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का परिसर एक पांच मंजिला भवन के रूप में है जिसकी पहली मंजिल पर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है भवन की तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव स्थापित है। चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव और पांचवी मंजिल पर राजेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है।

 

ओमकारेश्वर मंदिर में 15 फीट ऊँचे 60 बड़े बड़े स्तम्भ हैं। मंदिर के में भक्तों के लिए भोजनालय भी चलाया जाता हैए जहाँ पर नाममात्र के शुल्क पर भोजन प्रसाद मिलता है। ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ट्रस्ट का कार्यालय परिसर में ही स्थित हैद्य दर्शन करने के लिए लाइन में लगना होता है। फूल, बेलपत्र, दूध इत्यादि चढाने के लिए दर्शन पास लेना होता है। जो लोग शारीरिक रूप से अक्षम या अति वृद्ध है। उन्हें पंक्ति में लगने की आवश्यकता नहीं है, उनके लिए भी विशेष दर्शन की सुविधा उपलब्ध कराइ जाती है। इसके लिए मंदिर के स्टाफ के अधिकारियों से संपर्क कर सकतें है।

 

ओंकारेश्वर में श्रद्धालु कामनापूर्ति के लिए नर्मदा जल लेकर भगवान ओंकारेश्वर एवं मान्धाता पर्वत की परिक्रमा करते हैं। यह करीब ७ किलोमीटर की परिक्राम है। परिक्रमा पथ में कई मंदिर एवं पुरातत्व महत्व के स्मारक आते हैं जहाँ दर्शन करने का नियम है।

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