नाबालिग अपराधी - गृहलक्ष्मी कहानियां

सूक्ष्मलता महाजन

4th April 2017

मनोज अमीर माँ बाप का इकलोता बेटा था। घर में किसी चीज़ की कमी न थी उसकी हर जिद्द पूरी की जाती थी। उसके पिताजी की कई फैक्टरियां थी। उनकी इच्छा थी कि मनोज बडा होकर उनका कारोबार सम्भाले, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। बचपन से ही मनोज का मन पढाई में नहीं लगता था । सारा दिन पार्क में खेलना,मौज मस्ती करना ही उसे अच्छा लगता था ।

नाबालिग अपराधी - गृहलक्ष्मी कहानियां

मनोज के पिता अनुजजी बंगाली थे और उसकी माता शीलाजी पंजाबी सिख महिला थी। दोनों में बहुत प्रेम था और परिवार के विरूद्ध जाकर दोनों ने शादी की थी। शादी के बहुत साल बीत जाने के बाद भी उन्हें  संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ था। अपना महल जैसा घर उन्हें काट खाने को आता था। परिवारों से तो वे पहले ही अन्तर्जातीय विवाह के कारण कट चुके थे। अचानक दोनों बहुत एकाकी हो गए थे ।

एक दिन उनके घर उनके एक बचपन के दोस्त दिनेश शर्माजी आये। शर्मा जी पहले उनके मोहल्ले में ही रहते थे पर डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे बंगलौर में ही बस गए थे। उनका अपना अस्पताल था, अच्छी खासी प्रैक्टिस थी । उनके दो बेटे थे जो इस समय एक अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे। जब उन्होंने अनुज जी से संतान न होने की बात सुनी तो वे बोले आज के युग में कुछ भी असंभव नहीं है । तकनीक की सहायता से आज बेसंतान दम्पतियों को भी संतान की प्राप्ति हो सकती है बस खर्च थोडा ज्यादा आता है।

अनुज जी तो यह सुन कर जी उठे बोले, बस आप हमें बता दें कि क्या करना होगा? यह तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है । भगवान की दया से हमारे पास किसी चीज़ की कमी नहीं है। फिर क्या था इलाज़ शुरू हुआ और कुछ समय पश्चात जब उन्हें संतान प्राप्ति की सम्भावना नज़र आई तो वे मानो फिर से जी उठे। कुछ ही समय में उनके घर मनोज का आगमन हुआ। उसकी किलकारियों से घर में नयी उर्जा का प्रसार हुआ। दिन बीतते गए और मनोज भी बड़ा होने लगा ।

बचपन से ही मनोज उग्र स्वभाव का था. वह प्राय: रोता रहता था। दिन बीतते  गए और मनोज भी बड़ा होता गया।  एक दिन अनुज जब शाम को दफ्तर से घर आये तो उनके सर में बहुत दर्द था। शीला जी के कहने पर कि चलिए डाक्टर साहब को दिखा आते है , अनुज जी ने कहा अरे नहीं बस सो जाऊँगा तो ठीक हो जायेगा तुम फिकर मत करो और वे सोने के लिए चले गए । शीलाजी का भी खाना खाने को दिल नहीं किया और वे भी मनोज को दूध पिला कर घर का काम निपटने लगी। रात के करीब ग्यारह बज रहे थे , उन्होंने देखा की अनुज आराम से सो रहे हैं तो वे भी सोने के लिए चली गयी ।

सुबह काम वाली ने जब घंटी बजाई तो वह हडबडा कर उठी। सूरज सर पर चढ़ आया था। उसने पलंग के दूसरी तरफ देखा तो अनुज अभी भी सो रहे थे। बड़ी हैरानी हुई उसे कि आज इतनी देर तक वे कैसे सो रहे हैं। उसने आवाज लगा कर उन्हें पुकारा पर कोई उत्तर  न मिला। उसने उन्हें हिलाया तो भी कुछ जवाब न मिला। उसने जल्दी से दरवाजा खोला और काम वाली से पडोसन दीपाजी को बुलाकर लाने के लिए कहा। दीपा जी भी अनुज जी को देख घबरा गयी और डाक्टर को फोन कर दिया।

डाक्टर साहब ने आते ही अनुज जी की जाँच करने के लिए हाथ पकड़ा तो उनका शारीर ठंडा पड़ चुका था। अनुज जी जा चुके थे। अब तो शीलाजी पर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा । उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था. आसपास के लोग भी इकठ्ठा हो गए थे। शीला जी  मनोज को गोद में लेकर असहाय  सी रोने लगी ।

दिन बीतते गए और मनोज बड़ा होने लगा। वह पहले से ज्यादा उद्दंड हो गया था। आसपास के बच्चों को मारना पीटना भी शुरू कर दिया था, बुरी  संगत के प्रभाव में उसे सिगरेट आदि  का भी शौक  हो गया था। स्कूल जाना भी बंद सा ही था । अनुज जी की मृत्यु के बाद  कामकाज भी ढीला हो गया था। शीला जी ने फैक्ट्री जाना शुरू कर दिया था। घर पर अनुज अकेला ही रहता था।

एक दिन वह घर में अपने दोस्तों के साथ मौज मस्ती कर रहा था कि पड़ोस  की गीता ने उनके घर की घंटी बजायी। उसके घर पर ताला था और उसने सोचा कि उसकी माताजी शायद शीला आंटी के घर पर होंगी। दरवाजे पर मनोज को देख वह जैसे ही वापस जाने को मुड़ी मनोज और उसके दोस्तों ने उसे घर के अन्दर जबरदस्ती खींच लिया। उसने अपने को बहुत छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन अपने को बचा न पायी और उनकी हवस  का शिकार हो गयी। उसके कपडे फटे हुए थे और मुंह से खून भी निकल रहा था। यह देख कर मनोज बहुत डर  गया और अपने दोस्तों के साथ भाग खड़ा हुआ।

कुछ समय बाद जब गीता की माताजी घर आयीं तो सामने का दरवाजा खुला देख कर शीलाजी को पुकारती  हुई घर के अन्दर पहुंची। बाहर  कमरे में कोई नहीं था। अचानक  सिसकी की आवाज़ सुन कर उनके कदम ठिठके और वे गीताजी को आवाज़ देते हुए बेडरूम की तरफ बढ गयी। बेडरूम में जब उन्होंने झाँका तो उनके पैरों तले से ज़मीन  निकल गयी। उनकी अपनी बेटी बदहाल वहां बेहोश सी पड़ी थी। उन्होंने उसे अपने शाल से ढक दिया और फिर अपने पति तथा शीलाजी को फोन कर तुरंत आने को कहा। उन्होंने हॉस्पिटल से एम्बुलेंस भी मंगवायी और बेटी को अस्पताल ले गयी। अब तक पास पड़ोस के लोग भी इकट्ठे हो गये थे और पुलिस भी आ गयी थी। करीब आठ बजे मनोज टहलता हुआ आया और हैरान होकर मां से पूछने लगा , यह पुलिस क्यूं आई है हमारे घर, अब तक गीता को भी होश आ चूका था और उसने सारी  घटना के बारे में विस्तार से पुलिस को बता दिया। मनोज और उसके दोस्तों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया पर चूंकि वे सिर्फ पंद्रह साल के थे उन्हें रिमांड होम भेज दिया गया।

दो साल बाद जब मनोज रिहा हुआ तो वह पहले से भी आक्रामक हो चुका था। गीता का परिवार आशंका के कारण पहले से ही वहां से कहीं और जा चुका था. अब वह अपनी मां को भी कुछ नहीं समझता था। शीलाजी बस अन्दर ही अन्दर घुट्ती रहती थी। कई जगह उसे ट्रेनिंग करवाने की कोशिश की पर हमेशा वह वहां से भाग लेता ।

मनोज घर आते ही गीता का नया पता ढूढने में जुट गया और जल्द ही उस का पता ढूढ लिया। अब वह आये दिन गीता का पीछा करता और उसे तंग करता। पहले तो गीता चुप रही परन्तु किसी अनहोनी की आशंका से डर कर उसने मां को एक दिन सब कुछ बता दिया। पहले तो मां घबरा गयी पर फिर उसने एक एन. जी. ओ. से  बात की और समस्या का स्थाई हल खोजने में लग गयीं। अब वे  प्रतिदिन गीता को छोड़ने भी जातीं और शाम को पिताजी स्कूल से उसे घर ले कर आतीं। इस बीच मनोज लगातार कुछ बड़ी योजना बनाने में लगा था और किसी अवसर की तलाश में था ।

एक दिन बहुत बारिश हो रही थी, सडक पर काफी पानी भी भर गया था । स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी परन्तु पिताजी का कहीं पता न था। गीता घबराई सी गेट पर  इंतज़ार कर रही थी। तभी एक गाड़ी उसके पास  आ कर रुकी और दो लड़के गाड़ी से उतर कर जबदस्ती उसे गाड़ी में बिठाने लगे ।

गीता ने इस बीच आत्मरक्षण का प्रशिक्षण ले लिया था, वह फुर्ती से घूमी और उन लड़कों को चित कर दिया और शोर मचाना शुरू कर दिया। गेट पर गार्ड ने देखा तो  वह भी भाग कर सामने आ गया । लड़कों ने भागने की कोशिश की पर वहां जमा लोगों ने उन्हें पकड़ लिया। गाड़ी में बैठा युवक गाड़ी लेकर भाग निकला ।

अब तक पुलिस की वैन भी वहां आ चुकी थी और गीता जी के पिताजी भी वहां आ गए थे । पुलिस उन दोनों लड़कों को अपने साथ ले गयी और गीता को भी पुलिस स्टेशन आने के लिए कहा, पकडे हुए लड़कों ने बताया की उन्हें मनोज ने ही गीता को अगवा करने के लिए पैसे दिए थे। पुलिस ने उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया और इस बार चूंकि वह अठारह वर्ष का हो चूका था उसे गीता का अपहरण करने व तंग करने की कोशिश के जुर्म में पुलिस ने  जेल भेज दिया ।

यह भी पढ़ें -प्रिया का आत्मसम्मान - गृहलक्ष्मी कहानियां

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मनोज अमीर माँ बाप का इकलोता बेटा  था। घर में किसी चीज़ की कमी  न थी उसकी हर जिद्द पूरी की जाती थी। उसके पिताजी की कई फैक्टरियां थी। उनकी इच्छा थी  कि मनोज बडा  होकर उनका कारोबार सम्भाले, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। बचपन से ही मनोज का मन पढाई में नहीं लगता था । सारा दिन पार्क में खेलना,मौज मस्ती करना ही उसे अच्छा लगता था ।

मनोज के पिता अनुजजी बंगाली थे और उसकी माता शीलाजी पंजाबी सिख महिला थी। दोनों में बहुत प्रेम था और परिवार के विरूद्ध जाकर दोनों ने शादी की थी। शादी के बहुत साल बीत जाने के बाद भी उन्हें  संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ था। अपना महल जैसा घर उन्हें काट खाने को आता था। परिवारों से तो वे पहले ही अन्तर्जातीय विवाह के कारण कट चुके थे। अचानक दोनों बहुत एकाकी हो गए थे ।

एक दिन उनके घर उनके एक बचपन के दोस्त दिनेश शर्माजी आये। शर्मा जी पहले उनके मोहल्ले में ही रहते थे पर डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे बंगलौर में ही बस गए थे। उनका अपना अस्पताल था, अच्छी खासी प्रैक्टिस थी । उनके दो बेटे थे जो इस समय एक अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे। जब उन्होंने अनुज जी से संतान न होने की बात सुनी तो वे बोले आज के युग में कुछ भी असंभव नहीं है । तकनीक की सहायता से आज बेसंतान दम्पतियों को भी संतान की प्राप्ति हो सकती है बस खर्च थोडा ज्यादा आता है।

अनुज जी तो यह सुन कर जी उठे बोले, बस आप हमें बता दें कि क्या करना होगा? यह तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है । भगवान की दया से हमारे पास किसी चीज़ की कमी नहीं है। फिर क्या था इलाज़ शुरू हुआ और कुछ समय पश्चात जब उन्हें संतान प्राप्ति की सम्भावना नज़र आई तो वे मानो फिर से जी उठे। कुछ ही समय में उनके घर मनोज का आगमन हुआ। उसकी किलकारियों से घर में नयी उर्जा का प्रसार हुआ। दिन बीतते गए और मनोज भी बड़ा होने लगा ।

बचपन से ही मनोज उग्र स्वभाव का था. वह प्राय: रोता रहता था। दिन बीतते  गए और मनोज भी बड़ा होता गया।  एक दिन अनुज जब शाम को दफ्तर से घर आये तो उनके सर में बहुत दर्द था। शीला जी के कहने पर कि चलिए डाक्टर साहब को दिखा आते है , अनुज जी ने कहा अरे नहीं बस सो जाऊँगा तो ठीक हो जायेगा तुम फिकर मत करो और वे सोने के लिए चले गए । शीलाजी का भी खाना खाने को दिल नहीं किया और वे भी मनोज को दूध पिला कर घर का काम निपटने लगी। रात के करीब ग्यारह बज रहे थे , उन्होंने देखा की अनुज आराम से सो रहे हैं तो वे भी सोने के लिए चली गयी ।

सुबह काम वाली ने जब घंटी बजाई तो वह हडबडा कर उठी। सूरज सर पर चढ़ आया था। उसने पलंग के दूसरी तरफ देखा तो अनुज अभी भी सो रहे थे। बड़ी हैरानी हुई उसे कि आज इतनी देर तक वे कैसे सो रहे हैं। उसने आवाज लगा कर उन्हें पुकारा पर कोई उत्तर  न मिला। उसने उन्हें हिलाया तो भी कुछ जवाब न मिला। उसने जल्दी से दरवाजा खोला और काम वाली से पडोसन दीपाजी को बुलाकर लाने के लिए कहा। दीपा जी भी अनुज जी को देख घबरा गयी और डाक्टर को फोन कर दिया।

डाक्टर साहब ने आते ही अनुज जी की जाँच करने के लिए हाथ पकड़ा तो उनका शारीर ठंडा पड़ चुका था। अनुज जी जा चुके थे। अब तो शीलाजी पर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा । उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था. आसपास के लोग भी इकठ्ठा हो गए थे। शीला जी  मनोज को गोद में लेकर असहाय  सी रोने लगी ।

दिन बीतते गए और मनोज बड़ा होने लगा। वह पहले से ज्यादा उद्दंड हो गया था। आसपास के बच्चों को मारना पीटना भी शुरू कर दिया था, बुरी  संगत के प्रभाव में उसे सिगरेट आदि  का भी शौक  हो गया था। स्कूल जाना भी बंद सा ही था । अनुज जी की मृत्यु के बाद  कामकाज भी ढीला हो गया था। शीला जी ने फैक्ट्री जाना शुरू कर दिया था। घर पर अनुज अकेला ही रहता था।

एक दिन वह घर में अपने दोस्तों के साथ मौज मस्ती कर रहा था कि पड़ोस  की गीता ने उनके घर की घंटी बजायी। उसके घर पर ताला था और उसने सोचा कि उसकी माताजी शायद शीला आंटी के घर पर होंगी। दरवाजे पर मनोज को देख वह जैसे ही वापस जाने को मुड़ी मनोज और उसके दोस्तों ने उसे घर के अन्दर जबरदस्ती खींच लिया। उसने अपने को बहुत छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन अपने को बचा न पायी और उनकी हवस  का शिकार हो गयी। उसके कपडे फटे हुए थे और मुंह से खून भी निकल रहा था। यह देख कर मनोज बहुत डर  गया और अपने दोस्तों के साथ भाग खड़ा हुआ।

कुछ समय बाद जब गीता की माताजी घर आयीं तो सामने का दरवाजा खुला देख कर शीलाजी को पुकारती  हुई घर के अन्दर पहुंची। बाहर  कमरे में कोई नहीं था। अचानक  सिसकी की आवाज़ सुन कर उनके कदम ठिठके और वे गीताजी को आवाज़ देते हुए बेडरूम की तरफ बढ गयी। बेडरूम में जब उन्होंने झाँका तो उनके पैरों तले से ज़मीन  निकल गयी। उनकी अपनी बेटी बदहाल वहां बेहोश सी पड़ी थी। उन्होंने उसे अपने शाल से ढक दिया और फिर अपने पति तथा शीलाजी को फोन कर तुरंत आने को कहा। उन्होंने हॉस्पिटल से एम्बुलेंस भी मंगवायी और बेटी को अस्पताल ले गयी। अब तक पास पड़ोस के लोग भी इकट्ठे हो गये थे और पुलिस भी आ गयी थी। करीब आठ बजे मनोज टहलता हुआ आया और हैरान होकर मां से पूछने लगा , यह पुलिस क्यूं आई है हमारे घर, अब तक गीता को भी होश आ चूका था और उसने सारी  घटना के बारे में विस्तार से पुलिस को बता दिया। मनोज और उसके दोस्तों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया पर चूंकि वे सिर्फ पंद्रह साल के थे उन्हें रिमांड होम भेज दिया गया।

दो साल बाद जब मनोज रिहा हुआ तो वह पहले से भी आक्रामक हो चुका था। गीता का परिवार आशंका के कारण पहले से ही वहां से कहीं और जा चुका था. अब वह अपनी मां को भी कुछ नहीं समझता था। शीलाजी बस अन्दर ही अन्दर घुट्ती रहती थी। कई जगह उसे ट्रेनिंग करवाने की कोशिश की पर हमेशा वह वहां से भाग लेता ।

मनोज घर आते ही गीता का नया पता ढूढने में जुट गया और जल्द ही उस का पता ढूढ लिया। अब वह आये दिन गीता का पीछा करता और उसे तंग करता। पहले तो गीता चुप रही परन्तु किसी अनहोनी की आशंका से डर कर उसने मां को एक दिन सब कुछ बता दिया। पहले तो मां घबरा गयी पर फिर उसने एक एन. जी. ओ. से  बात की और समस्या का स्थाई हल खोजने में लग गयीं। अब वे  प्रतिदिन गीता को छोड़ने भी जातीं और शाम को पिताजी स्कूल से उसे घर ले कर आतीं। इस बीच मनोज लगातार कुछ बड़ी योजना बनाने में लगा था और किसी अवसर की तलाश में था ।

एक दिन बहुत बारिश हो रही थी, सडक पर काफी पानी भी भर गया था । स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी परन्तु पिताजी का कहीं पता न था। गीता घबराई सी गेट पर  इंतज़ार कर रही थी। तभी एक गाड़ी उसके पास  आ कर रुकी और दो लड़के गाड़ी से उतर कर जबदस्ती उसे गाड़ी में बिठाने लगे ।

गीता ने इस बीच आत्मरक्षण का प्रशिक्षण ले लिया था, वह फुर्ती से घूमी और उन लड़कों को चित कर दिया और शोर मचाना शुरू कर दिया। गेट पर गार्ड ने देखा तो  वह भी भाग कर सामने आ गया । लड़कों ने भागने की कोशिश की पर वहां जमा लोगों ने उन्हें पकड़ लिया। गाड़ी में बैठा युवक गाड़ी लेकर भाग निकला ।

अब तक पुलिस की वैन भी वहां आ चुकी थी और गीता जी के पिताजी भी वहां आ गए थे । पुलिस उन दोनों लड़कों को अपने साथ ले गयी और गीता को भी पुलिस स्टेशन आने के लिए कहा, पकडे हुए लड़कों ने बताया की उन्हें मनोज ने ही गीता को अगवा करने के लिए पैसे दिए थे। पुलिस ने उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया और इस बार चूंकि वह अठारह वर्ष का हो चूका था उसे गीता का अपहरण करने व तंग करने की कोशिश के जुर्म में पुलिस ने  जेल भेज दिया ।

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