फैमिली ऑन ट्रैवल - गृहलक्ष्मी कहानियां

दीपाली शुक्ला

28th June 2017

जब चार महिलाएं निकली सुहाने सफर पर...

फैमिली ऑन ट्रैवल  - गृहलक्ष्मी कहानियां

मां, चलो ना कहीं घूमने चलते हैं, ट्रेवल मैगज़ीन के पन्ने पलटते हुए किरण ने मां से कहा। अपने पापा से कहो कि काम से छुट्टीलें और हम लोगों को घुमा लाएं, अंजलि ने जवाब दिया। पापा और छुट्टी, उनके लिए तो काम ही सब कुछ है। उनके भरोसे रहे तो कहीं नहीं जा पाएंगे, किरण ने मैगज़ीन रखते हुए कहा। तो विशाल से कह दो कि हम तीनों घूमने जाएंगे, अंजलि ने सुझाया।

भाई, वो तो पापा के नक्शे-कदम पर है, किरण कहते हुए उदास हो गई।

अंजलि जानती है कि पति पर काम का भूत सवार है और बेटे को भी नौकरी और दोस्तों से फुर्सत नहीं। हर साल स्कूल की छुट्टियों में किरण का घूमने का यक्ष प्रश्न सामने आ खड़ा होता। पिकनिक या नानी-दादी के घर तक जाना ही हो पाता। किरण बड़ी होती गई, साथ ही उसकी शिकायतें भी। अब कॉलेज में आ गई है किरण।

रात के खाने पर किरण ने कहा, पापा चलो इस बार कहीं घूम आएं। सुनकर सुहास ने कहा, सॉरी बेटा, अभी बहुत काम है। फ्रेंड्स के साथ ट्रिप पर चली जाओ। पापा, यदि हर काम फ्रेंड्स के साथ करना है तो फैमिली की जरूरत ही क्या है, कहते हुए किरण अपने कमरे में चली गई।

सुहास ने पत्नी की ओर देखा और कहा, देखा, किस तरह से बिहेव करती है। सब तुम्हारी शह का नतीजा है। अंजलि मौन रही। वह बेटी के कमरे की ओर बढ़ गई।

किरण गुमसुम सी बैठी थी। चल खाना खा ले, बेटी के सिर पर हाथ फेरकर अंजलि बोली। मम्मा, मेरे साथ ही ऐसा क्यों। भाई और पापा तो अपने टूर-ट्रेवल पर रहते हैं, हमें सजा। मेरी फ्रेंड्स के मम्मी-पापा हर साल कहीं ले जाते हैं। पापा तो कुछ ज्यादा ही... अंजलि ने बेटी को गले से लगा लिया।

जिस दंश ने उसको आहत किया वही बेटी को भी चुभ रहा है। मेरी प्यारी, तेरी मां है ना तेरे साथ। इस बार कुछ तूफानी करते हैं, अंजलि ने कहा। मां..., हां किरण... हम दोनों ही चलते हैं। सच मम्मा, हां। चल, अब खाना खा, अंजलि उसे डाइनिंग टेबिल पर ले आई।

सुबह पति के ऑफिस जाने के बाद अंजलि ने किरण के साथ नेट पर जगह देखना शुरू किया। तभी अंजलि का फोन बज उठा। सासूमां का फोन, कहते हुए उसने फोन उठाया। हालचाल के बाद उसने घूमने जाने की बात बताई तो उन्होंने कहा, मैं भी चलूंगी। बिना तुम्हारे पापा के कभी गई नहीं। पर अब तुम लोगों के साथ जाऊंगी। और अपनी मां, से भी पूछ लो।

अंजलि ने जब किरण को बताया तो वह बहुत खुश हुई। दादी भी हमारी टीम में हैं। मम्मा नानी से भी पूछ लो, वह बोली। अंजलि ने कहा, यह पहल तुम ही करो। बस, किरण ने नानी को फोन लगाया। उन्होंने भी हां कर दी।

बहुत सारी जगह देखने के बाद आखिरकार हिमाचल जाना पक्का किया। अंजलि की सहेली के ट्रेवल एजेंट पति की मदद से बुकिंग हो गई।  

सब एकदम शांति से हो रहा था। किरण जितनी खुश थी, उससे अधिक अंजलि प्रसन्न थी। दोनों बुजुर्ग एक साथ आ गई। मां और सास को साथ देखकर सुहास को आश्चर्य हुआ। आप दोनों.. बिना बताए, कुछ खास, उसने पूछा।

बेटे के घर आने के लिए क्या परमिट लेना होगा, सुहास की मां ने जवाब दिया। नहीं... वह हौले से बोला। तुझे तो फुर्सत होती नहीं इसलिए पोती से मिलने आ गई और समधिन को भी ले आई। ऑफिस जा, देर हो रही होगी, उन्होंने बेटे को टोका। किरण तो दादी के गले लग गई और नानी को बोली, आप दोनों कितनी अच्छी हैं। थैंक्यू। अरे थैंक्यू तो हम कहेंगे। पहली बार बहू और पोती के साथ कहीं जाऊंगी।

पहली बार अपने आप जाने का सुख बुढ़ापे में ही सही तेरी बदौलत मिला तो सही, दादी ने माथा चूमते हुए कहा। नानी की आंखें भी पनीली हो गई। कहने को सब है पर आजादी नहीं।

रात को जब सब गपशप कर रहे थे, तब अंजलि ने कहा, सुहास हम लोगों की सुबह फ्लाइट है। कहां की? उसने पूछा।

हम चारों शिमला जा रहे हैं घूमने, अंजलि ने उत्तर दिया।

चारों... वह कुछ कहता उससे पहले सासूमां बोलीं, हम चार महिलाएं। समझे कि नहीं। पर मां बुढ़ापे में पहाड़ पर, सुहास बोल उठा।

तुम्हारी इसी चिंता के कारण तो कहीं हम निकल ही न सके। मरने से पहले कम से कम पहाड़ देखने का शौक तो पूरा कर लें, सासूमां बोलीं। तुम परेशान मत हो। हम सब अपना देख लेंगी। मां के आगे सुहास निरुत्तर था। चुप ही रहा। 

सोने से पहले क्रेडिट कार्ड और नोटों की एक गड्डी अंजलि के हाथ पर रख दी। सुबह अंजलि उठी तो देखा सुहास भी जग गया है।  

सुहास खुद सबको एयरपोर्ट छोडऩे गए। विदा लेते समय सुहास ने बेटी के सिर पर हाथ फेरा और हौले से कहा, सॉरी।

किरण बोली, इट्स ओके पापा। इंजॉय योर जर्नी किरण, सुहास ने जोर से कहा। बाय करके चारों यात्री सफर पर निकल पड़ीं और सुहास हाथ हिलाता रहा...। 

यह भी पढ़ें -सन्नाटा - गृहलक्ष्मी कहानियां

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