मुर्दाघर की तलाश में - गृहलक्ष्मी कहानियां

देवेन्द्र कुमार मिश्रा

25th January 2017

उसे लगा कि मैंने उसे पहचान लिया है तो वह दूसरी तरफ सहज भाव से घूम गया, जैसे उसने मुझे देखा ही न हो। फिर तेज कदमों से चलता हुआ सड़क की तरफ पहुंच गया। मैं एक क्षण सोच में पड़ गयी। क्या ये वही है? कहीं मेरी आंखें तो धोखा नहीं खा गई। नहीं ये वही है, लेकिन मुझे देखकर अनदेखा क्यों करके चला गया? मैं तो उसकी दोस्त थी और उसके शहर छोड़ने तक भी थी।

मुर्दाघर की तलाश में  - गृहलक्ष्मी कहानियां

माना कि उसके जीवन में कुछ कड़वे अनुभव थे। वह शहर छोड़ने के विषय में पहले भी कहता रहता था लेकिन मुझे लगा ये उसका गुस्सा है। अपमान और उपहास का गुस्सा। जो ठंडा होते ही वह इस विचार को त्याग देगा। किन्तु शायद वह भुला नहीं पाया था उन बातों को, जो हमारे जैसे लोगों के लिए छोटी हो सकती है। इतन तो होता रहता है जीवन में किन्तु वह चिढ़ने लगा था, सतत् होती इन बातों से। वह भावुक था, ये तो पता था किन्तु उसकी नाराजगी उसका गुस्सा इतना ज्यादा था, ये पता नहीं था।

शहर छोड़ा भी तो अचानक बिना किसी को बताये। उसके सगे-सम्बन्धी सभी को आश्चर्य था कि कोई इतना सब कैसे छोड़कर जा सकता है। और क्या जरूरत थी? मैं भी सड़क पर पहुंची और खोमचे वाले से पूछा'' ये बस कहां तक जाती है।'' 

‘‘मैडम जी, सिटी बस है। घूम-फिरकर यही आयेगी। आपको कहां जाना है?खोमचे वाले ने अपना काम करते हुए सहज भाव से उत्तर दिया।

‘‘इस बस का रूट क्या है?'' मैंने पूछा।

‘‘ये तो नहीं मालूम । मैं कुछ दिन ही हुए गांव से आया हूं।''

मुझे लगा ज्यादा पूछना ठीक नहीं। यदि किसी ने बता भी दिया तो इतने बड़े शहर में कहां कहां तलाश करूंगी? फिर जो व्यक्ति खुद से भाग रहा हो, अनदेखा कर रहा हो। उसके पीछे जाने से क्या होगा।

हम दोनों एक ही दफ्तर में काम करते थे। सहकर्मी थे। उसकी शादी हुए काफी समय हो चुका था। एक-दो बार मैं उसके घर भी गई थी। सुन्दर और व्यवहार कुशल पत्नी थी उसकी । मैं भी शादीशुदा थी। एक बेटा था मेरा। पता नहीं क्या बात थी कि कुछ दिन से दफ्तर के लोग उसे परेशान सा करने लगे थे। हो सकता था कि वह आफिशियल छेड़छाड़ हो। कभी-कभी हंसी मजाक के मूड में किसी एक व्यक्ति को निशाना बना लिया जाता है। फिर पता नहीं कैसे वह सतत् निशाना बनता रहा है? शायद इस वजह से कि छेड़छाड़, नोंकझोंक से तिलमिलाता था और अधिक हंसी मजाक के लिए उसे छेड़ा जाता था। कभी कोई और सहकर्मी अपनी गलती उस पर डाल देता और अफसर से शिकायत कर देता। उसे डांट पड़ती। उससे जबाव देते न बनता।

शायद वह समझ ही नहीं पाता था कि उसे डांट क्यों पड़ रही है? हड़बड़ाहट में वह कुछ का कुछ जवाब दे देता। उस पर उसे और डांट पड़ती। वह सहम जाता और दफ्तर के लोग उसपर जोर से हंसते तो उसे बुरा लगता। वह मन मसोसकर रह जाता। आॅफिस में सभी उसे दुश्मन नजर आते। एक मैं थी जिससे वह बात करता। लंच में उसने मुझसे कहा- ‘‘देखा आपने, करे कोई भरे कोई। इन लोगों को शर्म आनी चाहिए।

‘‘मिस्टर कार्तिक'' मैं उसे समझाती-‘‘आप इतना चिढ़ते हैं इसलिए ये लोग जानबूझकर चिढ़ाते हैं। आप खामोश रहिये। सबकी बातों को अनदेखा करिये।''

‘‘कैसे अनदेखा कर दूं मिसेज खान। ''आखिर कब तक मैं सहता रहूं। मेरे चुप रहने से ही इनकी शह बढ़ी है। ये सरकारी दफ्तर है कोई बच्चों का स्कूल नहीं है, जहां इस तरह का मजाक हो। दफ्तर की एक मर्यादा होती है। ‘‘वह कहता रहा। मैं सुनती रहती, ताकि उसका गुस्सा बाहर निकल सके। दूसरे दिन अधिकारी ने उससे एक फाइल मंगवाई। वह अपनी अलमारी में फाइल ढूंढता रहा, किन्तु उसे फाइल नहीं मिली। उसने अधिकारी के पास जाकर कहा-‘‘सर, मेरे साथ दफ्तर के लोग शरारत कर रहे हैं शायद वे नहीं चाहते कि मैं ये नौकरी करूूं।

‘‘शिकायत बाद में मिस्टर कार्तिक '' अफसर ने दो टूक स्वर में कहा।‘‘वही तो मैं बता रहा हूं सर। मेरी फाइल छिपा दी हैं किसी ने।''

‘‘किसने''

‘‘ये तो पता नहीं सर, लेकिन....

‘‘ये क्यों नहीं कहते कि आपने फाइल तैयार ही नहीं की। अपने बचाव में आप दूसरों पर चोरी का आरोप लगा रहे हैं।''

‘‘चोरी नहीं सर, शरारत।''

‘‘कैसी शरारत''

‘‘किसी ने मुझे तंग करने के लिए छिपा दी होगी।''

‘‘चलो मेरे साथ'' अफसर ने कहा और कार्तिक की टेबिल के अगल-बगल लगी टेबिल में बैठे कर्मचारियों से पूछा-''मिस्टर वर्मा, क्या आपने इनकी फाइल छिपाई है।''

‘‘नो सर'' वर्मा ने मासूमियत से उत्तर दिया।

‘‘इनकी फाइल नहीं मिल रही है। आप तलाशने में मदद करें। अफसर ने आदेश दिया

‘‘यस सर'' वर्मा ने कहा।

वर्मा ने कार्तिक की अलमारी में कुछ देर तलाशने का नाटक किया। फिर बहुत सी फाइलों में से एक फाइल निकालते हुए कहा-''सर, ये रही जी.पी.एफ. फाइल'' अफसर ने गुस्से से कार्तिक को देखते हुए कहा-''नशा करते हो क्या? दूसरों पर आरोप लगाते हो। काम नहीं बनता तो छोड़ क्यों नहीं देते नौकरी। घूस खाकर भर्ती हुए हो क्या?

‘‘सर, मैं पूरी ईमानदारी और अपनी मेहनत से भर्ती हुआ हूं।'' कार्तिक कुछ इस तरह बोला कि अफसर को बात चुभ गई। उन्होंने गुस्से में कहा-''तुम कहना क्या चाहते हो? मैं बिना मेहनत के भर्ती हुआ हूं। तुम मुझ पर, अपने अफसर पर जातिगत प्रहार कर रहे हो। तुम्हारे खिलाफ डिपार्टमेंटल एन्क्वायरी होगी। विभाग के हो इसलिए केस नहीं कर रहा हूं।'' अफसर गुर्राता हुआ चला गया और कार्तिक को लगा कि वो एक नई मुसीबत में फंस गया है।

कार्तिक ने वर्मा और पिन्टो की तरफ मुखातिब होकर कहा -‘‘मैं जानता हूं, ये सब आप लोगों का किया-धरा है।''

‘‘हमें तो आप पहले ही चोर ठहरा चुके हैं।'' वर्मा ने कहा।

‘‘अब क्या फांसी पर चढ़ा दोगे? पिन्टो ने वर्मा का साथ देते हुए कहा।

कार्तिक के विरूद्ध विभागीय जांच बैठी। उसका इन्क्रीमेंन्ट रोक दिया गया एक वर्ष को, और सख्त हिदायत भी दी गई।

अगले दिन दफ्तर से वर्मा, पिन्टो और अन्य कर्मचारी नदारद थे। साहब भी नहीं थे। कार्तिक ने पूछा था। मैंने सकुचाते हुए उत्तर दिया'' आज साहब के यहां पार्टी है। सब वहीं गये हैं। मुझे भी जाना है। आपको नहीं बताया ओह...माफ करना......''

‘‘हां मिसेज खान, मुझे क्यों बुलायेगे? मेरी सजा पर मेरी हार पर पार्टी हो रही होगी।''

‘‘ऐसा नहीं है कार्तिक जी। साहब की पत्नी का बर्थ डे है। शायद आप उनके घर खाना ना पसन्द करते हो।''

‘‘अब एक और आरोप ‘‘कार्तिक ने अपमानित महसूस करते हुए कहा-''मैंने कब जातिगत कुछ कहा है?''

‘‘लेकिन साहब ने तो ऐसा ही समझा। ''

उनकी समझ ही सब कुछ है। मैं कुछ भी नहीं। पता नहीं क्यों लोग मुझे नीचा दिखाने पर तुले रहते हैं। बीस साल हो गये नौकरी करते हुए। आप भी जानती हैं। लेकिन ये कल के लोग पता नहीं क्या समझते हैं मुझे? सोचता हूं कम्पसलरी रिटायरमेंट ले लूं। अब मेरा यहां गुजारा नहीं हो सकता।

मैंने उसे हर तरह से समझाया। हर तरह से ढांढस बंधाया। कार्तिक स्वयं को अकेला महसूस न करे। इसके लिए कार्तिक के साथ लंच भी करती थी। सारा आॅफिस खाली था। चपरासी भी साहब के घर पार्टी पर गया था। कार्तिक सोचने लगा कि मैं चपरासी से भी गया गुजरा हो गया सबके लिए। कार्तिक आॅफिस में अकेला बैठा सिगरेट पीते हुए सोच में डूबा हुआ था। उसके चेहरे पर मायूसी थी। उदासी थी। वह स्वयं को अपमानित महसूस करते हुए विगत के अपमानित घटनाक्रम, उसके न चाहते हुए भी उसे याद आ रहे थे। वह टूट रहा था। चटक रहा था अन्दर ही अन्दर ।

पिता के स्वर उसके कानों में गूंज रहे थे। ‘‘निकल जा मेरे घर से । निकल जा मेरे घर से'' और वह सोचने लगा कि जिस घर को वो अपना घर समझता रहा है। वह उसका नहीं उसके पिता का घर है। मां की आवाज उसके कानों में गूंजने लगी। ‘‘कुछ करते क्यों नहीं। कब तक हमपर बोझ बने रहोगे।'' मैं बोझ हूं अपनी मां पर। बहन की चोट पहुंचाती बात उसे याद आने लगी। ''तुम क्या मेरी शादी में मदद करोगे। तुम ठहरे निठल्ले। तुम्हारा खुद का तो ठिकाना नहीं है। घर में पड़े रोटियां तोड़ते रहते हो।''

‘‘उसे अपनी प्रेमिका की लताड़ याद आई। व्यवहार तक ठीक है तुमसे टाइमपास हो जाता है। शादी और तुमसे। अपने को आइने में देखा है। औकात देखी है अपनी''

सुहागरात वाले दिन ही उससे पत्नी ने कहा था-''मुझसे दूर रहना। मजबूरी में शादी की है तुमसे। मैं किसी और को चाहती हूं। जब वो आ जायेगा तो मैं चली जाउंगी।'' उसने कितना अपमानित महसूस किया था खुद को। फिर पत्नी का प्रेमी नहीं आया और उसे स्वीकारना पड़ा था उसी पत्नी को जिसने शादी की पहली ही रात उसे ठुकरा दिया था। अक्सर बातों में पत्नी के शब्द उसे याद आ जाते ।

‘‘तुम मेरी मजबूरी हो। अपने प्रेमी की बेवफाई के कारण मैं तुम्हारे साथ हूं वरना मैं कहां और तुम कहां?''

उफ् अपमान, अपमान घोर अपमान। ये धरती फट क्यों नहीं जाती। ये दुनियां मेरे काम की नहीं है। मैं इस संसार के लायक नहीं हूं। उफ् क्या जिन्दगी है मेरी? पुलिस वाले कपड़े उतारकर उसे निर्वस्त्र करके पीट रहे थे और उसकी पत्नी दहेज की एफ. आई. आर. लिखवा रही थी। पुलिस की वो मार वो गालियां जैसे कल की ही बात हों। पत्नी ने 498 ए धारा की ताकत दिखाकर उसे झुका भी दिया और रिपोर्ट वापस लेकर उसपर अहसान भी कर दिया। काश....कि डूब मरता मैं, चुल्लू भर पानी में। बेटी घर से भाग गई। पूरे मुहल्ले में उसकी थू-थू हुई। उसकी परवरिश पर अंगुली उठाई गई। कितना अपमान कितनी पीड़ा कितने दुख... और आज बीस वर्ष की नौकरी के बाद भी वह आॅफिस में अकेला अपमानित, प्रताड़ित बैठा है।

आफिस में कुछ न कुछ हरकतें हो ही रही थी कि एक दिन मेरे पति आ धमके और कार्तिक का काॅलर पकड़ते हुए बोले-'' अपनी पत्नी और बेटी तो संभलती नहीं है। दूसरे ही पत्नियों पर डोरे डालते हो'' कार्तिक अवाक रह गया। पूरा आॅफिस उसका तमाशा देख रहा था और कार्तिक शर्म से गढ़ा जा रहा था। मैंने आकर अपने पति से पूछा-''क्या बदतमीजी है।''मिस्टर खान ने मुझे एक पत्र थमा दिया। जिसमें कार्तिक और मेरे प्रेम सम्बन्धों के विषय में लिखा था। तब मैं उन्हें आॅफिस से बाहर ले गई। आॅफिस में घट रही गतिविधियों से अवगत कराते हुए कहा-''वह एक सीधा-सच्चा और पीड़ित व्यक्ति है।'' बात को समझते हुए मिस्टर खान ने उन्हें बुलाकर माफी मांगी। लेकिन तमाशा तो हो चुका था। लोग चटखारे ले रहे थे।

दूसरे दिन कार्तिक दफ्तर नहीं आया। न ही कोई अवकाश का आवेदन। कई दिन गुजर गये । मुझे भी घरेलू शादी के लिए लम्बी छुट्टी लेनी पड़ी। एक माह बाद जब मैं वापिस आॅफिस पहुंची तो पता चला कि कार्तिक ने वी.आर.एस. ले ली। शहर छोड़कर चले गये। कहां पता नहीं? उनके घर जाकर भी पूछताछ की मैंने, लेकिन कुछ पता न चला। उनकी पत्नी घर बेचकर अपने भाई के घर रहने चली गई थी। फिर दिन-रात गुजरते रहे। नये लोग आते रहे। पुराने लोगों का तबादला हो गया। अफसर भी बदल गये।

मैं स्वयं प्रमोशन पाकर भोपाल आ चुकी थी। आडिट पार्टी के साथ उज्जैन गई तो पति और बेटे ने भी घूमने की जिद की। मैं उनके साथ होटल में ठहरी थी। कार्तिक को मैं भी तकरीबन भूल चुकी थी। इन सब बातों को पांच-सात साल हो चुके थे और आज अचानक नजर पड़ी तो वह अनदेखा करके चला गया। वह यहां क्यों था? किसके साथ था? क्या कर रहा था ? कई प्रश्न दिमाग में उमड़ रहे थे। अचानक फिर वह मुझे दिखाई दिया। मैं उसके पीछे हो ली। क्यों, मुझे भी पता नहीं। आवाज देती तो शायद वह न रुकता। एक सस्ते से होटल में उसनें प्रवेश किया। मैंने काउन्टर पर बैठे व्यक्ति से पूछा-'' आपके लाॅज में कार्तिक नाम का व्यक्ति रहता है।''

‘‘जी, हां''

‘‘मुझे उनसे मिलना है। आप उन्हें बुलवा दीजिए।''

‘‘जी, आप बैठिये। मैं बुलाता हूं। '' काउन्टर पर बैठा व्यक्ति ऊपर चला गया। मैं नीचे रेस्टोरेंट में बैठ गई।

वह मेरे सामने था। शरीर पर पुराना सा लिबास था। दाढ़ी बेतरतीब बढ़ी हुई। चेहरे पर स्थाई वीरानगी। दफ्तर का सजा-धजा एकाउन्टेन्ट आज किसी बीमार मजदूर की तरह दिख रहा था। बालों में सफेदी थी।

‘‘मुझे पहचाना'' उसे सामने देखकर मैंने उससे पूछा।

‘‘जी आप मिसेज खान'' उसने नमस्ते की और सामने की कुर्सी पर बैठ गया।

‘‘क्या लेगी आप'' उसने पूछा।

‘‘पहले आप अपने बारे में बताइये।'' मैंने उत्सुकता से पूछा।

‘‘मैं इस लाॅज का मैनेजर हूं। मेरी डयूटी रात 10 बजे से सुबह आठ बजे तक होती है। यही कमरा भी मिला हुआ है। '' उसने दो काॅफी के लिए वेटर को बोला।

‘‘आप अपनी नौकरी, घर-परिवार छोड़कर यहां कैसे?''

‘‘बहुत बुरे लोगों के बीच में आदमी घिर जाये तो फिर भागना पड़ता है। आप किसी से जिक्र मत करिये कि मैं यहां पर हूं। मैं नहीं मिलना चाहता किसी से। न वर्मा से न पिन्टो से न अपनी पत्नी से......किसी से नहीं।

‘‘उफ् ये आदमी जिनके कारण सबकुछ छोड़कर भागा। उन्हें तो इसकी शक्ल भी याद नहीं होगी। उनका तो प्रमोशन होकर ट्रांसफर हो चुका, कब का? ये आदमी उसी बात को पकड़ कर बैठा हुआ है और भाग रहा है, पूरी दुनिया से। वेटर काॅफी लेकर आ गया। '' आप यहां कैसे मिसेज खान?''

‘‘मैं प्रमोटी होकर आॅडिटर बन चुकी हूं। आॅडिट पार्टी के साथ आई हूूं। मेरे पति और बेटा भी साथ है।'' वह चुप रहा।

‘‘क्या किसी एक वजह से आदमी को सबकुछ छोड़ देना चाहिए।'' मैंने पूछा।

‘‘मैंने किसी वजह से कुछ नहीं छोड़ा है। छोड़ना होता तो तब छोड़ देता, जब मेरे पिता ने कहा था कि निकल जाओ मेरे घर से। मां ने कहा था कि... बहन ने कहा था कि... प्रेमिका ने कहा था कि...........पत्नी ने तो न जाने क्या-क्या कहा और किया? बेटी घर से भाग गई तब भी नहीं भागा मै। सब कुछ छोड़कर।''

‘‘तो क्या आॅफिस के माहौल के कारण।''

‘‘नहीं''

‘‘तो फिर''

‘‘कोई कैसे ऐसे लोगों के बीच रह सकता है जो केवल अपने मनोरंजन के लिए दूसरों को तकलीफ पहुंचाते हैं बिना ये जाने कि वो आदमी पहले से ही कितना टूटा हुआ है। आॅफिसर भी बिना समझे बेइज्जती करता है। सफाई दो तो उसे अपना अपमान समझकर सजा देता है। कोई कैसे ऐसे लोगों के बीच रह सकता है? मुझे घिन आती है ऐसे लोगों से।''

कार्तिक के चेहरे पर घृणा थी सबके प्रति। मैंने उसे समझाते हुए कहा-‘‘मान लीजिये'' कल यहां का माहौल आपके विरोध में हो गया। तब क्या करेगें? फिर भाग जाएंगे।

कुछ देर खामोश रहने के बाद वह बोला-''मैं भाग नहीं रहा हूं। दुनियां से कोई कैसे भाग सकता है भला? ये तो होटल है यहां कोई कुछ भी कहे, क्या फर्क पड़ता है। लेकिन पढ़े-लिखे सभ्य लोग असभ्यता का प्रदर्शन करें और करते ही रहें। सामने कुछ, पीछे कुछ,। ऐसे लोगों से कौन दूर नहीं होना चाहेगा। आपके पति ने मेरा काॅलर पकड़ लिया था। उन्होंने पूछा भी नहीं मुझसे। न आपसे । क्या ये व्यवहार ठीक था। मैं जानता हूं कि उन्होंने माफी भी मांग ली थी। लेकिन ये तो वही हुआ कि पहले जलील किया फिर....ऐसी दुनिया, ऐसे लोग आपको ही मुबारक हो।''

‘‘क्या आपने अपने पति को माफ नहीं किया।''

‘‘उन्होंने माफी मांग ली। यह उनका बड़प्पन था। वरना मैं किस लायक था। वो नहीं भी मांगते माफी, तो मैं क्या कर लेता। मैं एक कमजोर, गरीब, पीड़ित आदमी। अपमान, प्रताड़ना तो किस्मत में लिखवाकर लाया हूं। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं। इसी दुनिया में आप जैसी महिला भी तो हैं। शायद इसलिए ये दुनिया पूरी तरह त्यागने योग्य नहीं है। लेकिन जब आपके पति ने आप पर आपके ही आॅफिस में ही मेरे साथ चारित्रिक हमला किया तो क्या आपको बुरा नहीं लगा। आपने अपमानित महसूस नहीं किया स्वयं को।''

‘‘किया था। उन्होंने बार-बार मांफी मांगी थी। वे बहुत शर्मिन्दा हुए थे। घर में भी उन्हें खूब डांटा था। काफी समय नाराज रही थी'' उनसे। लेकिन इस एक बात पर सबकुछ छोड़ तो नहीं सकती थी।

‘‘आपके साथ यही एक बात हुई होगी। मेरे साथ तो हर रिश्ते, हर सम्बन्धों में कटुता थी। अपमान था। मैं कब तक बेशर्मी की तरह उनके बीच रहता। छोड़ा मैंने भी कुछ नहीं है। मेरी पत्नी के नाम मकान है। जी. पी. एफ. फंड का आधा पैसा देकर आया था। अभी भी आधी पेंशन उसके खाते में जमा करता हूं, लेकिन किसी को मेरी जरूरत नहीं थी। कब तक उपेक्षा का दंश झेलता रहता। आप मुझे भगोड़ा, कायर कुछ भी कह सकती हैं। लेकिन मैं तो मात्र बदला ले रहा हूं सबसे। अगर किसी को मेरी परवाह नहीं, तो मुझे भी किसी की जरूरत नहीं।''

‘‘बदला तो आप स्वयं से ले रहे हैं। देखी अपनी हालत आपने।''

‘‘हां, मैं खुद से भी खफा हूं, कहते हुए कार्तिक की आंखों में आंसू भर आये।

काॅफी कब की खत्म हो चुकी थी। मैंने घड़ी पर निगाह डाली। काॅफी समय हो गया था। मैंने कहा-''अच्छा चलती हूॅं। फिर मुलाकात होगी।''

वह कुछ नहीं बोला। मुझे बाहर तक छोड़ने आया। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। जैसे निर्जीव हो कोई। मैंने अपने पति को उसके विषय में बताया। उन्होंने कहा- '' ओह, ये तो बहुत बुरा हुआ। एक बार फिर माफी मांग लेंगे। ''आॅडिट खत्म होने के बाद हम सब वापिसी की तैयार में थे। मैंने सोचा -‘‘जाते-जाते मिल लिया जाये। फिर पता नहीं मुलाकात हो न हो।'' दफ्तर की सरकारी गाड़ी थी। मैंंने ड्राइवर को होटल का पता बताते हुए कहा-'' दस मिनट के लिए रोक लेना। गाड़ी रूकी। मैं होटल कम लाॅज पहुंची। काउन्टर पर बैठे मैंनेजर से पूछा कि रात में डयूटी करने वाले मैनेजर से मिलना है। मैं पहले भी आई थी। इसलिए वह पहचान गया। मेरे साथ मेरे पति और बेटा भी था।

‘‘आपको मिस्टर कार्तिक से मिलना है।''

‘‘जी''

‘‘लेकिन वे तो नौकरी छोड़कर चले गये।''

मैं सन्नाटे में आ गई।

‘‘कब चले गये।''

‘‘जिस दिन आप आई थी उसी दिन।''

‘‘कोई कारण''

‘‘कारण तो कुछ भी नहीं था। कुछ सनकी टाइप थे। कहने लगे यहां से और दूर किसी एकान्त में जाना चाहता हूं।''

‘‘कुछ बताकर गये हैं।''

‘‘मैंने पूछा था तो कहने लगे, मुझे खुद पता नहीं कहां जाउंगा?''

मैंने अपने पति की तरफ देखा। उन्होंने कहा-‘‘जो खुद से भागता फिर रहा हो। उसे ढूंढना मुश्किल है।'' हम गाड़ी में बैठे और अपने शहर अपने दफ्तर की तरफ बढ़ चले।

‘‘मुझसे भागने की क्या वजह थी? या किसी भी पूर्व परिचित को देखकर उन्हें अपना अतीत याद आने लगता था।''

पता नहीं मिस्टर कार्तिक अपने जिंदा शरीर के साथ किस मुर्दाघर की तलाश में भटक रहे हों।

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