अभिभावकों की आकांक्षाओं के बोझ तले दम तोड़ते बच्चे

Dr. Vinod Gupta

31st July 2020

हर मां - बाप को अपने बच्चों से ढेरों उम्मीदें होती हैं,जिसे पूरा करने के लिए सारा जतन भी करते हैं,पर इस कोशिश में कुछ मां-बाप इतने आगे चले जाते हैं कि उनकी उम्मीदों के बोझ तले बच्चे दब कर रह जाते हैं और कभी तो ऐसे बच्चे आत्महत्या जैसे घातक कदम भी उठा लेते हैं।

अभिभावकों की आकांक्षाओं के बोझ तले दम तोड़ते बच्चे

अपना बच्चा अच्छा पढ़े, अच्छे अंक लाए और घर-परिवार का नाम रोशन करे, यह प्रयास तो होना चाहिए, लेकिन बच्चों के लिए कोई लक्ष्य निर्धारित कर देना और फिर उसकी पूर्ति के लिए दबाव बनाने से बच्चों के मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे बच्चे आत्महत्या जैसे कदम भी उठा सकते हैं।

किशोरवय बच्चों की आत्महत्या करने में सबसे बड़ा कारण पढ़ाई का बोझ है। माता-पिता को फर्स्ट क्लास से कम पर तो संतोष होता ही नहीं। वे और अधिक पढ़ने तथा और अधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाते हैं। अब यदि बच्चे उस कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं तो वे किस मुंह से अपना परीक्षा परिणाम अभिभावकों को बताएं? कई अभिभावक तो चेतावनी देकर रखते हैं कि यदि फेल हो गया तो अपना मुंह मत दिखाना। ऐसे में फेल होने वाले बच्चे के पास आत्महत्या करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता।

पढ़ाई का बढ़ता दबाव

आजकल अपनी संतानों के प्रति माता-पिताओं की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई है। हर माता-पिता चाहे स्वयं अंगूठाछाप हों, अपने बच्चे को आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर बनने पर तुले हुए हैं। ‘हम दो हमारा एक' का नारा चल रहा है। माता-पिता दोनों नौकरी कर रहे हैं। वे अपने बच्चे की पढ़ाई पर चाहे जितना खर्च करने को तैयार हैं और उसकी एवज में वे बच्चे से 90 प्रतिशत से अधिक अंक की आशा रखते हैं। यही अपेक्षा दबाव का रूप ले लेती है। जब बच्चा किशोरावस्था में आता है और जब सही मायने में उसे अन्य बच्चों के साथ प्रति-स्पर्धा करनी पड़ती है, तब उसे उस स्थिति से पार पाना नहीं आता और वह आशाभरी दृष्टि से माता-पिता की ओर देखता है। पर माता-पिता पहले ही उसे अपनी शर्तों की बोझ से लाद चुके हैं। ऐसे में बच्चा ऐसा सहारा ढूंढ़ता है, जहां उसे उस बोझ से छुटकारा मिले। ऐसे में या तो वह बुरी संगत में पड़ता है या फिर आत्महत्या की राह पर चल पड़ता है।

वैसे हर बच्चा अपने स्तर पर अच्छा पढ़ता-लिखता है, लेकिन उसकी तुलना उससे होशियार बच्चे से करना और फिर उस होशियार बच्चे की बराबरी करने को कहना, ठीक नहीं, क्योंकि पांचों अंगुलियां बराबर नहीं होती हैं। यदि आपका बच्चा औसत है, तो उससे यह उम्मीद रखना व्यर्थ है कि कक्षा में अव्वल आए।

फेल होना ज़िंदगी की हार नहीं

माता-पिता बच्चों के अनुतीर्ण हो जाने पर उन्हें प्रताड़ित करते हैं, लेकिन अनुतीर्ण होने के लिए क्या सिर्फ बच्चे दोषी हैं। शिक्षक और अभिभावक नहीं? तो फिर बच्चों को इसके लिए प्रताड़ित क्यों किया जाता है? एक ही कक्षा में पढ़ने वाले सभी बच्चों का बौद्धिक स्तर समान नहीं होता और न ही उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि एक समान होती है। यही कारण है कि एक ही शिक्षक से समान शिक्षा पाने वाले कुछ छात्र जहां श्रेणी में उत्तीर्ण होकर मेरिट लिस्ट में स्थान पाते हैं, वहीं कुछ को पास होने के भी लाले पड़ जाते हैं और वे असफल हो जाते हैं।बहुत से माता-पिता अपने बच्चे की असफलता को बर्दाश्त नहीं कर पाते और बेरहमी से उसकी पिटाई करते हैं। एक परिचित का बच्चा फेल हो गया था। जब वह अपनी अंकसूची लेकर घर पहुंचा, तो पिता आगबबूला हो गए। बच्चे को लात, घूंसों और डंडे से इस तरह मारा कि अधमरा ही कर दिया। क्या बच्चे के साथ मारपीट करना उचित था? क्या उसे प्यार से समझाने से काम नहीं चल सकता था?

यदि आपका बच्चा पढ़ाई में कमजोर है, तो उसकी कमियां दूर करने का प्रयास कीजिए। यह पता लगाइए कि वह किस विषय में कमजोर है। अगर उसे किसी विषय में ट्यूशन की जरूरत हो तो व्यवस्था कीजिए। उसके पाठ्यक्रम की जानकारी रखिए तथा उसी हिसाब से उसकी अगली परीक्षा की तैयार कराइए। उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिए।जो बच्चे पूर्व में अनुतीर्ण हो गए हों, उनमें आत्मविश्वास जागृत करने की आवश्यकता होती है। जब उन्हें स्वयं अपनी शक्ति पर भरोसा हो जाएगा, वे कठिन से कठिन चुनौती का मुकाबला कर सकेंगे। सच तो यह है कि आत्मविश्वास अथवा मनोबल ही परीक्षा में सफलता की कुंजी है।

बच्चों में जगाएं आत्मविश्वास

बच्चे के फेल हो जाने पर उसका तिरस्कार न करें, जो होना था, सो हो गया। हां, अगली बार उसे असफलता न मिले, इस हेतु सतर्क होने की जरूरत है। वास्तव में अनुतीर्ण होना एक तरह की चेतावनी है, जो इस बात को सूचित करती है कि बच्चे की पढ़ाई में कुछ कमी है। इसके निदान के लिए इससे जुड़े सभी पक्षों पर बैठ कर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

परीक्षा में असफल होने पर बच्चों का मनोबल टूट जाता है, उन्हें लगता है कि यदि अगली बार भी वे सफल नहीं हो पाए तो क्या होगा? कई बार तो इसी वजह से वे याद किया हुआ सब भूल जाते हैं, अत: उनका मनोबल बनाए रखने की जरूरत है। अगली बार जब बच्चा परीक्षा देने जाए, तो उसे धीरज बंधाइए कि तुमने वर्ष भर मन लगा कर पढ़ाई की है, अत: परीक्षा से भय अथवा चिंतित होने की कोई बात नहीं है और शांत भाव से परीक्षा दो। फिर देखो, कितने अच्छे नंबरों से पास होते हो।

आपके सकारात्मक दृष्टिकोण से बच्चों को प्रेरणा मिलती है। इसके विपरीत यदि आप किसी बच्चे से यह कहें कि पिछली बार फेल होने पर तो केवल डांट ही पड़ी थी, इस बार हड्डियां तोड़ देंगे, या फेल होने पर हमें अपना मनहूस चेहरा मत दिखाना तो सच मानिए, वह कभी सफल हो ही नहीं सकेगा।

मानसिक अवसाद में जाने दें

अभिभावकों एवं शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को मानसिक अवसाद की स्थिति से उबारें और उन में एक नई चेतना और स्फूर्ति का संचार करें ताकि वे पिछला परिणाम भूल कर आगे अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने की दिशा में सोच सकें। बच्चों की पढ़ाई लिखाई और गतिविधियों के प्रति उदासीन रहने वाले माता-पिता समय निकल जाने के बाद लाठी भी पीटें तो उससे क्या होगा? बेहतर होता कि वे सालभर बच्चों की पढ़ाई के प्रति जागरूक रहते और उन्हें पढ़ने लिखने संबंधी साधन सुविधाएं उपलब्ध कराते, तो शायद उन्हें यह दिन देखना न पड़ता। लेकिन माता-पिता तभी जागते हैं, जब उनका बच्चा फेल हो कर घर लौटता है। माता-पिता और शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों की वर्षभर की शैक्षिक प्रगति पर नजर रखें और वक्त रहते उनकी कमजोरी को दूर करें। यदि ऐसा किया जाए तो बच्चों को परीक्षा में असफलता हाथ नहीं लगेगी।

दरअसल यदि बच्चों को आत्महत्या से बचाना है, तो उनके माता-पिता की काउंसलिंक की जरूरत है। माता-पिता अगर अपने बच्चों पर पढ़ाई का दबाव व अच्छे नंबर लाने के लिए बार-बार कहना बंद कर दें, तो शायद स्थितियों में थोड़ा परिवर्तन आ सकता है। इसी प्रकार पढ़ाई में पिछड़े या औसत बच्चों की काउंसलिंग करना भी जरूरी है ताकि वे आत्महत्या जैसे कठोर कदम नहीं उठाएं।

माता-पिता को यह समझना होगा कि परीक्षा में अधिक अंक लाना ही एक मात्र सफलता की कसौटी नहीं है। हर बच्चे में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है, अत: उसे पहचानना होगा तथा उसे उभारने के प्रयास करने होंगे। दुनिया में अनेक ऐसे ख्याति प्राप्त और सफलतम लोग हैं जो पढ़ाई में भले ही पिछड़े हों, लेकिन अपने क्षेत्र में अव्वल हैं। 

 

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