''प्यार का बन्धन''

Poonam Mehta

1st August 2020

घर की ड़ोर-बैल बजी तो राखी दौड के दरवाजे पर पहुंची। दरवाजे पर पोस्टमैन था। कोई रजिस्ट्री लाया था। राखी के दिल की धडकने बढ गई। कांपते हाथों से रजिस्ट्री खोली तो श्रेय के एग्जाम का फार्म निकला। आज भी उसे मायूसी हाथ लगी।

''प्यार का बन्धन''

        दिल के किसी कोने मे उसे एक आशा सी थी कि शायद इस बार खत का जवाब आ जाये। रक्षा बन्धन आने को था और उसने हमेशा की तरह राखी का रोली-लच्छा भैया को एक प्यार भरे खत के साथ पोस्ट कर दिया था।

        उसे इन्तजार था, किसी जवाबी खत का या मनीआॅर्डर का परन्तु पिछले दस वर्षों से ना तो भेया का कोई मनीआॅर्डर आया था ना ही कोई खत। टेलीफोन पर जब कभी वह बात करना चाहती तो कोई उसकी आवाज सुनकर फोन ही काट देता था।

        पोस्टमैन के आने से बंधी उम्मीद की असफलता थी या वर्षों की इकट्ठी हुई  भावनाऐं........ राखी की आंखे डबडबा आई। पति की आवाज ने उसे चैंकाया तो आंसू पोंछ कर वह रोहन को आॅफिस के लिये सी-आॅफ करने गई।

        रोहन के जाते ही उसने अलमारी मे से शादी की एलबम निकाली और पन्ने पलटने लगी। उसका सारा घ्यान जहां-जहां भईया थे उन्ही फोटोज पर था।

        कितना सौम्य चेहरा था भैया का! शालीन और हंसमुख भैया राखी से तीन साल ही बडे थे। अतीत के सभी पन्ने राखी के समक्ष साकार हो उठे। तीन पीढीयों तक परिवार मे कोई कन्या न होने से राखी बचपन से ही सबकी लाडली थी। भैया तो उस पर जान छिड़कते थे। भैया जितने शान्त और शालीन थे राखी उतनी ही नटखट।

        किताबें गायब कर देना, जूते छिपा देना, शेविंग क्रीम की जगह टूथपेस्ट मिला देना राखी का रोज का काम था।

        भैया उसकी सभी शरारतों को सहते, उसकी हर जिद माना करते। उम्र मे खास फर्क नही होने पर भी उसे बच्चों की तरह रखते।       

        माॅं बताती थी कि भैया ने ही सूनी कलाईयों को आबाद करने आने वाली अपनी बहिन का नाम रखा था। बहिन के आने से वे इतने प्रफुल्लित हुए कि उसका नाम ही उन्होने ‘राखी' रख दिया।

        भैया हर तकलीफ मे राखी का साथ देते। कभी उसे बुखार हो जाता तो उसके सिरहाने से नही हटते, उसके दर्द होता तो सारी दर्द निवारक दवाईयां बाजार से ले आते...।

        रक्षा बन्धन का दिन तो ‘राखी' का ही होता। सुबह से ही फरमाईशें शुरु हो जाती। यह लाओ, वो लाओ तो राखी बंधेगी। भैया दिन भर आगे पीछे राखी बंधवाने को घूमते।

        माॅं, बाबूजी गुस्सा करते कि सभी भाईयांे ने बहिन को सिर चढा रखा है पर उसके नाज-नखरे उठाने मे भैया ने कभी कोई कसर नहीं छोडी।

        काॅलेज तक आते-आते भैया उसके सबसे अच्छे दोस्त बन गये। उसे हमेशा अपने भैया पर फक्र होता। पढाई, खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियां सब पर दोनो भाई बहिनों का मानो काॅलेज में अधिपत्य था। ट्राॅफी राखी ले जाये या भैया, आती उन्ही के घर मंे थी। सहशिक्षा के उस काॅलेज में मजाल थी कि कोई लडका आंख उठा कर राखी को देख जाए पर फिर भी न जाने कब रोहन राखी को भा गया। 

भैया को भी वह यूं तो पसन्द था पर वह चाहते थे कि वह पहले अपने पेरों पर खडा हो जाये। राखी की जिद के चलते घर मे माॅं, बाबूजी को भैया ने ही शादी के लिये राजी किया फलस्वरुप रोहन की नौकरी लगने से पहले ही दोनो की शादी हो गई।

        जीवन अपनी गति पकडने लगा। राखी अपने वैवाहिक जीवन मे व्यस्त हो गई और भैया ने बाबूजी का कारोबार सम्भाल लिया। राखी का परिवार मे चार प्राणी हो गये नन्हा श्रेय और नन्ही पलक।

        यदा-कदा मायके आते वक्त राखी भैया की शादी की बात उठाती रहती। रोहन का काम भी अब धीरे-धीरे सेट होने लगा था कि एक दुःखद हादसा हो गया। बाबूजी नहीं रहे। भैया के सिर पर से तो मानो साया ही उठ गया। बाबूजी के बारहवें पर वकील ने वसियत पढ कर सुनाई। उत्तराधिकार अधिनियम के तहत दोनो भाई बहिन मे सम्पत्ति का बराबर बंटवारा बाबूजी ने किया था।

        राखी से जब पैतृक सम्पत्ति मे हक लेने की बात की गई, तो उसने हामी भर दी। इस देश मे अमूमन जहां लडकियां पिता से सम्पत्ति लेने को मना करती देती है वहां राखी के इस फैसले ने सभी को चैंकाया तो बहुत पर किसी ने कुछ कहा नहीं।

        माॅं भैया के साथ ही रही। उनके प्रेम मे कोई कमी न आई पर भैया अचानक बदल से गये।

रोहन के व्यापार को मदद की जरुरत थी। विधर्मी विवाह करने से रोहन के परिवार की तरफ से मदद की कोई आशा नहीं थी और बाबूजी का बिजनेस तो सेटल्ड था यही सोच कर राखी ने सम्पत्ति मे से हक ले लिया था पर भैया उसका उल्टा अर्थ लगायेंगे उसने कभी ऐसा सोचा न था।

        धीरे-धीरे भैया का आना-जाना, बतियाना सब कम हो गया। फिर एक दिन माॅं ने खबर दी की भैया ने कोर्ट मेरिज कर ली। राखी तो स्तब्ध रह गई। भैया से खूब लडी कि ऐसी क्या जल्दी थी शादी धूमधाम से करते। पर भैया की चुप्पी उसे बेगानेपन का अहसास करा देती।

        कई बार राखी ने भैया को उनके बदले व्यवहार के लिये टोका भी परन्तु उधर से हमेशा नपांतुला जवाब आता। राखी भी धीरे-धीरे भैया से कटने लगी। बाबूजी थे तब भैया चाहे कितनी भी दूर क्यों ना हो रक्षा बन्धन पर अवश्य आते पर अब वो सिलसिला खत्म हो चला था।

        राखी अक्सर अकेले मे बैठ कर रोती। दिल के जख्म दिखाती भी तो किसे? केसे बताती कि उसका उत्तराधिकार मे अपना हक लेना ही उसे अपने स्वंय के सगे भाई से दूर कर गया।

        उसने आखिर क्या गलत किया था? पति को आर्थिक सहारा देना चाहा था। क्या वह अपने पिता की संतान नहीं थी ? क्या उसे उनकी कमाई पर हक नहीं था। यदि बेटियों का पिता की सम्पत्ति मे हक लेना गलत है तो ऐसा कानून ही क्यों बनाया गया ? वकील साहिब ने उससे पूछा ही क्यों ?

        राखी यह सवाल पूछती भी तो किससे ? ना माॅं कुछ बताती थी ना भैया कुछ   बोलते। भाभी अच्छी थी पर भैया से सम्बन्धित विषयों पर चुप ही रहती। धीरे-धीरे भाई बहिन मे दूरी इतनी बढ गई कि आना-जाना, मिलना-जुलना तो दूर खतों जवाब देना तक दूभर हो गया।

        वो भैया जो राखी बंधवाने के लिये राखी के आगे-पीछे घूमते थे उसकी हर फरमाईश सर आंखो पर रखते आज राखी मिलने पर बहिन को फोन तक नहीं करते। राखी की आंखों से आंसू झरझर बहने लगे। एलबम के पृष्ठ गीले हो गये थे। आंखों की नमी से फोटो धुंधले लगने लगे पर क्या जिन्हे हम दिलो जान से चाहते है उनकी यादें कभी धुंधली पडती है ? राखी ने एलबम पोंछी और खाना बनाने लग गई। बच्चों के स्कूल से आने का समय हो गया था।

        दो दिन बाद रक्षा बंधन था। पर बच्चों को अभी से ही राखियां खरीदने की पडी थीउन्हे शाम को बाजार ले जाते वक्त राखी बहुत उदास थी।

       बाजार रंगबिरंगी लाईटों से सजा था। तरह-तरह की खूबसूरत राखियां बाजार मे थी। बच्चों ने मनपसंद राखी खरीदी तो अचानक ही बिटिया ने फरमाईश की कि मम्मी भी राखी खरीद ले।

        उसने बच्चों को समझाया कि मामा दूर रहते है और वह उन्हे राखी भेज चुकी है, पर बच्चे नहीं माने। बेमन से एक राखी वो भी ले आई। नारियल मिठाई उपहार ला के बच्चे बेहद खुश थे।

        रक्षा बंधन के दिन सभी ने नहा धोकर पूजा की, फिर थाली मे राखी सजा कर नन्ही पलक ने श्रेय को राखी बांधी। बच्चों को राखी बांधते देख उसका मन भर आया पर हंसते खेलते माहौल को देखकर उसने अपने आंसू पोंछ लिये। रोहन को पकौडे़ पसन्द थे सो राखी पकौडे तलने लगी।

        सहसा डोरबैल बजी। बच्चों के चिल्लाने की आवाज और कोलाहल सुन के राखी किचन से बाहर आई। दरवाजे पर माॅं और भैया-भाभी थे। एक पल तो राखी जड़वत् खडी रह गई। इतने वर्षो बाद भैया को देखा था। कितने कमजोर हो गये थे। भैया ने बांहे फैलाई तो राखी की रुलाई फूट पडी। वह दौड़ कर भैया के गले लग गई।

        दोनो भाई बहिन रो रहे थे। बरसों का सैलाब बह रहा था। भैया ने कलाई आगे की। राखी थाली उठा लाई। लच्छा, राखी, तिलक, नारियल और मिठाई थाली मे रखें थे। हमेशा की तरह राखी ने तिलक लगाया तो भैया फूट-फूट कर रोने लगे।

        ‘मुझे माफ कर दो बहिन' मैं बहुत स्वार्थी हो गया था। असल मे बाबूजी पर काफी कर्ज था, जब वह गुजरे तो आर्थिक परेशानियां थी। तेरा अपना हक लेने से मुझे लगा कि कलयुग मे शायद पैसा ही सबकुछ हो गया है। ‘अर्थ' के अलावा इस दुनियां मे और कोई रिश्ता होता ही नहीं।

        पर तेरी भाभी ने मुझे आर्थिक परेशानी मे देख जब अपने मायके मे यही कदम उठाया तब मुझे अहसास हुआ कि औरत अपने पति के साथ, शादी होने पर किस कदर जुड जाती है।

        तूने जो कुछ किया वह सही था। माॅं बाप पर दोनो का समान हक है फिर चाहे वो बेटा हो या बेटी। तूने तो राखी हमेशा भेजी पर मै ही प्यार का यह बन्धन निभा नहीं पाया। भैया रोते चले जा रहे थे। माॅ, भाभी, रोहन, बच्चे सब हतप्रभ खडे थे। राखी ने थाली मे से राखी उठाई और थोडा गुस्से मे कहा ‘मेरी फरमाईश पूरी करोगे तो राखी बाधूंगी वरना नहीं'।

        भैया रोते-रोते मुस्कुरा उठे। ‘हां मानूंगा'

        ‘प्यार के पवित्र बन्धन' ने दिलों को आखिर मिला ही दिया था।

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