बच्चों को बचाएं डिप्थीरिया से 

Dr. Vinod Gupta

5th August 2020

डिप्थीरिया बच्चों में होनेवाली घातक बीमारी है , लेकिन अगर समय रहते इसके लक्षणों की पहचान कर ली जाये तो इससे निजात संभव है।  वहीँ अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तो इसके संक्रमण से भी बचा जा सकता है।  

बच्चों को बचाएं डिप्थीरिया से 

सात साल की एक बच्ची को कुछ दिन पहले गले में बेहद तेज दर्द की तकलीफ के कारण हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था। जांच में बच्ची को जानलेवा बीमारी डिप्थीरिया का खुलासा हुआ। हॉस्पिटल में उसका इलाज शुरू भी किया गया, लेकिन संक्रमण बहुत ज्यादा फैलने से बच्ची की जान नहीं बच सकी। डिप्थीरिया जिसे गलघोंटू अथवा रोहिणी के नाम से भी जाना जाता है, एक संक्रमण और जानलेवा रोग है। जब इस रोग का प्रभाव श्वास की वजह से हृदय और दिमाग पर पड़ने लगे तो जान भी जा सकती है।

कैसे फैलता है?

इसके कीटाणु को कोरायनी डिप्थीरी कहते हैं। संक्रमित व्यक्ति द्वारा खांसने या छींकने पर वातावरण में ये फैल जाते हैं तथा उस वातावरण के संपर्क में आने वाले बच्चे इसकी चपेट में आ जाते हैं। चूंकि बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, इसलिए उनमें इसका संक्रमण तेजी से फैलता है। संक्रमण होने से एक से चार दिनों के भीतर इसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

बच्चे किसी भी वस्तु को उठाकर मुंह में ले जाते हैं। पेन, पेंसिल, खिलौने आदि मुंह में लेने से संक्रमण तेजी से फैलता है। जो बच्चे अंगुली या अंगूठा चूसने के आदी होते हैं, उनमें भी यह संक्रमण फैलते देर नहीं लगती। मीजल्स, कुकुरखांसी तथा इन्फ्लूएंजा आदि से ग्रसित होने पर बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में डिप्थीरिया के कीटाणु उन पर आसानी से हमला बोल देते हैं।

डिप्थीरिया एक उग्र संक्रामक रोग है। आमतौर पर यह 2 से 10 वर्ष तक के बच्चों को अपनी चपेट में लेता है। यह बीमारी ज्यादातर गले और टांसिल्स को प्रभावित करती है। गले में धीरे-धीरे सूजन के साथ नलियां जाम होने लगती हैं। संक्रमण दिल तक पहुंचने पर स्थिति गंभीर हो जाती है। डिप्थीरिया की पहचान करना मुश्किल नहीं है।

लक्षण

डिप्थीरिया गले से संबंधित रोग है, इसलिए गले में दर्द होना इसका शुरुआती लक्षण है। इसके बाद खांसी चलने लगती है तथा सांस लेने में कठिनाई होती है। संक्रमण से रोगी को हल्का बुखार भी आ सकता है।

-इसके कुछ लक्षण होते हैं, जैसे- सर्दी, जुकाम, गले में दर्द, सूजन के साथ तेज बुखार। खांसी आने के साथ गला फटने लगता है। त्वचा का रंग पीला पड़ने लगता है। ग्रे रंग की मोटी झिल्ली गले और टांसिल्स को ढंक देती है।

-बीमारी के शुरुआती दौर में बच्चे को बचाया जा सकता है, लेकिन हार्ट तक संक्रमण पहुंच जाने पर बचाना मुश्किल हो जाता है।

-जब डॉक्टर रोगी का परीक्षण करते हैं तो गले के पिछले हिस्से में एक झिल्ली दिखाई देती है, जिसके खुरचने पर खून निकलने लगता है। यह झिल्ली सफेद मटमैले रंग की होती है। जब यह झिल्ली सांस नली तक फैल जाती है तो सांस लेने में कठिनाई होने लगती है।

-गले में सूजन भी आ जाती है तथा किसी वस्तु को निगलने में परेशानी भी हो सकती है। श्वास लेने में रुकावट से आवाज में भी परिवर्तन देखा जा सकता है। शरीर में पानी की कमी महसूस होने लगती है। कमजोरी का अहसास होता है। शरीर नीला पड़ सकता है। रोग का असर गर्दन पर भी पड़ता है तथा वह कड़ी पड़ जाती है। इसके अलावा बोलने में भी तकलीफ होने लगती है। बहुतों को सिरदर्द और खून की कमी की शिकायत भी हो जाती है। त्वचा पर घाव भी हो सकते हैं।

-बच्चों की रोग-प्रतिरोधक शक्ति बड़ों की तुलना में बहुत कम होती है। यही कारण है कि बीमारियों की चपेट में अधिक आते हैं। सही टीकाकरण से हम उन्हें कई घातक बीमारियों से बचा सकते हैं। इन्हीं में से एक है डिप्थीरिया।

-  ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता कम होने से न तो वे टीकाकरण का महत्व समझते हैं और न ही बच्चों के बीमार होने पर उसे तत्काल डॉक्टर को दिखाते हैं। परिणामस्वरूप डिप्थीरिया का संक्रमण तेजी से फैलता जाता है, जो कि जानलेवा हो सकता है।

उपचार

डिप्थीरिया का उपचार चिकित्सा की हर पैथी में है। आयुर्वेद में इसके लिए विशिष्ट कर्म, काढ़ा तथा लेप आदि इस्तेमाल किए जाते हैं। वहीं होम्योपैथी में इसके लिए मर्क आई एफ, मर्क आई आर, आर्सेनिक फानी बिक, डिप्थीरिनस आदि औषधियों का इस्तेमाल किया जाता है। योग चिकित्सा से भी इसका उपचार संभव है, जिसमें कपाल रंद्रक्रिया, उज्जायी प्राणायाम, वक्रासन अर्धमत्स्येंद्रासन आदि है। किसी भी चिकित्सा पद्धति को अपनाने के लिए उसके विशेषज्ञ से सलाह करना उसकी देखरेख में दवाएं या योग करना चाहिए।

-ऐलोपैथी में इसका उपचार एंटी टार्पेसीन के द्वारा किया जाता है। आमतौर पर इसके लिए एरिथ्रोमाइसिन तथा बेंजाइल पेनिसिलीन ड्रग्स दिए जाते हैं। जरूरत होने पर श्वास नली में छेद करके एंड्रो ट्रेक्यिल ट्यूब भी डाली जाती है ताकि सांस लेने में कठिनाई न हो।

-डिप्थीरिया के उपचार में प्रयुक्त इंजेक्शन काफी महंगे आते हैं और हर जगह उपलब्ध भी नहीं होते। यहां तक कि कई सरकारी अस्पतालों में भी एंटी डिप्थीरिया इंजेक्शन समय पर उपलब्ध नहीं रहते। एलोपैथी की दवाएं डॉक्टर की सलाह पर ही लें।

बचाव

 

डिप्थीरिया से बचाव का सबसे अच्छा उपाय टीकाकरण है। शिशु को जन्म के दो सप्ताह बाद 10 सप्ताह की आयु तक डीपीटी के टीके लगवाना चाहिए जो उसे इस बीमारी के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं। सरकारी अस्पतालों और क्लीनिकों में ये टीके मुफ्त में लगाए जाते हैं। सही टीकाकरण से इस गंभीर बीमारी से बच्चे को बचाया जा सकता है। नियमित टीकाकरण में डीपीटी (डिप्थीरिया, परटूटस काली खांसी, टीटनेस) का टीका लगाया जाता है। एक साल के बच्चे को डीपीटी के तीन टीके लगते हैं। इसके बाद डेढ़ साल की उम्र में चौथा और पांच साल की उम्र में पांचवा टीका लगता है। ये टीके लगने के बाद डिप्थीरिया की आशंका कम हो जाती है।

-चूंकि यह एक संक्रामक बीमारी है, इसलिए संक्रमित बच्चे से स्वस्थ बच्चे को बचाना बहुत जरूरी है अन्यथा वह भी इसी चपेट में आ जाएगा। संक्रमित बच्चे की निजी उपयोग की वस्तुएं जैसे- तौलिया, रूमाल, कपड़े आदि स्वस्थ बच्चे को इस्तेमाल करने न दें। स्वस्थ बच्चे को संक्रमित बच्चे के साथ एक थाली में भोजन न कराएं, न संक्रमित बच्चे का जूठा खिलाएं।

-पेन, पेंसिल आदि मुंह में लेने से रोकें। इसी प्रकार मुंह में अंगुली डालने की आदत भी छुड़ाएं।

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