देश के 100 साल पुराने मंदिरों से हो लीजिए रूबरू

चयनिका nigam

9th August 2020

देश में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनकी दुनियाभर में मान्यता है। इन्हीं में वो मंदिर भी हैं, जिनकी उम्र गिनना भी मुश्किल है। ये 100 से भी ज्यादा साल पुराने हैं।

देश के 100 साल पुराने मंदिरों से हो लीजिए रूबरू
मंदिरों की महिमा किससे छुपी है। इन मंदिरों ने कितनों के दुखों हरा है तो कितनों को खुशियों की सौगात दी है। मंदिरों की महिमा अनोखी और अद्भुत है। फिर जब इन मंदिरों की उम्र 100 साल से भी पुरानी हो तो कहने ही क्या। समय को बदलते इंसानों से ज्यादा इन मंदिरों ने ही देखा। इन मंदिरों की मान्यताएं देश ही नहीं विदेशों तक होती है। कह सकते हैं ऐसे मंदिर भक्तों के दिलों में बसते हैं। इन तक पहुंचना कई दफा कठिन होता है लेकिन पहुंच कर इनकी भव्यता दिल को जीत लेती है। इन मंदिरों से जुड़ी रोचक कहानियां भी हैं, जो भक्तों की श्रद्धा और बढ़ा देती हैं। इतिहास की गवाही देते इन मंदिरों में प्रवेश करना भर भी मन को सुकून देता है। जैसे तमिलनाडू के मदुरै में बना मिनाक्षी मंदिर का गर्भगृह 3500 साल पुराना है तो इसका बाहरी निर्माण 1500 से 2000 साल पुराना माना जाता है। भगवान विष्णु को देवी मिनाक्षी का भाई माना जाता है। 45 एकड़ में वैगई नदी के किनारे बने मिनाक्षी मंदिर भगवान विष्णु की कई कलाकृतियां भी बनी हुई हैं। देश के हर कोने में मिनाक्षी मंदिर जैसे कई पौराणिक और खुद में इतिहास समेटे कई मंदिर हैं। फिलहाल इनके दर्शन तो कर नहीं सकते तो चलिए इनसे जुड़ी अनोखी बातें जान लेते हैं-
मुंदेश्वरी देवी मंदिर, बिहार-
क्या आप जानती हैं? दुनिया का सबसे पुराना मंदिर भारत में है। ये सच है। पूरी दुनिया में सबसे पुराना मंदिर मुंदेश्वरी देवी मंदिर, बिहार को ही माना जाता है। भारत के पुरातत्व विभाग के अनुसार इस मंदिर को 108 एडी में बनाया गया था। अष्टभुज आकार का ये मंदिर अपनी आकृति की वजह से भी अनोखा माना जाता है। इसको नागरा आर्किटेक्चुरल स्टाइल से प्ररित भी माना गया है। शिव जी के इस मंदिर में भक्तों का रेला सा लगता है। मुंडेश्वरी की पहाड़ियों पर 608 फुट की ऊंचाई पर बने इस मंदिर की भक्तों के बीच अहमियत बहुत है। कैमूर जिले में स्थित इस मंदिर रामनवमी और शिवरात्रि पर भक्तों की भीड़ सी लग जाती है। इन दोनों दिनों में दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं।  
रथ मंदिर, महाबलीपुरम, तमिलनाडू-
बंगाल की खाड़ी के तट पर बने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि पल्लव राजाओं ने पांडवों की याद में इसे बनवाया था। चेन्नई से 55 किलोमीटर दूर बने महाबलीपुरम के इस मंदिर में कुल पांच रथ हैं, जिनमें से चार को एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है। पांडवों के नाम पर इन रथ को पांडव रथ कहा गया। यहां एक मंदिर और है, जिसे देखे बिना नहीं रहा जा सकता है। इस मंदिर को शोर कहते हैं। 1400 साल पुराने समुद्र के किनारे बसे इस मंदिर में शिव, विष्णु आदि भगवानों की मूर्तियां हैं। यहां कुल तीन मंदिर हैं, जिनमें से एक भगवान विष्णु और दो भगवान शिव के हैं। इन मंदिरों का कुछ हिस्सा समुद्र के अंदर भी जा चुका है। यहां एक बड़े गोल आकार की कलाकृति है, जो ढलान पर होने बावजूद साधी हुई है। माना जाता है ये भगवान कृष्ण का पसंदीदा मक्खन है और इसीलिए इसे कृष्णा बटर बॉल कहा जाता है। कुछ समय पहले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां आ चुके हैं। 
तुंगनाथ मंदिर, 
3680 मीटर या 12073 फुट ऊंचाई पर बना ये मंदिर भगवान शिव का दुनिया में सबसे ऊंचाई पर बना मंदिर है। ये मंदिर इतना पुराना है कि इसके बनने का समय किसी को पता ही नहीं है। जानकारों की मानें तो ये मंदिर पांडवों ने भगवान शिव के लिए बनवाया था। मंदिर का आकार बहुत छोटा है और ये इतना छोटा है कि बमुश्किल 10 लोग इसमें ठहर सकते हैं। ये काले पत्थर से बना है और बिलकुल केदारनाथ जैसा बनाया गया है। पर हां, यहां पहुंचना आसान नहीं है। इसलिए ये भी कह सकते हैं कि दिल में असल श्रद्धा रखने वाले भक्तों को ही यहां आने का मौका मिलता है। 
जगतपिता ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर, राजस्थान
जगतपिता ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर झील पर बना दुनिया का अकेला ब्रह्मा मंदिर है। इस मंदिर की संरचना बेहद खास है और 14 वीं शताब्दी की है। इसके बाद इसे और भी बनाया गया है। मंदिर में मार्बल और स्टोन लगे हैं। इतना ही नहीं मंदिर में शिकरा और हमसा चिड़ियों के मोटिफ बने हैं। मंदिर में ब्रम्हा जी की चारमुखी छवि भी देखी जा सकती है। जयपुर एयरपोर्ट से करीब 140 किलोमीटर दूर बने इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि ब्रह्मा जब धरती पर आए तो उन्होंने क्योंकि फूल की पत्तियां नीचे गिरने की वजह से कर यानि उनके हाथों और फूल मतलब पुष्प को मिलकर इस जगह को नाम दिया पुष्कर। इसके बाद उन्होंने इस जगह पर यज्ञ करने की सोची। उन्होंने पुष्कर झील में यज्ञ किया था। बाद में यही पर उनका मंदिर भी बना। यहां से कुछ ही दूरी पर बनी रत्नागिरि की पहाड़ियों पर ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री का मंदिर भी बना है। 
कोणार्क सूर्य मंदिर, पूरी, ओडिसा-
युनेस्को ने इस मंदिर को विश्व धरोहर माना है। तेरहवीं शताब्दी में बना ये मंदिर इस्टर्न गंगा डायनेस्टी के राजाओं की देन है। इन राजाओं में भी नरसिंहादेव को इस मंदिर का श्रेय दिया जाता है। मंदिर बिलकुल रथ के आकार का बना है। इसमें 12 जोड़ी पहिए हैं तो सात घोड़े भी। कलिंगा के आर्किटेक से प्रेरित इस मंदिर के नाम से जुड़ी भी की एक और खासियत है। इसके नाम में दो शब्द छुपे हैं। कोणार्क में कोण को कोना और अर्क का मतलब सूर्य माना गया है। कोने से तात्पर्य देश के दक्षिणपूर्वी इलाके में इसके बने होने से लगाया जाता है। 
ये भी पढ़ें-
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स्टोरी-
मंदिरों की महिमा किससे छुपी है। इन मंदिरों ने कितनों के दुखों हरा है तो कितनों को खुशियों की सौगात दी है। मंदिरों की महिमा अनोखी और अद्भुत है। फिर जब इन मंदिरों की उम्र 100 साल से भी पुरानी हो तो कहने ही क्या। समय को बदलते इंसानों से ज्यादा इन मंदिरों ने ही देखा। इन मंदिरों की मान्यताएं देश ही नहीं विदेशों तक होती है। कह सकते हैं ऐसे मंदिर भक्तों के दिलों में बसते हैं। इन तक पहुंचना कई दफा कठिन होता है लेकिन पहुंच कर इनकी भव्यता दिल को जीत लेती है। इन मंदिरों से जुड़ी रोचक कहानियां भी हैं, जो भक्तों की श्रद्धा और बढ़ा देती हैं। इतिहास की गवाही देते इन मंदिरों में प्रवेश करना भर भी मन को सुकून देता है। फिलहाल इनके दर्शन तो कर नहीं सकते तो चलिए इनसे जुड़ी अनोखी बातें जान लेते हैं-
मुंदेश्वरी देवी मंदिर, बिहार-
क्या आप जानती हैं? दुनिया का सबसे पुराना मंदिर भारत में है। ये सच है। पूरी दुनिया में सबसे पुराना मंदिर मुंदेश्वरी देवी मंदिर, बिहार को ही माना जाता है। भारत के पुरातत्व विभाग के अनुसार इस मंदिर को 108 एडी में बनाया गया था। अष्टभुज आकार का ये मंदिर अपनी आकृति की वजह से भी अनोखा माना जाता है। इसको नागरा आर्किटेक्चुरल स्टाइल से प्ररित भी माना गया है। शिव जी के इस मंदिर में भक्तों का रेला सा लगता है। मुंडेश्वरी की पहाड़ियों पर 608 फुट की ऊंचाई पर बने इस मंदिर की भक्तों के बीच अहमियत बहुत है। कैमूर जिले में स्थित इस मंदिर रामनवमी और शिवरात्रि पर भक्तों की भीड़ सी लग जाती है। इन दोनों दिनों में दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं।  
रथ मंदिर, महाबलीपुरम, तमिलनाडू-
बंगाल की खाड़ी के तट पर बने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि पल्लव राजाओं ने पांडवों की याद में इसे बनवाया था। चेन्नई से 55 किलोमीटर दूर बने महाबलीपुरम के इस मंदिर में कुल पांच रथ हैं, जिनमें से चार को एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है। पांडवों के नाम पर इन रथ को पांडव रथ कहा गया। यहां एक मंदिर और है, जिसे देखे बिना नहीं रहा जा सकता है। इस मंदिर को शोर कहते हैं। 1400 साल पुराने समुद्र के किनारे बसे इस मंदिर में शिव, विष्णु आदि भगवानों की मूर्तियां हैं। यहां कुल तीन मंदिर हैं, जिनमें से एक भगवान विष्णु और दो भगवान शिव के हैं। इन मंदिरों का कुछ हिस्सा समुद्र के अंदर भी जा चुका है। यहां एक बड़े गोल आकार की कलाकृति है, जो ढलान पर होने बावजूद साधी हुई है। माना जाता है ये भगवान कृष्ण का पसंदीदा मक्खन है और इसीलिए इसे कृष्णा बटर बॉल कहा जाता है। कुछ समय पहले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां आ चुके हैं। 
तुंगनाथ मंदिर, 
3680 मीटर या 12073 फुट ऊंचाई पर बना ये मंदिर भगवान शिव का दुनिया में सबसे ऊंचाई पर बना मंदिर है। ये मंदिर इतना पुराना है कि इसके बनने का समय किसी को पता ही नहीं है। जानकारों की मानें तो ये मंदिर पांडवों ने भगवान शिव के लिए बनवाया था। मंदिर का आकार बहुत छोटा है और ये इतना छोटा है कि बमुश्किल 10 लोग इसमें ठहर सकते हैं। ये काले पत्थर से बना है और बिलकुल केदारनाथ जैसा बनाया गया है। पर हां, यहां पहुंचना आसान नहीं है। इसलिए ये भी कह सकते हैं कि दिल में असल श्रद्धा रखने वाले भक्तों को ही यहां आने का मौका मिलता है। 
जगतपिता ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर, राजस्थान
जगतपिता ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर झील पर बना दुनिया का अकेला ब्रह्मा मंदिर है। इस मंदिर की संरचना बेहद खास है और 14 वीं शताब्दी की है। इसके बाद इसे और भी बनाया गया है। मंदिर में मार्बल और स्टोन लगे हैं। इतना ही नहीं मंदिर में शिकरा और हमसा चिड़ियों के मोटिफ बने हैं। मंदिर में ब्रम्हा जी की चारमुखी छवि भी देखी जा सकती है। जयपुर एयरपोर्ट से करीब 140 किलोमीटर दूर बने इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि ब्रह्मा जब धरती पर आए तो उन्होंने क्योंकि फूल की पत्तियां नीचे गिरने की वजह से कर यानि उनके हाथों और फूल मतलब पुष्प को मिलकर इस जगह को नाम दिया पुष्कर। इसके बाद उन्होंने इस जगह पर यज्ञ करने की सोची। उन्होंने पुष्कर झील में यज्ञ किया था। बाद में यही पर उनका मंदिर भी बना। यहां से कुछ ही दूरी पर बनी रत्नागिरि की पहाड़ियों पर ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री का मंदिर भी बना है। 
कोणार्क सूर्य मंदिर, पूरी, ओडिसा-
युनेस्को ने इस मंदिर को विश्व धरोहर माना है। तेरहवीं शताब्दी में बना ये मंदिर इस्टर्न गंगा डायनेस्टी के राजाओं की देन है। इन राजाओं में भी नरसिंहादेव को इस मंदिर का श्रेय दिया जाता है। मंदिर बिलकुल रथ के आकार का बना है। इसमें 12 जोड़ी पहिए हैं तो सात घोड़े भी। कलिंगा के आर्किटेक से प्रेरित इस मंदिर के नाम से जुड़ी भी की एक और खासियत है। इसके नाम में दो शब्द छुपे हैं। कोणार्क में कोण को कोना और अर्क का मतलब सूर्य माना गया है। कोने से तात्पर्य देश के दक्षिणपूर्वी इलाके में इसके बने होने से लगाया जाता है। 

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