आप हैं कंजूस या मितव्ययी?

चयनिका निगम

31st August 2020

कंजूस लोगों को लगता है कि बचत करके वो कमाल कर रहे हैं लेकिन वो पैसे बचाने के लिए कई और चीजों से समझौता कर रहे होते हैं, इसलिए हमेशा मितव्ययी बनने की कोशिश की जानी चाहिए।

आप हैं कंजूस या मितव्ययी?
‘पति इतनी मेहनत से कमाते हैं, मैं तो खर्चा करने से पहले कई बार सोचती हूं।' रेनू सही कह रही हैं कि पैसों को हमेशा सोच-समझकर ही खर्च किया जाना चाहिए। एक-एक पैसा बहुत मेहनत से जो कमाया जाता है। लेकिन थोड़ा सोचिए कि मितव्ययी और कंजूस होने में अंतर होता है। क्योंकि रेनू सोच समझकर पैसे तो खर्च करती हैं लेकिन कई बार उन मदों में ही पैसे नहीं लगाती हैं, जिन पर लगाने का कुछ न कुछ फायदा तो होता ही है। भले ही किसी की के चेहरे पर मुस्कान ही आ जाए। इसलिए जरूरी है कि खुद को कंजूस नहीं बल्कि मितक्ययी बनाएं। खर्चा सोच-समझ कर करें लेकिन जब जरूरत के समय पर्स से पैसे निकालने में हिचकें भी न। ये हो सकता है कि आपकी तथा ही ना हो खर्चा करने की लेकिन अगर आप समृद्ध हैं तो फिर क्या दिक्कत है। अब इस जगह ये जरूरी है कि आप खुद को पहचान लें। पहचान लें कि आप कंजूस हैं या मितव्ययी। खासियत पहचानने का सही तरीका हम बता देते हैं, आप बस इसमें से अपनी खासियतें जांच लें-
जीवन के मजे-  
सरिता आजतक अपना पुराना सोफा बदल नहीं पाई हैं, कहती हैं कि इससे काम तो चल रहा है न। जबकि उनके पति अक्सर ही उन्हें कंजूस कह कर बुला देते हैं। वो कहते हैं, अगर मैं कमा रहा हूं तो सिर्फ जोड़ता नहीं रहूंगा बल्कि घर की सुविधाओं का भी ध्यान रखूंगा। सविता के पति बिलकुल सही कहते हैं। देखिए मितव्ययी इंसान जिंदगी के लिए जरूरी सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए बचत कर लेता है। मगर कंजूस इंसान सुविधाओं पर भी खर्चा नहीं करेगा। जैसे कोई इंसान जाड़ा आते ही गीजर लगवा लेगा लेकिन पैसे होने के बावजूद कंजूस इंसान गैस पर पानी गरम करके काम चला लेगा। कुल मिलाकर कंजूस इंसान जिंदगी के मजे लेने की कोशिश भी नहीं करता है। उदाहरण एक और है। आप पैसे बचाने में रुचि रखते हैं तो कॉफी शॉप वाली महंगी कॉफी घर पर ही बनाने की कोशिश करेंगे जबकि कंजूस इंसान कॉफी पीना ही बंद कर देगा। कई कंजूस तो ऐसे भी होते हैं, जो बच्चों की पढ़ाई तक पर खर्च करने से बचते हैं। 
इंसानों को अहमियत-
आप अभी-अभी होटल से खाना खाकर निकलें हैं, हाथ में खाने से जुड़े कूपन हैं, जिन्हें आप अगली बार इस्तेमाल कर सकती हैं तो कंजूस होने पर पैसों के बदले आप यही कूपन भिखारी को दे देंगी ताकि पर्स से पैसे न निकालने पड़ें। जबकि इन कूपन को भिखारी किसी काम में नहीं ला पाएगा। यहीं पर मितव्ययी व्यक्ति इन कूपन को अगली बार खाने में डिस्काउंट के लिए रख लेगा और भिखारी को कुछ पैसे देकर काम चलाएगा। ऐसा ही कुछ प्रीति ने भी किया था, वो ननद की बीमारी में दवाओं का पूरा डोज लाने की बजाए सिर्फ 2 दिन की दवाएं ही लाती थीं। बोलती थीं, शायद ये इतने में ही ठीक हो जाए। फिर बाकी दवाएं बेकार हो जाएंगी न। 
हर चीज बहुत महंगी-
कंजूस व्यक्ति को समय के हिसाब से कीमतों का बढ़ना भी महंगाई ही लगता है। उनको हर चीज बस महंगी लगती है। अगर बर्गर की कीमत में कुछ पैसे टैक्स के जुड़ जाएंगे तो भी शायद कंजूस इंसान बर्गर न खाए। जबकि बचत की सोचने वाला व्यक्तिअपनी जेब पर भारी न पड़ने वाला बर्गर खा लेगा। मतलब वो महंगे नहीं बल्कि जिस बर्गर के पैसे देखर बजट बिगड़ेगा नहीं, उसे खाकर अपनी भूख खत्म करेगा। वो न खाने का विकल्प बिलकुल नहीं चुनेगा। वहीं कंजूस तो टॉफी भी न खाए। जैसे मिसेज गुप्ता ने किया था। टमाटर महंगे हुए तो बहुत जरूरी होने पर भी वो इंका इस्तेमाल नहीं करती थीं। जबकि वो पैसों के मामले में समृद्ध परिवार से हैं और जरूरत के लिए टमाटर या ऐसी कोई महंगी चीज कम ही सही पर ले सकती थीं। मिसेज गुप्ता को महंगाई के मामले में कंजूस कहना सही होगा। 
सिर्फ पैसा-
अमिता के पति मोहित रोज सुबह घर से एक घंटा पहले निकलते हैं ताकि बेटी को स्कूल छोड़ने जाने वाले मि. सेन से लिफ्ट ले सकें। वो चाहें तो एक घंटा बचाकर अपने वाहन से भी ऑफिस जा सकते हैं। लेकिन उनके दिमाग में सिर्फ पैसे बचाने का ख्याल ही चलता रहता है। कंजूस इंसान पैसे को इतना बचाने की कोशिश करता है कि वो अपने समय को भी वैल्यू नहीं करता है। मतलब अगर उसे 5 घंटे का सफर इससे ज्यादा समय में भी तय करना पड़े और पैसे कम देने हों, तो वो ज्यादा समय और कम पैसे वाला विकल्प ही चुनेगा। बस पैसे बचें फिर चाहे खराब क्वालिटी लेनी पड़े या चीज ज्यादा दिन न चले। यहीं पर बचत करने वाला इंसान भले ही पैसे थोड़े ज्यादा खर्च करेगा लेकिन अपना समय बचाएगा और गुणवत्ता से भी कोई समझौता नहीं करेगा। ताकि समय बचाकर और मेहनत से काम कर सके और क्वालिटी के साथ अपनी छवि बेहतर कर सके। इन दोनों ही चीजों से उसका कमाई का जरिया और मजबूत ही होगा।
खर्चों में क्रिएटिविटी-
बचत करने के शौकीन लोग हमेशा ही खर्चों के बारे में बहुत क्रिएटिव होते हैं। मतलब वो पैसे खर्च करते हैं लेकिन सही जगह पर, सोच-समझकर। आपको याद है, पहले जब दादा-दादी घर आया करते थे, तो साथ में बच्चों के खाने के लिए घर पर बनी चीजें डिब्बे में लाया करते थे। पर अब ये सब कम ही लोग करते हैं। घर का सामान लाने में पहले तो खाना फ्रेश होता था, दूसरे इसमें पहले भी कम खर्च होते थे। बस यही तरीका है खर्चों में क्रिएटिविटी लाने का। ऐसे लोग जिस भी चीज में खर्च कर रहे होते हैं उनकी क्वालिटी से समझौता नहीं करते और पैसों की कीमत पूरी तरह से वसूल होती है। 

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