सौंदर्य का पैमाना केवल गोरा होना नहीं

Sushil Sarit

31st August 2020

एक बात जो धीरे-धीरे आम मध्यम वर्गीय भारतीय की समझ का हिस्सा बनती जा रही है, वह यह है कि सौंदर्य का पैमाना केवल गोरा होना नहीं है बल्कि अच्छी फिगर, स्मार्ट व्यक्तित्व और चेहरे का ग्लो सौंदर्य की वास्तविक परिभाषा है।

सौंदर्य का पैमाना केवल गोरा होना नहीं

खन्ना साहब ने स्कूटर की किक पर पांव रखा ही था कि अंदर से मिसेज खन्ना लगभग भागती हुई आईं, ‘सुनिए जी, लौटते हुए फेयर एंड लवली लेते आइएगा। अगले हफ्ते बेटी को देखने वाले आ रहे हैं। एक हफ्ते इस क्रीम की मालिश कर दूंगी तो मामला ओके हो जाएगा।'

‘अच्छी खासी तो है अपनी बेटी, यह क्रीम इसमें क्या कर लेगी?' खन्ना साहब के स्वर में थोड़ी झल्लाहट शामिल थी। बात भी सही थी। उर्वशी ने 85 परसेंट के साथ ग्रेजुएशन किया था। रंग बेशक औसत था, लेकिन नाक-नक्श तो काफी तीखे थे, फिर वह अच्छा खासा खर्च करने को भी राजी थे और वह लड़का उन्होंने देखा था। ठीक है बैंक में जॉब था लेकिन उर्वशी के हिसाब से तो उन्नीस क्या पन्दरह भी नहीं था, लेकिन मिसेज को कौन समझाए। बेकार में चलते-चलते झांय-झांय न हो जाए, इसलिए खन्ना साहब ने ‘अच्छा ठीक है, लेता आऊंगा' कहकर स्कूटर स्टार्ट कर दिया।

वैसे देखा जाय तो मिसेज खन्ना की बात में भी दम तो था। यह ठोस सच्चाई है, कि लड़का चाहे जैसा हो, दुबला-मोटा हो, लंबा-नाटा हो या आड़ा-तिरछा हो, लेकिन बीवी उसे गोरी ही चाहिए और यह गोरेपन के प्रति आकर्षण की घुट्टी भी उसे उसकी मां ही पिलाती है। 

सच पूछा जाए तो गोरे रंग को सौंदर्य का आखरी मापदंड मानने की सोच अंग्रेजी शासनकाल में विकसित हुई थी। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो, वे यूरोपियन देश जो ठंडी जलवायु वाले देश थे, वहां सूरज थोड़ा शर्माते-शर्माते ही महीने में दो-चार दिन ही नजर आता था और कभी-कभी तो दो-चार महीने भी उसके दर्शन नहीं होते थे, इस जलवायु एवं भौगोलिक स्थिति के कारण वहां के निवासियों की सूरत तक धूप ही नहीं पहुंच पाती थी इस कारण उनका रंग गोरा था। विडंबना यह है  केवल अपनी भौगोलिक स्थिति और जलवायु से प्राप्त इस रंग को उन्होंने अपनी श्रेष्ठता का पैमाना मान लिया। सन 1948 में तो बाकायदा रंग-भेद कानून ही पास करा दिया गया था। अब जहां-जहां ये गोरे लोग थे, वहां-वहां काले भी तो थे। जाहिर है कि सामाजिक दूरी भी कम होनी थी। अत: वहां एक नया वर्ग भी पैदा हो गया अश्वेत। जाहिर है कि भेदभाव की भावना मन में घर कर लेने के बाद गोरे लोगों का व्यवहार काले और अश्वेत लोगों के प्रति भेदभाव वाला हो गया। उन्होंने उनका शोषण भी किया और उनके साथ अपमानजनक व्यवहार भी किया।

तो यह वहां की समस्या थी, लेकिन हमारे देश में तो यह पैमाना इतना कठोर कभी नहीं रहा कि गोरे-काले के भेद को एक बड़ी समस्या के रूप में उभरने का मौका मिले।

अब अगर अपने पुराने समय की याद करें तो इतने बड़े महाभारत के युद्ध के केंद्र में रही इस युद्ध की नायिका द्रोपदी का रंग भी श्याम था और प्रेम की सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा लैला-मजनू की नायिका लैला भी काली थी। यह किस्सा तो मशहूर है ही। इधर अगर ग्लैमरस संसार की बात करें यानी अपने बॉलीवुड की, जहां की हीरोइनें हमारे किशोर और युवा क्या चाचा ताऊ तक की निगाहों और सपनों में बसी रहती हैं, उनमें एकाध को छोड़कर साउथ से आने वाली सभी नायिकाएं, जिन्होंने वर्षों लोगों के दिलों पर राज किया श्याम वर्ण की ही हैं।

वैजयंती माला से लेकर रेखा, हेमा मालिनी, श्रीदेवी, शिल्पा शेट्टी, दीपिका पादुकोण, काजोल और बिपाशा बसु तक सभी का रंग मूल रूप से श्याम ही है। यह अलग बात है कि सभी ने स्किन लाइटनिंग ट्रीटमेंट की सहायता से खुद को गोरे रंग वाली नायिकाओं में शुमार कर लिया है। मजे की बात यह है कि इन नायिकाओं में से कई ने गोरेपन का दावा करने वाली क्रीमों के विज्ञापन में बाकायदा गारंटी ली है कि वह क्रीम गोरा बना देती है या उनके गोरेपन का राज उस क्रीम में छुपा हुआ है या एक विशेष साबुन में छुपा हुआ है।

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि यह स्किन लाइटनिंग ट्रीटमेंट, जो पहले केवल विदेशों में ही होता था, अब अपने भारत में भी होने लगा है।  इसके लिए हाइड्रोक्वीनाइन नामक रसायन का प्रयोग किया जाता है, जिसके कारण त्वचा को काला बनाने वाला मेलोनिन नामक तत्व कम हो जाता है, जिससे धीरे-धीरे त्वचा का रंग गोरा हो जाता है।

इस संदर्भ में एक रोचक बात यह भी है कि अपने पुत्रों के लिए गोरी बहुएं ढूंढने वाली महिलाओं में, पुरुषों के गोरेपन के लिए बहुत ज्यादा क्रेज नहीं है। जब जीवनसाथी चुनने के लिए लड़कियां अपना पैमाना तय करती हैं, तो उसमें त्वचा का गोरापन पांचवें-छठवें नंबर पर आता है। पहले नंबर पर तो उसकी नौकरी या आर्थिक सुदृढ़ता का ही स्थान है। चाहे लड़कियां हों या उनकी मम्मी इस विषय में वे सभी एकमत होती हैं। पुरुषों का क्या उनका तो बस किसी तरह बहन-बेटी के हाथ पीले करने की जिम्मेदारी से निबटने की तरफ ज्यादातर ध्यान रहता है और उनकी नजर तो पहले से ही लड़का कहां और कितना सेटल है और उसका खानदान अर्थात फैमिली बैकग्राउंड कैसा है इन दो मुद्दों पर ही केंद्रित रहती है।

अच्छा एक रोचक बात यह भी है कि अपने देश में तो गोरे-काले का चक्कर, आजादी के बाद जवान हुई पीढ़ी के साथ ही ज्यादा शुरू हुआ है, वरना चालीस के दशक तक तो लड़की देखने और विवाह करवाने की जिम्मेदारी पंडित जी और नाउ-ठाकुर के कंधों पर ही थी। अब जैसा उन्होंने बता दिया वह ठीक। लड़की शादी होकर ससुराल आने के बाद, दो-चार साल तो इतने पर्दे में या घूंघट में रहती थी, कि पतिदेव रात को लालटेन की धुंधली रोशनी में ही उसकी झलक देख पाते थे। स्थिति तो यहां तक थी कि अगर संयोग से दिन के उजाले में पत्नी दस -पांच स्त्रियों के साथ मुंह खोले कहीं घूम रही हो तो उसे पतिदेव द्वारा पहचानना भी मुश्किल हो जाता था।

आजादी के बाद जवान हुई पीढ़ी ने थोड़ा-थोड़ा खुलापन महसूस किया और तब तक उधर फिल्मी पर्दे पर हीरोइनों ने भी ग्लैमर बिखेरना प्रारंभ कर दिया था। जाहिर है कि जहां आजादी से पहले जवान हुई पीढ़ी, जो केवल रोमांटिक कहानियां पढ़ने और सुनने के माध्यम से खूबसूरती के सपने सजाती थी उसके मुकाबले आजादी के बाद जवान हुई पीढ़ी अब बड़े पर्दे पर बाकायदा उसकी चकाचौंध को महसूस कर अपने मन की नायिका चुनते समय, अधिक मुखर हो गई और तभी से अंग्रेजों की गोरी त्वचा भी खूबसूरती का एक विशेष पैमाना बन गई। इसके पीछे भी एक मनोवैज्ञानिक कारण यह था कि वह पीढ़ी, जो आजादी के बाद जवान हुई उसका जन्म तो आजादी से पहले हुआ था और तब आम जनमानस की नजर में अंग्रेज आदर्श से। उनका गोरा रंग ईर्ष्या का विषय था। इस कारण भारतीय समाज में गोरेपन को आदर्श रंग का दर्जा दिया जाने लगा था।

सच्चाई यह है कि वह रंगभेद जिसकी खबरें हम अखबार में पढ़ते रहते हैं, 18वीं शताब्दी के मध्य में दक्ष उपनिवेशवादियों द्वारा कैपटाउन को अपने रिफ्रेशमेंट स्टेशन के रूप में स्थापित करने के बाद, यूरोपीयंस द्वारा खुद को श्रेष्ठ साबित करने की भावना से प्रारंभ हुआ था। विदेशों में खासकर अमेरिका, इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका के संदर्भ में इसकी चर्चा इधर खूब हुई है। अगर इस रंगभेद की नीति के स्थापित होने के इतिहास की बात करें, तो सही अर्थों में पहली बार सन 1948 में यह विश्व की नजरों में तब महत्वपूर्ण बनी, जब दक्षिणी अफ्रीका में नेशनल पार्टी की सरकार द्वारा विधान बनाकर, काले और गोरे लोगों को अलग-अलग निवास करने की प्रणाली लागू की गई। इसे ही रंगभेद नीति या ‘आपार्थिक' की संज्ञा दी गई। इस नीति के विरोध में नेल्सन मंडेला ने बहुत संघर्ष किया और लंबे समय तक जेल में भी रहे। उनकी बेटी जिंजी मंडेला, जिनकी अभी हाल ही में मृत्यु हुई है, ने भी इस के विरोध के लिए चर्चित रहीं। बाद में यह नीति सन् 1994 में समाप्त कर दी गई। लेकिन मानसिक स्तर पर यह रंगभेद की भावना नहीं मिटी और अभी हाल में, कोरोना संकट के दौरान अमेरिका की मिनीपोलिस में एक पुलिस अधिकारी द्वारा एक अफ्रीकी अमेरिकी जार्ज फ्लाइट की निर्ममता से हत्या के बाद, अमेरिका में स्थितियां काबू से बाहर हो गईं। दुनिया के सबसे ताकतवर देश कहे जाने वाले अमेरिका में हिंसक प्रदर्शन हुए और गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा हो गए।

कारण स्पष्ट है, एक अमेरिका क्या पूरा यूरोपियन समुदाय आज भी रंगभेद की बेड़ियों से जकड़ा हुआ है। सवाल यह है कि, अमेरिका जो पूर्ण विकसित देश, सर्वाधिक शक्तिशाली देश और सर्वाधिक अनुशासित देश माना जाता है, वहां के लोगों को इतनी सी बात क्यों समझ में नहीं आती, कि त्वचा का रंग भला श्रेष्ठता का पैमाना कैसे हो सकता है। इसका सिर्फ एक छोटा सा जवाब है और वह यह है कि उनके साथ हमारे देश की समृद्ध परंपरा जैसी कोई परंपरा नहीं जुड़ी हुई है।

माना कि हमारे यहां गोरा होना, खासकर लड़कियों के लिए गोरा होना काफी हद तक सौंदर्य का पैमाना माना जाता है, लेकिन यह  पैमाना राष्ट्रीय स्तर पर एक समस्या के रूप में नहीं देखा जाता। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत की एक अरब 30 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या में गोरे रंग वाले लोग मुश्किल से बीस प्रतिशत हैं, जबकि  सांवले या उसके बाद काले रंग वाले लोग अस्सी प्रतिशत हैं।

इस संदर्भ में एक उत्साहवर्धक बात यह भी है कि, पिछले तीन दशकों में इस गोरेपन का स्थान स्मार्टनेस ने ले लिया है अर्थात अगर किसी को सलीके से रहना, अपने आपको संभालना, बातचीत करना और खुद को प्रजेन्ट करना आता है, तो गोरेपन को सौंदर्य का पैमाना मानने वाले लोग उसके सामने पहुंचते ही, अपने सारे पैमाने भूल जाते हैं।

एक बात जो धीरे-धीरे आम मध्यम वर्गीय भारतीय की समझ का हिस्सा बनती जा रही है, वह यह है कि सौंदर्य का पैमाना केवल गोरा होना नहीं है बल्कि अच्छी फिगर, स्मार्ट व्यक्तित्व और चेहरे का ग्लो सौंदर्य की वास्तविक परिभाषा है। शायद इसी कारण फेयर एंड लवली क्रीम ने अपना 45 साल पुराना नाम ही बदल डाला है। यूनिलिवर कंम्पनी ने इसे ‘ग्लो एंड लवली' नाम दिया है अर्थात इस कंपनी की ब्यूटी एक्सपर्ट टीम ने भी यह मान लिया है कि सुंदरता का असली पैमाना गोरापन ना होकर ग्लो अर्थात चमक है। 

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