तेज और कांति के स्रोत भी हैं रत्न

हनुमान प्रसाद उत्तम

8th September 2020

रत्नों का ज्योतिष शास्त्र में विशेष महत्त्व है।रत्न दुर्लभ एवं आकर्षक होते हैं इसको धारण करने से दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।आइए रत्नों के विषय में लेख से विस्तार पूर्वक जानें।

तेज और कांति के स्रोत भी हैं रत्न

रत्न शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद के प्रथम खंड के प्रथम श्लोक में होता है। इसमें इसे अग्नि स्वरूप माना गया है। यह भी मान्यता थी कि बार-बार इस शब्द का उच्चारण करने से शरीर में स्फूर्ति एवं ऊर्जा प्रवाहित होती है। प्राचीन भारतीय तंत्र शास्त्र में 'र' वर्ण को अग्नि एवं कांति का प्रतीक माना गया है। अत: हमारे तन से युक्त होने पर यह 'र' वर्ण 'रतन' या रत्न शब्द की उत्पत्ति करता है अर्थात जो तन के तेज व कांति की वृद्धि करने वाला हो साथ ही साथ मन को प्रसन्नता प्रदान करे वही 'रत्न' है।

विश्व के सर्वाधिक प्राचीन शब्द कोष 'अमरकोष' में रत्न शब्द की व्याख्या करते हुए अमर सिंह ने लिखा है कि जो अपनी जाति में सर्वश्रेष्ष्ठ' हो वही 'रत्न' है। एक अन्य विद्वान ने इसकी व्याख्या करते हुए लिखा है-

'रसे, रसायने, दाने, धारणे देवतार्चने।'

सुलक्षण, सुजातीनि रत्नान्युक्तानि सिद्घये॥'

अर्थात् सुंदर लक्षणों से युक्त उत्तम श्रेणी के रत्न वे हैं जो स्वयं धारण करने पर आनंद प्रदान करें, किसी प्रिय को देने पर उन्हें हर्षित करें, देवताओं की अर्चना में साधक हो तथा औषधि के रूप में प्रयुक्त हो सके। इस प्रकार के दीप्तिमान व आकर्षक खनिजों को छिद्र युक्त होने पर 'मणि' कहा जाता है। इनका उपयोग माला अथवा बाजूबंद आदि में किया जाता है। इनकी व्याख्या प्राचीन विद्वानों ने 'मण्यते स्तुयते इति मणि:' कह कर की है।

प्राचीन काल में विष्णु के वक्षस्थल में विराजित कौस्तुभ मणि, महाभारत काल में कृष्ण द्वारा प्राप्त की गई 'स्यमन्तक मणि', इन्द्र के मुकुट में विराजित 'इन्द्रनील मणि' नागलोक में स्थित 'नागमणि' में विशेष प्रसिद्घ थी। इनके अतिरिक्त तृणमणि, राजमणि, ब्रह्ममणि आदि अनेक मणियों का उल्लेख प्राप्त होता है। आकर्षक सीपियों मोती तथा मूंगे ऐसे रत्नों की उत्पत्ति के कारण भारतीय रत्नों के धरती के गर्भ में स्थित खानों से प्राप्त होने के कारण धरती को 'रत्नगर्भा वसुंधरा' कहकर संबोधित किया। रत्नों की उत्पत्ति के संदर्भ में भारतीय रत्न वैज्ञानिकों की मान्यता है कि -

'भू स्व भावद् हि रत्नानि जतानि विविधनितु।

उपला: रत्न स्वरूप प्राप्ता कालान्तरेण वा॥'

अर्थात भू के स्वभाव यानी स्थान विशेष में उपस्थित विभिन्न रसायनों की प्रतिक्रिया के कारण भूमि के गर्भ में स्थित कुछ पत्थरों में आकर्षक रंग, चमक या कांति, कठोर तथा पारदर्शिता उत्पन्न हो जाती है जो कालांतर में उन्हें 'रत्न' के रूप में परिवर्तित कर देती है।

आज का विज्ञान जिस उन्नत अवस्था में पहुंच चुका है उसके विकास के मूल में वैज्ञानिक अमृत तथा पारसमणि को प्राप्त करने की इच्छा को ही मानते हैं। इन्हीं को खोजते-खोजते मनुष्य ने भू-विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, रत्न विज्ञान, रसायन विज्ञान आयुर्वेद, ज्योतिष शास्त्र, जीव विज्ञान, भौतिक शास्त्र आदि ज्ञान की अनेकानेक नवीन शाखाओं की जानकारी प्राप्त की। अत: हमारी समस्त ऐतिहासिक दृष्टि' से भी रत्न हमारे लिए अत्यंत मूल्यवान हो जाते हैं। रत्नों पर शोध का कार्य विश्व में सर्वप्रथम भारत से ही प्रारंभ हुआ।

विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में 'रत्न' का उल्लेख इस कथन की प्रामाणिकता को सिद्घ करता है। इसके बाद पौराणिक युग में निरंतर रत्नों के विकास की एक नियमित परंपरा हमें प्राप्त होती है। हजारों वर्ष पूर्व से दक्षिण भारत की गोलकुंडा की हीरे की खाने विश्व में हीरों के उत्पादन का प्रमुख केंद्र रही है। विश्व के विख्यात तथा प्राचीनतम हीरे इन्हीं खानों से प्राप्त हुए थे। आचार्य विष्णु गप्त ने जो चाण्क्य के नाम से विख्यात थे आज से 2500 वर्ष पूर्व अपने विश्वविख्यात ग्रंथ 'कौटिलीयार्थ शास्त्रम' के 11 वें अध्याय के 29वें खण्ड में रत्नों की विस्तृत चर्चा करते हुए उस युग में प्रचलित अनेक आभूषणों के नाम तथा रत्नों के मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला है। मूल्यवान रत्नों में उन्होंने हीरे, मूंगे, स्फटिक, 5 प्रकार के मणिक्य, 10 प्रकार के मोतियों, 8 प्रकार की इन्द्रनील मणियों तथा इनके 18 उपमेदों का भी वर्णन किया है।

इसके अलावा प्राप्त होने वाले रत्नों को निम्र श्रेणी का माना है। इसी परंपरा में आचार्य वाराह मिहिर ने अपने विख्यात ग्रंथ 'वृहत्संहिता' के 'रत्न परीक्षाध्याय' की संरचना की जिसमें उन्होंने 22 प्रकार के रत्नों का उल्लेख किया जो इस प्रकार हैं- 1 वज्र, 2- इन्द्रनील, 3- मरकत, 4- कर्केतर, 5- पर्द्मराग, 6- रुधिर, 7- वैदूर्य, 8- पुलक, 9- विमलक, 10- राजमणि, 11- स्फीटिक, 12- शशिकांत, 13- सौगन्धिक, 14- गोमेदक, 15- शंख, 16- महानील, 17- पुष्पराग, 18- ब्रह्ममणि, 19- ज्योतिरस, 20- सस्यक, 21- मुक्ता तथा 22- प्रवाल।

उक्त 22 रत्नों में भी 4 प्रमुख रत्नों को दुर्लभ व अति मूल्यवान होने के कारण महारत्न की श्रेणी में रखा गया है। ये थे- 1. वज्र या हीरा, 2. मुक्ता या मोती, 3. पद्मराग या माणिक्य तथा 4. मरकत या पन्ना।

वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र के शृंगार प्रकरण में विभिन्न प्रकार के रत्नों का परीक्षण करने की विधि तथा उनसे निर्मित होने वाले विभिन्न आभूषणों के नामों का उल्लेख करते हुए 'रत्न परीक्षाध्याय' की संरचना की है जिससे इस बात की जानकारी प्राप्त होती है कि उस युग में रत्नों को तरासने-चमकाने तथा विभिन्न कलात्मक तरीकों से आभूषणों में जुड़ने का कार्य अत्यंत प्रगति पर था और रत्नों के औषधीय गुणों की हमें महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध थी।

छठी शताब्दी में राजा भोज द्वारा लिखित पुस्तक 'युक्तिकल्पतरु' में भी रत्नों के परीक्षण एवं विभिन्न प्रकार के उनके उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। आयुर्वेद शास्त्र में भी रत्नों पर गहन अनुसंधान किए गए तथा इसके माध्यम से गहन से गहन चिकित्सा आसान हो गई तथा कठिन से कठिन रोगों का इलाज संभव हो सका। इस क्षेत्र में भी अनेक विशाल ग्रंथों की रचना की गई जिनमें प्रमुख है- रसेन्द्र सार संग्रह, रस चिंतामणि, रस रत्न समुच्चय, रसायन सार संग्रह, रसचन्द्रिका, योग रत्नाकर तथा भाव प्रकाश आदि।

भारत के अतिरिक्त विश्व के जिन अन्य रत्नों के बारे में अधिकारिक जानकारी प्राप्त करने का कार्य निरंतर जारी रहा उनमें प्रमुख से ग्रीक, रोम, बेबीलोनिया, फारस, मिस्र, अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान। अफगानिस्तान की बदरशा खानों का इतिहास भी करीब 3000 वर्ष पुराना है। इसमें प्रमुख रूप से लाजवद का उत्पादन होता था जिसे उस काल में 'नीलम' के रूप में जाना जाता था। यहां से मुख्य रूप से इसका निर्यात इजिप्ट को किया जाता था जहां मृतात्माओं की शांति के लिए इन्हें मकबरों में लगाया जाता था। कालांतर में इस पर नक्काशी के कार्य में काफी प्रगति हुई तथा इस प्रकार आज से लगभग 4000 वर्ष से भी अधिक पूर्व इजिप्शियन कला के उत्कृष्ट' नमूने तैयार हुए। प्राचीन इजरायल में यूरोप की 12 जातियों के सर्वोच्च धर्म गुरु अपने हृदय में एक चौकोर तख्ती धारण करते थे जिनमें 12 रत्न लगे हुए थे। प्रत्येक रत्न एक जाति विशेष का प्रतीक था। बाद में इन्हीं रत्नों को साल के 12 महीनों से जोड़ दिया गया तथा उस माह में पैदा होने वाले व्यक्तियों के लिए उस रत्न का धारण करना शुभ माना जाने लगा और इस प्रकार बर्थस्टोन धारण करने की परंपरा विकसित हुई। फिर इनका संबंध 12 राशियों से भी जुड़ गया। बाइबिल में विभिन्न प्रकार के 125 रत्नों का उल्लेख प्राप्त होता है किंतु ये नामकरण किसी वैज्ञानिक आधार पर किए गए हैं। अत: मूलरूप से एक ही रत्न के नाम का उल्लेख अनेक रूप में कर दिया गया है। अंबर का प्राचीनतम रत्न के रूप में उल्लेख यूनानी धर्म ग्रंथों में प्राप्त होता है। इन्हीं में 'एमेथीस्ट' का भी रत्न के रूप में उल्लेख मिलता है। रोम के निवासी मूंगे को रक्षा कवच के रूप में धारण करते थे, तो चीन में जेड़ स्टोन व यू स्टोन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रत्न माने जाते थे।

अफगानिस्तान व तुर्किस्तान आदि मुस्लिम देशों के अंदर हकीक, फिरोजा उपल तथा लाजवर्द आदि का महत्त्व अधिक था, वहीं हीरे, मोती तथा माणिक्य को सभी देशों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। पश्चिमी देशों को रत्नों की आपूर्ति सीरिया द्वारा की जाती थी तथा यहां प्राय: भारत, श्रीलंका तथा अरब देशों द्वारा उत्पादित रत्नों को बेचा जाता था। विख्यात पश्चिमी विद्वान सर माइकेल वाइन स्टीन के अनुसार प्राचीन यूरोप में जिन 12 रत्नों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था वे इस प्रकार हैं - 1. जेस्पर, 2. रूबी, 3. टोपाज, 4. अगेट, 5. कारबंकल, 6. एमरल्ड, 7. क्वार्टज, (जिसे हीरा समझा जाता था), 8. एमेथीस्ट, 9. ओनिक्स, 10. जरकन, 11. लेपिस लेजुली (जिसे नीलम समझा जाता था) तथा 12. बेरील जो वस्तुत: पेरीडाट था।

भारत में प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के विद्वानों की मान्यता थी कि मानव शरीर तथा उसके द्वारा किए जाने वाले संपूर्ण कार्यों पर आकाशीय नक्षत्रों का विशेष प्रभाव व नियंत्रण है, अत: जन्म के समय चंद्रमा को आधार मानकर भिन्न-भिन्न ग्रहों की स्थितियों का आकलन करके व्यक्ति की राशि निर्धारित की जाती है। इन राशियों पर जिन 9 ग्रहों का प्रभाव सर्वाधिक पड़ता है, वे इस प्रकार है- 1. सूर्य, 2. चंद्रमा, 3. मंगल, 4. बुध, 5. बृहस्पति, 6. शुक्र, 7. शनि, 8. राहु, 9. केतु।

ग्रहों के प्रसन्न करने तथा उनके द्वारा उत्पन्न बुरे प्रभाव को शांत करने के लिए जिन-जिन नौ रत्नों को धारण करने की सलाह दी गई है वे इस प्रकार हैं - 1. सूर्य के लिए माणिक्य, 2. चंद्रमा के लिए मोती, 3. मंगल के लिए मूंगा, 4. बुध के लिए पन्ना, 5. शुक्र के लिए हीरा, 6. बृहस्पति के लिए पुखराज, 7. शनि के लिए नीलम, 8. राहु के लिए गोमेदक, 9. केतु के लिए वैदूर्य या लहसुनिया।

यूरोप में 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में बर्थ स्टोन धारण करने की परंपरा प्रचलित हुई तथा इस दिशा में शोधकार्य आरंभ हुए। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में अमेरिका में खनिज विज्ञान को एक विषय के रूप में मान्यता प्राप्त हुई तथा इसके अन्तर्गत रत्नों का अध्ययन शुरू हुआ तथा इस शताब्दी के अंत तक विश्व में प्राय: प्रत्येक भाग में इस विषय का अध्ययन व अध्यापन कार्य प्रारंभ हो गया।

इस विषय पर महत्त्वपूर्ण अनुसंधान कार्य किए गए जिनसे यह महत्त्वपूर्ण तथ्य ज्ञात हुआ कि आभूषणों तथा औषधीय उपयोगों के अतिरिक्त भी छोटी-छोटी घड़ियों तथा सूक्ष्म तकनीकी की अन्य मशीनों से लेकर परमाणु संयंत्रों तथा अन्य अनेक आधुनिकतम तकनीकी के विशालतम संयंत्रों की उपयोगिता एवं क्षमता भी ज्ञात हुई कि विश्व के विभिन्न भागों से प्राप्त होने वाले खनिजों की किस्में 1970 तक 2400 से भी अधिक थी। अत: 84 प्रकार के रत्नों की हमारी प्राचीन मान्यता निरर्थक सिद्ध हो गई। इसके साथ ही विश्व के अनेक भागों से अनेक ऐसे नवीन रत्न प्राप्त हुए जो दुर्लभता, आकर्षण तथा उपयोग की दृष्टि' से हमारे ज्ञात महत्त्वपूर्ण रत्नों से भी अधिक महत्त्व के हैं।

आज ज्ञात खनिज श्रेणी के रत्नों की संख्या ही 100 से अधिक हो गई है। अत: भूगर्भ शास्त्र से हटकर एवं स्वतंत्र विषय के रूप में 'रत्न विज्ञान' की स्थापना विश्व के अनेक विकसित देशों में की जा चुकी है तथा इस विषय में निरंतर अनुसंधान कार्य चल रहे हैं। भारत में भी इसका अध्ययन एवं अध्यापन एक स्वतंत्र विषय के रूप में प्रारंभ हो चुका है। फिर भी भारत में मान्य नवरत्नों की मान्यता सारे विश्व में मान्यता प्राप्त कर चुकी है। इस विषय पर विस्तार से चर्चा की अपेक्षा है जो क्रमश: की जाती रहेगी।

 

 

 

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