यज्ञ का पर्यावरण पर प्रभाव

गृहलक्ष्मी टीम 

11th September 2020

हाल के समय में पर्यावरण को बचाने के लिए कई उपाय किए जा रहे हैं, वहीं ऐसा कहा जाता है कि यज्ञ भी पर्यावरण शुद्घि का काम करते हैं। इस विषय पर विज्ञान क्या कहता है, आइए जानते हैं लेख से।

यज्ञ का पर्यावरण पर प्रभाव

हमारे धर्म प्रधान देश में जब भी किसी यज्ञ का आयोजन होता है तब यही कहा जाता है कि इससे पर्यावरण शुद्ध होगा, परंतु वर्तमान संदर्भों में इस तथ्य की वैज्ञानिक धरातल पर विवेचना आवश्यक है। मानव पर्यावरण खासतौर से वायु, जल, भूमि, पेड़-पौधे और जंतुओं से मिलकर बना है। किसी भी यज्ञ का आयोजन वायु के क्षेत्र यानी वायुमंडल को प्रभावित कर सकता है लेकिन अन्य भागों पर इसके असर अभी वैज्ञानिक स्तर पर स्पष्ट नहीं है।

विज्ञान की अस्वीकार्यता

वायुमंडल में जो गंदगी विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों से फैलती है, उनमें विषैली गैसें (सल्फर डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनो और डाई ऑक्साइड्स, हाइड्रो कार्बन्स), कणीय पदार्थ (विभिन्न धातुओं के कण) और विभिन्न रोगों के कीटाणु खास हैं। इस बारे में वायुमंडन स्वच्छता या शुद्धता का आशय यह हुआ कि विषैले गैसों, कणीय पदार्थों और कीटाणुओं का घातक स्तर से कम या समाप्त होना। यज्ञ में जलाई जाने वाली विभिन्न सामग्री (तरह-तरह की लकड़ियां, सुगंधित पदार्थ और घी आदि) से वायुमंडल में कोई भी ऐसे पदार्थ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नहीं बनते जो इन प्रदूषकों से क्रिया करके या फिर इन्हें सोखकर वायुमंडल को शुद्ध कर सकें। अत: यज्ञ द्वारा वायुमंडल स्वच्छता/शुद्धता को वैज्ञानिक स्तर पर एकदम स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

सच्चाई तो यह है कि यज्ञ में जलाई जाने वाली विभिन्न वस्तुओं से भी कुछ कणीय पदार्थ वायुमंडल में मिल जाते हैं। यह एक वैज्ञानिक एवं स्थापित सत्य है कि किसी भी वस्तु का पूर्णरूपेण दहन कभी नहीं होता है एवं उसके अधजले कण गैसों के साथ धुएं के रूप में निकलकर वायुमंडल में मिल जाते हैं। यज्ञ में उपयोग में लाई गई वस्तुओं के साथ भी यही सिद्धांत लागू होता है। वैज्ञानिक आकलन के अनुसार एक टन लकड़ी जलने से 20 किलोग्राम सल्फर डाई ऑक्साइड निकलकर वायुमंडल में समाती है। यज्ञ में जलाए जाने वाले सुगंधित पदार्थों में उपस्थित वाष्पशील सुगंधित तेल के कारण यज्ञस्थल एवं आस-पास का वातावरण सुगंधमय जरूर हो जाता है किंतु इसे स्वच्छ या शुद्ध नहीं कहा जा सकता है।

बड़े-बड़े यज्ञों के समय स्थापित भोजनशाला एवं आस-पास के क्षेत्र में लगी कई प्रकार की दुकानों आदि में भी लकड़ी, कोयला या गैस का उपयोग होता है जिनके जलने से भी कई गैसें एवं कणीय पदार्थ मिल जाते हैं। गमनागमन सुविधा हेतु यज्ञस्थलों पर यातायात सुविधा भी बढ़ाई जाती है एवं इस कारण वाहन जन्य प्रदूषण के बढ़ने से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। सामान्यत: यज्ञस्थलों के कच्चा होने और गमनागमन बढ़ने से वायुमंडल में धूल के कणों की मात्रा का बढ़ना भी एक सामान्य प्रक्रिया है। अत: यदि संयुक्त रूप से देखा जाए तो यज्ञ में प्रयुक्त सामग्री, भोजनशाला एवं दुकानों में जलाए गए ईंधन और यातायात वाहन आदि प्रदूषण बढ़ा ही सकते हैं, फिर शुद्धता या स्वच्छता का प्रश्न कैसा?

ताप और वायु गति के संदर्भ में भी यज्ञों का विश्लेषण जरूरी है। यज्ञस्थान पर एवं आस-पास के परिसर में लकड़ी एवं ईंधनों के जलने से वायु गर्म हो जाती है। गर्म वायु भार में हल्की होने के कारण ऊपर उठ जाती है एवं आस-पास की ठंडी वायु इसकी जगह ले लेती है। यज्ञ चलने तक यह क्रिया लगातार चलती रह सकती है। यज्ञस्थान की प्रदूषित वायु फिर उसकी जगह ले ले तो फिर यह वायुमंडल का शुद्ध या स्वच्छ होना कैसे हुआ?

विज्ञान की स्वीकार्यता

यज्ञ के कीटाणुनाशक प्रभाव को विज्ञान ने कुछ हद तक स्वीकार किया है। इसका कारण तापमान में वृद्धि एवं आर्द्रता में कमी बताया गया है। इस कीटाणुनाशक प्रभाव को वायुमंडल की शुद्धता/स्वच्छता नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वायुमंडल केवल कीटाणुओं से ही प्रदूषित नहीं होता है। यज्ञों के कीटाणुनाशक प्रभाव पर देश-विदेश में कुछ कार्य जरूर हुए हैं। फ्रांस के एक वैज्ञानिक ने प्रयोग कर बताया कि लकड़ी के जलाने पर कुछ मात्रा में फॉर्मल्डिहाइड नामक गैस भी बनती है जो कीटाणुनाशक होती है। पश्चिम के ही एक और वैज्ञानिक डॉ. टार्टलिट ने किशमिश, मुनक्का तथा अन्य सूखे मेवों को जलाकर परीक्षण किए एवं पाया कि इससे मोतिझरा (टायफायड) के कीटाणु समाप्त हो जाते हैं।

अमेरिकी वैज्ञानिक टिलवर्ट के अनुसार शक्कर को जलाने से क्षय, हैजा एवं चेचक आदि रोगों के कीटाणु समाप्त हो जाते हैं। फ्रांस के डॉ. हाफकिन ने घी, चावल एवं केसर के धुएं में भी कीटाणुनाशक क्षमता को देखा। हमारे देश में भी 80 के दशक पलित, भागवत एवं फर्माडिस आदि वैज्ञानिकों ने नागरमोथा, जायफल एवं वायविडंग आदि पर प्रयोग कर इनके धुएं में भी कुछ कीटाणुनाशक गुण पाए गए। घी के कीटाणुनाशक प्रभाव की स्पष्ट विवेचना कुछ रसायनशास्त्र की पुस्तकों में की गई है। इस विवेचना में बताया गया है कि वसा यानी फैट्स (जो घी, तेल में बहुतायत में होते हैं) के गर्म होने से ग्लिसरोल बनता है जो बाद में एक्रोलीन का निर्माण करता है जिससे आंखों में जलन होती है। एक्रोलिन में भी जीवाणुनाशक गुण देखे गए हैं।

वैसे यज्ञों का कीटाणुनाशक प्रभाव भी अब कुछ संदेह के घेरे में आ गया है। इसका कारण यह है कि क्षय, मोतीझरा एवं हैजा आदि जीवाणु (बैक्टीरिया) जन्य रोग हैं। जीवाणु स्वयं  एवं उनमें बनने वाले प्रजनन अंग (जैसे एंडीस्पोर) में काफी प्रतिरोधी क्षमता होती है। अत: यह कहना कठिन है कि यज्ञ से पैदा रसायनों से वास्तव में ये समाप्त हो जाते हैं या फिर यज्ञ के कारण गर्म हुई वायु के साथ ऊपर उठकर अन्य क्षेत्रों में बिखर जाते हैं।

निष्कर्ष

जैव भौतिकी (बायोफिजिक्स) तथा विद्युत रसायन (इलेक्ट्रोकेमेस्ट्री) से संबंधित पर्यावरणविद् यह मानते हैं कि आदर्श वायुमंडल में धनायन तथा ऋणायन करीब बराबर मात्रा में उपस्थित रहते हैं किंतु औद्योगिकरण एवं आधुनिक रहन-सहन के कई कारणों से धनायनों की संख्या बढ़ती जा रही है जिससे असंतुलन पैदा हो गया है। यज्ञ में  जलाई जाने वाली विभिन्न वस्तुओं से यदि ऋणायन पैदा होते हैं तो फिर यह माना जा सकता है कि यज्ञ वायुमंडल के संतुलन में सहायक है। यज्ञ से वायुमंडल की शुद्धता/स्वच्छता वाली बात को वैज्ञानिक स्तर पर सिद्ध करने हेतु जरूरी है कि यज्ञस्थलों पर वायुमंडल का विश्लेषण यज्ञ प्रारंभ होने से यज्ञ समाप्ति के बाद तक किया जाए। निलंबित कणों एवं गैसों की मात्रा का आकलन लगातार किया जाए। प्रदूषण  नियंत्रण के क्षेत्रीय कार्यालय इस कार्य को कर सकते हैं।

 

 

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