पुरूषोत्तम मास में क्यों की जाती है, भगवान विष्णु की पूजा अर्चना

Jyoti Sohi

12th September 2020

अधिक मास में भगवान विष्णु की आराधना का फल दस गुना अधिक मिलता है। और इस माह में श्रीकृष्ण, श्रीमद्भगवतगीता, रामकथा वाचन और श्रीहरि विष्णु भगवान की उपासना की जाती है। माना जाता है कि मास के कम यां अधिक होने की संभावना चंद्र मास में ही होती है। लेकिन यह निर्णय सूर्य संक्रांति से होता है। सामान्यतः प्रत्येक माह में संक्रांति अर्थात सूर्य का राशि परिवर्तन एक बार अवश्य रहने से चंद्र मास की प्रक्रिया सहज चलती रहती है।

पुरूषोत्तम मास में क्यों की जाती है, भगवान विष्णु की पूजा अर्चना
हर साल पितृपक्ष समाप्त होने के अगले दिन ही शारदीय नवरात्रि का आरंभ हो जाते है। लेकिन इस बार ऐसा ना होने की वजह से कई लोग हैरान हैं और जानना चाहते हैं कि इसके पीछे क्या वजह है। तो चलिए आपको बताते हैं। दरअसल, हिंदू पंचांग के मुताबिक हर 3 साल में चंद्रमा और सूर्य के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए अधिक मास  आता है। इस मास को मल मास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस साल अधिक मास 18 सितंबर शुक्रवार से शुरू होकर 16 अक्तूबर शुक्रवार तक रहेगा। अधिकमास को  लेकर हो सकता है आप लोगों के मन में ये सवाल उठता ही होगा की इस मास में क्या खास होता है और ये बनता कैसे है तो आइए जानते है 
भगवान विष्णु की आराधना का फल
माना जाता  है कि अधिक मास में भगवान विष्णु की आराधना का फल दस गुना अधिक मिलता है। और इस माह में श्रीकृष्ण, श्रीमद्भगवतगीता, रामकथा वाचन और श्रीहरि विष्णु भगवान की उपासना की जाती है। माना जाता है कि मास के कम यां अधिक होने की संभावना चंद्र मास में ही होती है। लेकिन यह निर्णय सूर्य संक्रांति से होता है। सामान्यतः प्रत्येक माह में संक्रांति अर्थात सूर्य का राशि परिवर्तन एक बार अवश्य रहने से चंद्र मास की प्रक्रिया सहज चलती रहती है। जब मास में 2 सौर संक्रांतियों का समावेश हो जाए तो क्षय मास आता है एवं जिस माह में सूर्य संक्रांति का अभाव हो, उसे अधिक मास कहते हैं।
अधिक मास का पौराणिक आधार
अधिक मास के महत्व के तौर पर एक पौराणिक कथा भी सुनाई जाती है। कहते हैं कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक दैत्य था। वे स्वयं को अमर करना चाहता था। भगवान विष्णु को वह अपना शत्रु मानता था। उसने ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान पाने के लिए तपस्या की। ब्रह्मा जी उसकी तपस्या से प्रकट हुए और उनसे अमरता के अलावा कोई और वरदान मांगने को कहा। हिरण्यकश्यप ने चतुरता दिखाते हुए कहा कि मेरी मृत्यु 12 महीनों में नहीं होनी चाहिए जिस पर ब्रह्मा जी ने तथास्तु कहा। अब हिरण्यकश्यप ब्रह्मा जी का यह वरदान सुनकर प्रसन्न हो गया कि अब वह अमर है। अमरता के वरदान की वजह से वह धरती पर कब्जा करने के लिए लगातार पाप कर्म करने लगा। भगवान विष्णु ने उसके बढ़ते पापों को देखकर उसका वध करने के लिए तेरहवां महीना यानी अधिक मास बनाया। इसी माह में भगवान विष्णु ने भक्तराज प्रहलाद के पिता दैत्य हिरण्यकश्यप का वध कर दिया।
अधिकमास. वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार भारतीय हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है। जो हर 32 माह 16 दिन और 8 घंटे के अंतर से आता है। इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है। वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है।
नियम
इस माह में जितना हो सके उतना संयम अर्थात ब्रह्मचर्य का पालन] शुद्धता] पवित्रता] ईश्वरीय आराधना] देवदर्शन आदि अवश्य करना चाहिए। सभी नियम अपने सामर्थ्य अनुसार करना चाहिए। यदि पूरे मास यह नहीं हो सके तो एक पक्ष में अवश्य करना चाहिए। यदि उसमें भी असमर्थ हों तो चतुर्थी] अष्टमी] एकादशी] प्रदोष] पूर्णिमा] अमावस्या को अवश्य देव कर्म करें। साथ ही ये भी कहा जाता है कि अधिक मास की कथा] माहात्म्य का भी पाठ करने से पुण्यों का संचय होता है। इस माह में व्रत] दान] जप करने का अव्यय फल प्राप्त होता है।  
पूजन
अधिकमास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीददारी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते हैं।  प्राचीन धर्मग्रंथों में पुरुषोत्तम मास में विष्णु स्वरूप शालिग्राम के साथ श्री महालक्ष्मी स्वरूपा श्री यंत्र का पूजन संयुक्त रूप से करने का काफी महत्व बताया गया है। माना जाता है कि यदि कोई साधक प्रतिदिन शालिग्राम पूजन कर चरणोदक अर्थात उस पर चढ़ाया गया जल ग्रहण करता है तो उसे किसी तीर्थयात्रा की जरूरत नहीं पड़ती। सामान्य रूप से शालिग्राम मूर्ति विग्रह को तुलसी दल पर स्थापित करते हैं। यह तुलसी दल लक्ष्मी का ही एक स्वरूप है और इसके बिना शालिग्राम पूजा अपूर्ण मानी जाती है। इस पूजन में श्री यंत्र स्थापित किया जाता है। शालिग्राम और श्री यंत्र के दर्शन मात्र से सभी तीर्थों का फल प्राप्त होता है। क्योंकि इन दोनों में ही सभी तीर्थ,देवता, समुद्र देवता तथा विष्णु की शक्तियों का निवास है।
अधिक मास में कैसा भोजन करें
अधिक मास की कथा, माहात्म्य का भी पाठ करने से पुण्यों का संचय होता है। इस माह में व्रत, दान, जप करने का अव्यय फल प्राप्त होता है। व्यक्ति यदि गेहूं, चावल, मूंग, जौ, मटर, तिल, ककड़ी, केला, आम, घी, सौंठ, इमली, सेंधा नमक, आंवले का भोजन करें तो उसे जीवन में कम शारीरिक कष्ट होता है। उक्त पदार्थ या उससे बने पदार्थ उसके जीवन में सात्विकता की वृद्धि करते हैं। वहीं उड़द, लहसुन, प्याज, राई, मूली, गाजर, मसूर की दाल, बैंगन, फूलगोभी, पत्तागोभी, शहद, मांस, मदिरा, धूम्रपान, मादक द्रव्य आदि का सेवन करने से तमोगुण की वृद्धि का असर जीवनपर्यंत रहता है। 
पुरुषोत्तम मास के पहले दिन
पुरुषोत्तम मास के पहले दिन प्रातः काल नित्य किया से निवृत्त हो श्वेत वस्त्र धारण करें। अपने सामने किसी ताम्र पात्र में पुष्प बिछा कर उसमें शालिग्राम स्थापित करें। फिर शुद्ध जल अर्पित कर विग्रह को दूसरे पात्र में स्थापित करें। उसके बाद मंत्र उच्चारण करें। शालिग्राम विग्रह के निकट उसी पात्र में श्री यंत्र स्थापित कर उस पर कुमकुम, गुलाल, चावल, कमल पुष्प, नैवेद्य, फल आदि अर्पित करें। कहा जाता है अधिकमास में किया गया पूजा-पाठ] दान- पुण्य आदि हमेशा व्यक्ति के साथ रहता है और उसे प्रभु कृपा प्राप्त होती है तो आइए हम सभी भी मिलकर भगवान की भक्ति कर पुण्य कमाएं।

 

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