मैं हूं एलोवेरा

मोनिका अग्रवाल

14th September 2020

आप सबको एलोवेरा का हार्दिक नमस्कार

मैं हूं एलोवेरा

मैं हूं एलोवेरा

मेरे प्यारे भारतवासियों, मुझे चाहने वालों, आप सबको एलोवेरा का हार्दिक नमस्कार। हार्दिक इसलिए कि भले ही देर से सही, लेकिन आपने मेरे महत्व को तो समझा। भूला नहीं हूं मैं, जब आप लोग पहले, अपने घरों में फूल और आम पौधों के साथ मुझे लगाना भी पसंद नहीं करते थे। परंतु  जब से पता चला है कि औषधीय पौधे के रूप मैं बहुत चमत्कारी हूं और नियमित सेवन करने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, तब से आप मुझ पर विशेष रूप से मेहरबान हैं। मुझे अपने बगीचे में खास जगह देने पर ध्यान देने लगे हैं।

शायद आपको मालूम भी नहीं होगा कि मेरी उत्पत्ति कब हुई, और कहां पर हुई? वैसे जब आप मेरा इतना प्रयोग करने लगे हैं तो आपको मेरे बारे में सब कुछ मालूम होना चाहिए, इसके लिए किसी डिग्री की जरुरत तो है नहीं। खैर चलो, माफ किया। मैं खुद ही आपका ज्ञान बढ़ा देता हूं। 

आप यदि यह समझते हो कि मैं भारतीय हूं तो आपको सुनकर झटका लगेगा कि, मेरी उत्पत्ति उत्तरी अफ्रीका के जंगलों में हुई है। विभिन्न नामों जैसे कि ग्वारपाठा ,एलोवीरा, घ्रित्कुमारी , ग्रिहकन्या आदि नामों से पुकारा जाने वाला मैं आजकल कन्याओं का बड़ा ही फेवरेट पौधा हूं। तभी तो उनके सौन्दर्य बढ़ाने के काम में बहुतायत प्रयोग किया जाता हूं।

मजा आ रहा है। आनंद ले रहा हूं उनके प्यार की बरसात का। वैसे मैं दिखने में बहुत ही बदसूरत हूं। मेरी हाइट बस दो फुट ऊंची  होती है । लेकिन मेरी मांसल पत्तियाँ १२से १५ इंच लम्बी होती हैं तथा पौन इंच मोटी होती हैं जिनके किनारों पर कांटे होते हैं । यही पत्तियाँ दवा के रूप में प्रयोग की जाती हैं । पता है, मेरे पौधे को सदियों पहले महारानी क्लियोपेट्रा का भी प्रिय माना जाता था। तभी तो मैं उनके सौन्दर्य प्रसाधनों का एक महत्वपूर्ण अंग था । हालांकि मूलतः तो मैं दक्षिणी अफ्रीका का पौधा हूं , और सोलहवीं शताब्दी में भारत में आया। लेकिन अब तो मैं भी पूरी तरह से भारतीय रंगों में रच और बस गया हूं।

पता है!  मेरी मांसल पत्तियाँ के कारण ही मैं आजकल सारे पौधों का राजा बना हुआ हूं।हमारे भारत देश के छः राज्यों में मेरी खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। मेरी पत्तियों को काटने पर पीले रंग का रस निकलता है, जो ठंडा होने पर जम जाता है। जिसे मुसब्बर ,कुमारीसार,एलोज एलुआ, सिब्र आदि नामों से भी जानते हैं।  एक राजा के क्या गुण होते हैं?  जो आपको हर तरह की परेशानियों से दूर रखें, यही ना! तो यह सारे गुण मेरे में विद्यमान है! अब आप ही देखो सिर्फ सौंदर्य प्रसाधनों में ही नहीं बल्कि आप की यौन शक्ति बढ़ाने तक में मेरी महत्ता है।

जब आप मेरे गूदे में घी ,चीनी तथा दूध मिलकर हलुआ कर सेवन अगर करो तो आपकी कमजोरी तो दूर होती ही है साथ ही यौन शक्ति भी बढ़ती है। पेट में अल्सर होने पर मेरे गूदे को खाली पेट खाने से लाभ होता है। अगर खूनी दस्त हो रहा है तो गुदे में चीनी तथा जीरा मिलकर खा लो। पेट की बीमारियों या अपच के लिए मुझ में अजवाईन मिलकर खाओ। और बताओ मेरे और कितने गुड़ जानना चाहोगे? क्या? अभी भी  शंका है? तो लो मेरे थोड़े से गुण और जान लो।

जोडों के दर्द में मेरे गूदे को गर्म करके प्रभावित स्थान पर लगा सकते हो । ज़ख्म या घाव पर मेरे गूदे को क्रीम की तरह लगा लो फायदा ही होगा। आँखें लाल हो गईं हों तो मेरे गूदे की पट्टी बना कर आंखों पर बाँध लो। बाल झड़ रहे हों तो मुझे अपने बालों पर रगड़ते हुए मालिश करो सोने से पहले।  यह करने से अनिद्रा के रोगी को भी लाभ होता है। अगर सर्दी या खांसी हो गयी हो तो मेरे पत्ते को भून कर उसका जूस निकाल कर पी कर तो देखो। यदि आधा चम्मच जूस एक कप गर्म पानी में मिला कर पीते हो तो ,तुंरत लाभ मिलेगा ।

हे भगवान! और कितने लाभ हैं। अभी तो अपने मुंह से बताते हुए भी मुझे शर्म आने लगी है। चलो कोई नहीं आप मुझे बेशर्म ही तो कह दोगे क्या फर्क पड़ता है। मैं तो 'साफ बोलना और सुखी रहना' वाले सिद्धांत पर विश्वास करता हूं। पेशाब संबन्धी रोगों को दूर करने के लिए एक सप्ताह तक रोज सुबह मुझे खाएं।शरीर में कहीं सूजन हो गयी हो तो मेरे गूदे को पानी में उबाल कर इसकी पुल्टिस बाँध लो। गावों में तो माताएं बच्चों का दूध छुडाने के लिए मेरे गूदे को स्तनों पर मल लेती हैं।  पता भी है मेरे उपयोग से लीवर, स्प्लीन, महिला प्रजनान्गों तथा तंत्रिका-तंत्र में अद्भुत शक्ति का संचार होता है। मेरे अंदर मधुमेह का भी खात्मा करने के गुण मौजूद हैं ।

सच पूछो तो मैं अकेला सारे डॉक्टर्स के बराबर हूं।  आखिर ऐसे ही थोड़ी न, पूरी दुनिया में मैं छाया हुआ हूं । तो है ना एक राजा वाले गुण? चलो थोड़ा सा और बता देता हूं कि मेरी लगभग 275 प्रजातियां है इनमें से लगभग आठ से 12 प्रजातियां बहुत उपयोगी है। अलग-अलग देशों और राज्यों में मेरे नाम जरूर अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन फायदे मेरे उतने ही हैं।  अगर भारत में मुझे ग्वारपाठा, घृतकुमारी कहते हैं, तो फारसी में मुझे फारसी में-दरख्ते सिब्र ....अरबी में- ससब्बारत ....बंगाली में -घ्रीत्कुमारी ....मराठी में -कोरफड ....गुजराती में - कुंवार पाठ ...तेलगू में - चिन्नाकत बांदा ....मलयालम में -कुमारी ....तमिल में -करियापोलाम, मुसब्ब्रम ....कन्नड़ में -लोलिसार ....चीन में -लू हुई तथा वैज्ञानिक नाम है-एलोवीरा।

वैसे भला हो उन सब विश्व सुंदरियों का, उन ब्रह्मांड सुंदरियों का, जिन्होंने कंपनी के फायदे के लिए हर एक तरह के साबुन और शैंपू में मेरे गुणों की महत्वता बताई। साथ ही भला हो उस बाबा का जिसने पूरे विश्व को सौंदर्य करण, स्वास्थ्य और व्यापार के उपहार स्वरूपी नए समीकरण दिये। यह तो हुआ इतिहास। अब आते हैं मुद्दे की बात पर भाई लोगों, देखो मेरा तो सिर्फ इतना सा कहना है कि, चाहे मैं हूं या कोई और अन्य औषधि, आप हमारा सेवन करो या मत करो। लेकिन अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखो। अपनी जीवनशैली को बदलो। स्वस्थ रहो, व्यस्त रहो और मस्त रहो। दुनिया में क्या हो रहा है उसकी परवाह मत करो। लेकिन अपना और अपने परिवार पर ध्यान दो।।

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