आप अपने माता-पिता को पर्याप्त प्यार नहीं करने के लिए दोषी महसूस करते हैं

मोनिका अग्रवाल

17th September 2020

आप अपने माता-पिता को पर्याप्त प्यार नहीं करने के लिए दोषी महसूस करते हैं

आप अपने माता-पिता को पर्याप्त प्यार नहीं करने के लिए दोषी महसूस करते हैं

"माता पिता" भारतीय संस्कृति के दो ध्रुव है और इन्ही दो स्तम्भों पर हमारी,भारतीय संस्कृति,मज़बूती से स्थिर है.माँ वात्सल्य,ममता और अपनेपन,की प्रतिमूर्ति है.आकाश के समान विशाल ,सागर सामान अंत:करंण,इन सबका संगम है .सारे जग की सर्वसम्पन्न,सर्वमांगल्य,सारी शुचिता फीकी पड़ जाती है माँ के सामने.और पिता सही अर्थों में भाग्यविधता .जीवन को योग्य दिशा दिखलाने वाला,महत्वपूर्ण कार्य सतत् करने वाला . कभी गम्भीर तो कभी हंसमुख,मन ही मन स्तिथी को समझकर पारिवारिक संकटों से जूझने वाला.


 लेकिन आज जो आधुनिक युग का जो चित्र दिखाई दे रहा है,उसके इस महान पवित्र सम्बंध की अवहेलना होती दिखाई दे रही है.आधुनिकता के बहते प्रवाह में बहकर माता पिता को बोझ माना जाने लगा है,यहाँ तक अदेशित किया जाने लगा है कि साथ साथ रहना है तो ,हमारे तरीक़े से रहना होगा,धन संपत्ति उनके(संतान) नाम कर दें या फिर अलग रहें.वृद्धाश्रम में रहने लगे हैं वो ही माता पिता जिन्होंने अपना ख़ून पसीना एक करके अपनी संतान की परवरिश की थी.


पत्थर पूजते हैं,मंदिर जाते हैं,पूजा पाठ करवाते हैं और वो सारे काम करते हैं जिससे हमें लगता है कि हमारा जीवन धन्य हो गया,लेकिन जो ईश्वर हमारे पास है,उसकी ओर ध्यान नहीं देते?अहसास तब होता है जब हमारी अपनी संतान हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करती है.पछताते भी हैं अपनी ख़ुशियों का गला घोंट कर हमारी सारी ख़्वाहिशें पूरी करने वाले माता पिता ही थे जिन्होंने हमें इस समाज में जीने का अधिकार दिलाया.


ये सच है कि ,आपाधापी के इस दौर में समयाभाव हर ओर दिखाई दे रहा है,लेकिन,क्या दो पल का समय भी आप अपने माता पिता के लिए नहीं निकाल सकते.
उनकी पसंद ना पसंद का ख़याल रखना,कोई नया या बड़ा काम करने से पहले उनसे चर्चा करना,उनके स्वास्थ्य का चेकअप करवाना,उनकी चिक चिक को इग्नोर करना,ऊँची आवाज़ में बात न करना,कभी कभार (जितना समय आपके पास है) उन्हें घुमाने ले जाना क्या आपका फ़र्ज़ नहीं है.मृत्यु के बाद तो श्राद्ध सभी करते हैं लेकिन जीते ही अपने माता पिता को ,बहुत कम लोग ही प्यार ,अपनापन और सम्मान देते हैं?


यदि आप भी ऐसा करते हैं तो याद रखिए ,सारी ज़िंदगी,सिवाय दुःख और पछतावे के आपके हाथ कुछ नहीं आएगा.क्योंकि,जो संतान अपने माता पिता का आदर नहीं करती,उनके दोष ही देखती है ,उनका त्याग और उपकार याद नहीं करती,उन्हें,चाहे कितनी भी धन संपदा हाथ न लग जाय,उसकी अध्यात्मक उन्नति कभी नहीं हो सकती,और उसके जीवन में अड़चनें ही अड़चने आती हैं.

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