श्री दुर्गा चालीसा

गृहलक्ष्मी टीम

17th October 2020

श्री दुर्गा चालीसा

श्री दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुखहरनी।।

नरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी ।।

शशि लिलाट मुख महाविशालो। नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।।

रुप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुखपावे।।

तुम संसार शक्ति लय कीनो। पालन हेतु अन्न धन दीना।।

अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला।।

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिव शंकर प्यारी।।

शव योगी तुम्हरे गुण गावै। बाह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें।।

रुप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबद्धि ऋषि मुनिन उबारा ।।

धरा रुप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़ कर खम्बा।।

रक्षा करि प्रहलाद बचायो। हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो।।

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं।।

रसिंधु में करत विलासा।। दयासिंधु दीजै मन आसा।।

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी।।

मातंगी धूमावती माता। भुवनेश्वर बगला सुख दाता।।

श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुख निवारिणी।।

केहरि वाहन सोह भवानी। लंगुर बीर चलत अगवानी ।।

कर में खप्पर खड़ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै ।।

सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला।।

नगरकोट में तुम्ही बिराजत। तिहूं लोक मे डंका बाजत।।

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्त बीज शंखन संहारे ।।

महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी।।

रुप कराल काली को धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा।।

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब ।।

अमर पुरी औरों सब लोका। तब महिमा सब रहै अशोका ।।

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी।।

प्रेम भक्ति से जो जस गावे। दुख दारिद्र निकट नहीं आवे।।

ध्यावे तुम्हें जोनर मन लाई। जन्म मरण ताको छुटि जाई।।

जोगी सुर-मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी

शंकर आचारज तप कीनो। काम औ क्रोध जीति सब लीनो।।

नशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहि सुमिरो तुमको।।

शक्ति रूप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो ।।

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदंब भवानी ।।

भई प्रसन्न आदि जगदंबा। दई शक्ति नहीं कीन विलंबा।।

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरे दुख मेरो।।

आशा तृष्णा निपट सतावे। मोह मदादिक सब बिनशावें।।

शत्रु नाश कीजे महारानी। सुमिरौ इकचित तुम्हें भवानी।।

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि सिद्धि दे करहु निहाला।।

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