दुर्गा शब्द का अर्थ

गृहलक्ष्मी टीम

19th October 2020

'दु’ शब्द का अर्थ अंधकार भी होता है। 'दु’ का अर्थ कठिनाई भी होता है और 'दु’ का अर्थ बुराई या कष्ट भी होता है। 'ग’ का अर्थ ईश्वरीय ज्योति यानि प्रकाश तथा दुखों, पापों और बुराइयों को हरने वाला होता है।

दुर्गा शब्द का अर्थ

दुर्गा दुर्गति को नाश करने वाली शक्ति का नाम है, जिसके स्मरण मात्र से शारीरिक ही नहीं वरन्‌ मानसिक रोगों व कष्टों का भी नाश होता है। 'द' का अर्थ है जो स्थिर है, रुका हुआ है और 'ग' का अर्थ है जिसमें गति है जो चलता है। 'उ' का अर्थ है स्थिर और गतिमान के बीच का संतुलग और 'अ' का अर्थ है अजन्मे ईश्वर की, परमात्मा की शक्ति, यानि दुर्गा का अर्थ हुआ परमात्मा की वह शक्ति जो स्थिर भी है, गतिमान भी है और संतुलन में भी है उसे दुर्गा कहते हैं।

इसके अलावा 'दु' शब्द का अर्थ अंधकार भी होता है। 'दु' का अर्थ कठिनाई भी होता है और 'दु' का अर्थ बुराई या कष्ट भी होता है। 'ग' का अर्थ ईश्वरीय ज्योति यानि प्रकाश तथा दुखों, पापों और बुराइयों को हरने वाला होता है। 'अ' का अर्थ अजन्मा ईश्वर, अनन्त परमात्मा और उसकी शक्ति। बीच में रेफ यानि 'र' का अर्थ है पहले से दूसरे की ओर ले जाने की शक्ति। तो दूसरे शब्दों दुर्गा का अर्थ हुआ परमात्मा की वह शक्ति जो अंधकार, कठिनाइयों दुखों, बुराइयों व कष्टों का नाश करके हमें प्रकाश, सुख तथा आनन्द की ओर ले जाती है उसे दुर्गा कहते हैं।

वेद पुराणों के अनुसार, दुर्गा माता की शक्ति के असंख्य स्वरूप हैं क्योंकि यह ब्रह्म व पकृति स्वरूप हैं। जिस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेश, रजो, सतो, तमो गुण प्रधान हैं। उसी प्रकार माता शक्ति में तीनों गुण प्रधान हैं, महाकाली रौद्र तमो, महालक्ष्मी सतो और महासरस्वती रजो गुण प्रधान हैं। महाकाली दुष्टों का संहार करती हैं, महालक्ष्मी संसार का पालन-पोषण और महासरस्वती जगत की उत्त्पत्ति व ज्ञान का संचार करती हैं।

यह अपने तीनों गुणों सात्विक, राजसिक और तामसिक के आधार पर क्रमश: मां सरस्वती, महालक्ष्मी, तथा महाकाली के रूप में विश्वविख्यात हैं। शक्ति, ऐश्वर्य और ज्ञान की अधिष्षात्री देवियों के रूप में क्रमश: महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। इन्हीं तीनों महाशक्तियों का समन्वित रूप ही भगवती दुर्गा है। दुर्गा परमात्मारूपा महाशक्ति के रूप में समस्त ब्रह्मांड में विद्यमान हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। यही महामाया हैं, यही पंच महाशक्ति, दश महाविद्या हैं। यही शिवस्वरूपा हैं तथा नारायणी, विष्णुमाया तथा पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिनी नाम से प्रसिद्ध हैं।

अपूर्ण हैं उस संपूर्ण शक्ति का नाम है, देवी भगवती दुर्गा। दुर्गा का अर्थ है दुर्गगा, कठिनता से प्राप्ति के लिए योग्य शक्ति। मां दुर्गा ने संसार की सभी शक्तियों को अपने में समेटा है। अनेक हाथों के प्रतीक चिहन भी यही कहते हैं। दुर्गा के आठ हाथों में से सात हाथों में शक्ति के प्रतीक चिहन-शंख, चक्र, गदा, पद्म, त्रिशूल, खड़ग व धनुष-बाण हैं। आठवां हाथ ओम से अंकित है जो आशीर्वाद का प्रतीक है। आशीर्वाद भी स्वयं में एक महाशक्ति है जो प्रेरिका व निर्माण करने वाली है।

सभी प्राणियों को चार कोटियों में विभक्त किया गया है। पिंडज (मनुष्य आदि), अंडज (मछली, पक्षी इत्यादि), स्वेदज (जूं आदि) तथा उद्भिज्ज (अंकुरण वाला)। दुर्गा इनमें से किसी कोटि में नहीं आती। सभी देवी-देवताओं में जो अलग-अलग शक्तियां थीं, उनका सम्मिलित रूप ही दुर्गा-शक्ति है। इसीलिए वे अयोनिज, स्वयंभू और संपुजित शक्ति-स्वरूपा हैं। अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ने वाले महायोद्धा धनुर्धारी हैं। दुर्गा ने दुर्ग नामक असुर का वध किया था, इसीलिए इन्हें दुर्गा कहते हे तंत्र के अनुसार, जिन तक पहुंचना कठिन हो, उसे दुर्गा कहते हैं।

क्यों पडा दुर्गा नाम ?

इसी प्रकार एक अन्य कथा के मुताबिक प्राचीनकाल में दुर्गम 5 नामक महाबली असुर के अत्याचारों से त्रिलोक में त्राहि- ज्राहि मची थी। भोजन और जल के अभाव में सर्वत्र पीड़ा और हाहाकार मचा था। इस पर देवता भगवती की शरण में जाकर बोले कि मां जैसे आपने शुम्भ-निशुम्भ, चंड-मुंड, मधु-कैटभ, महिष, धूमप्राक्ष, रक्तनीज आदि असुरों के प्राण हर हमारी रक्षा की है, उसी तरह दुर्गगासुर से तथा उसके द्वारा उत्पन्न अकाल से जगत की रक्षा करें।

देवताओं की करुणा से परिपूर्ण गाथा सुनकर देवी द्रवित हो गईं और अपने असंख्य नेत्रों से युक्त रूप का उन्हें दर्शन कराया। उनके इन असंख्य नेत्रों से अश्रुजल की धाराएं तीब्रगति से प्रवाहित हो उठीं, जिससे सब लोग तृप्त हो गए।

नदियों और समुद्रों में जल कलकल करने लगा। देवी ने सब प्राणियों के लिए विविध प्रकार के अन्न, फल तथा शाक उत्पन्न किए, जिससे सब जीव संतुष्ट हो गए।

देवताओं ने देवी से फिर प्रार्थना की कि अब आप दुर्गमासुर का संहार करके जगत का कल्याण करें। देवी ने उन्हें आक्रास्त करके भेज दिया। दुर्गमासुर पूरी सृष्टि को फिर धनधान्य से परिपूर्ण देखकर अचंभित हो गया। उसे जब सारी बात पता चली तो उसने अपनी सेना के साथ देवलोक को घेर लिया। तब देवी भगवती देवलोक के चारों ओर डटकर खड़ी हो गई। जब असुरों ने उन पर आक्रमण किया तो देवी के शरीर से काली, तारा, छिल्रमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भेरवी, बगला, घूम्रा, त्रिपुर सुंदरी तथा मातंगी नामक दस महाविद्याएं अस्त्र-शस्त्र से सज्जित होकर निकलीं। इसके उपरांत दिव्य विग्रह वाली असंख्य मातृकाएं उत्पन्न हुईैं। इन समस्त शक्तियों ने दस दिन के युद्ध में दुर्गगासुर की सेना में हाहाकर मचा दिया।

ग्यारहवें दिन दुर्गगासुर लाल माला तथा लाल वस्त्र धारण किए रथ में बैठकर देवी पर बाणों की बौछार करने लगा। रथ पर आछूढ़ देवी ने भी उस पर बाण छोड़े। अंत में देवी ने एक साथ पंद्रह बाण छोड़कर उसका संहार कर दिया। दुर्गमासुर के शरीर से एक दिव्य तेज निकला जो भगवती के शरीर में समा गया। देवी ने दुर्गम दैत्य का वध किया इसलिए उनका नाम दुर्गा विख्यात हुआ।

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