मोक्ष द्वार

गृहलक्ष्मी टीम

18th October 2020

अनंत है जीवन का रहस्य, सीमा से परे है इसका ज्ञान धर्म क्या है, क्या है कर्म? क्या है भाग्य, क्या है मोक्ष? ईएसआई उधेड़-बुन में जीवन बीत जाता है पर उत्तर नहीं मिलत। जीवन के इन्हीं पर्श्नों का समाधान है साधना-पथ।

क्या है नवरात्र और रामनवमी का संबंध?

वासंतीय नवरात्र का संबंध मां दुर्गा की स्तुति-अर्चना से ही नहीं जुड़ा बल्कि भगवान श्रीराम के पूजन में भी जुड़ा है। नवरात्र के साथ-साथ रामनवमी का पर्व मात्र संयोग्यवश ही नहीं है, बल्कि इसका अपना महत्त्व है। दोनों का आपसी संबंध स्पष्ट' करता है यह लेख।

दुर्गा पूजा भारत की सनातन संस्कृति का महत्त्वपूर्ण पर्व है। मुख्य रूप से दो नवरात्रों का यहां अधिक महत्त्व है। शारदीय नवरात्र और वासंती नवरात्र। इनमें भी वासंती नवरात्र का अधिक महत्त्व है। इसका एक कारण यह भी है कि नवरात्र की नवमी को ही राम-जन्मोत्सव की रामनवमी मनाई जाती है।

दुर्गा ने चंड, मुंड, शुंभ, निशुंभ, चिक्षुपर, महिषासुर, इत्यादि असुरों, दैत्यों और राक्षसों का वध किया था, जिनसे तीनों लोक भयाक्रांत और परास्त थे। राम ने भी त्रिलोक-विजयी रावण को मारकर अत्याचार और अन्याय की एक लंबी परंपरा को नष्ट किया था। राम ने वनवास के क्रम में उन अनेक राक्षसों को मार डाला था, जो ऋषि-मुनियों की अकारण हत्या करते थे। इस असुर-संहार के बाद ही वह मिथिला गए थे। रावण तो महाराक्षस था, जिसका राम ने अंत में वध किया था। भगवती दुर्गा ने भी चंड-मुंड, शुंभ-निशुंभ इत्यादि राक्षसों का वध करने के पश्चात् महाराक्षस महिषासुर का वध कर तीनों लोकों को भय-मुक्त किया था। दुर्गा पूर्ववर्ती है, राम परवर्ती। दुर्गा नारी है, राम पुरुष। दोनों ने असुरों और महासुरों का वध किया, दोनों दिव्य शक्ति-संपन्न हैं। राम ने भगवती दुर्गा की उपासना से शक्ति प्राप्त की थी और विजय का वर मांग लिया था। रावण पर विजय प्राप्त के कारण इसे 'विजयादशमी' भी कहते हैं। फिर बीसवें दिन राम के अयोध्या लौटने पर उत्सव मनाया गया, जो प्रति वर्ष दीपावली के रूप में मनाया जाता है।

दुर्गा पूजा और राम का महत्त्व

राम का अर्थ है: रमन्ते योगिनो यस्मिन् स राम:। अर्थात् योगिगण अपने ध्यान में जिन्हें देखते हैं, वे हैं राम। राम का तंत्र में अर्थ है कल्याणकारी अग्नि और प्रकाश।

इसलिए नवरात्रों में रामचरित-मानस या रामायण-पाठ का विधान है। दुर्गा-सप्तशती संपूर्ण रूप से तंत्र-ग्रंथ हैं। यह योग और भोग दोनों फलों को देने वाला ग्रंथ है। रामकथा मोक्ष या योग या कैवल्य की ओर ले जाने वाली विद्या है। राम ऋषि संस्कृति के प्रतीक पुरुष हैं। भारतीय संस्कृति ऋषि-संस्कृति तथा कृषि-संस्कृति का सम्मिलित स्वरूप हैं।

मानव-सभ्यता के विकास-क्रम में यह सिद्धांत स्थिर हुआ कि पुरुष आखेट या शिकार के लिए जंगलों में जाते थे। गर्भधारण, रजस्वला, कोमलांगता या ऐसे कारणों से नारियां गुफाओं में ही रह जाती थीं। स्वयं के लिए, अपने शिशुओं और परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्होंने कृषि का सहारा लिया, कृषि-कर्म आरंभ किया और उसे आगे बढ़ाया। इस तरह फिर खेती का विस्तार होता गया।

उस खेती और उसकी फसलों को महिष (भैंसा) से बहुत हानि होती थी। उस भैंसे (महिषासुर) को गुफावासिनी ही मार सकती थीं। यह भी एक प्रतीक है। आज दुर्गापूजा के नवरात्र में जब कलश-स्थापन किया जाता है तो कलश के नीचे मिट्टी पर जौ उगाया जाता है। यह कृषि-कर्म का ही प्रतीक है। यह पूजा का समाजशास्त्रीय संदर्भ है।

राम ऋषि-तत्त्व के प्रतीक हैं, यही कारण है कि दुर्गार्चन और रामार्चन साथ-साथ चलते हैं। दोनों के बीज-मंत्र हैं- दुं दुर्गायै नम:! रां रामाय नम: ओम नमो नारायणाय।

तंत्र का ग्रंथसार दुर्गा सप्तशती

भारतवर्ष को वैदिक और तांत्रिक-भूमि कहते हैं। वेद और तंत्र दोनों अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वेदों का चरम-लक्ष्य है अद्वैत-दर्शन, जो 'अहं ब्राहृास्मिज्, 'अयमात्मा ब्राहृज्, 'प्रज्ञानं-ब्राहृ' तथा 'तत्त्वमसि' चारों वेदों से गृहीत इन चार महावाक्यों का अंतस्तत्त्व है। उस अद्वैत-दर्शन में कैवल्य की स्थापना होती है, जहां आनंद का अधिवास होता है।

तंत्र में मोक्ष के साथ भोग की भी महिमा है। इसलिए कहा गया है- 'श्रीसुन्दरीसेवन-तत्पराणां, योगश्च भोगश्च करस्थ एव।' यहां भोग का अर्थ है, मिलन, परमात्ममयता। मोक्ष अर्थात् कैवल्य। भगवती अपने भक्त-साधकों को दोनों ही प्रदान करने में समर्थ हैं। तंत्र में सर्वानंद-पूर्वक भोग की प्राप्ति के लिए योग को विज्ञान कहा गया है। एक योगी ही सुख-भोग-शक्त हो सकता है, जैसे-एक भोगी ही भोग के सागर में डूबकर योग की पारंगति तक पहुंच सकता है। संभवत: भोग की महिमा के कारण ही वेदाचारियों ने तंत्र की उपेक्षा की। इधर तंत्राचारियों ने वेदों में भोग की उपेक्षा के कारण उसे एक-पक्षीय कहा।

वेद का लोक-सुलभ सार ग्रंथ है- श्रीमद्भगवद्गीता और तंत्र का ग्रंथ-सार है- दुर्गा सप्तशती। तुलसीदास ने रामचरितमानस में वेद के अलावा श्रीमद्भगवद्गीता और दुर्गा सप्तशती दोनों को सम्मिलित किया है। इसलिए इस ग्रंथ के आरंभ में ही कहा गया, 'नाना-पुराण-निगमागम-सम्मतज्। निगम वेद है और आगम तंत्र। रामचरितमानस में शिव की अनंत महिमा का विस्तृत उल्लेख है। वे ही शिव तंत्र के आदि-स्रोत माने जाते हैं। इधर विष्णु के सप्तम अवतार राम वेद-पुरुष हैं। राम शिव का जप करते रहते हैं, जबकि शिव राम का जप। दोनों अंततोगत्वा अभिन्न हो जाते हैं। शिव के साथ सदैव आठ वस्तुएं या बातें संपृक्त रहती हैं। वे हैं- कानों में सर्प-कुंडल, गले में मुंड-माला, कपाल पर चंद्रमा, हाथों में त्रिशूल और डमरू, जटाओं में गंगा, शरीर पर चिता-भस्म तथा मुख में राम। इसी प्रकार राम भी अपने मुख में शिव-धारण करते हैं। शिव के साथ शिवा भक्ति-रूप में रहती हैं और राम के साथ सीता-रूप में। शक्ति (शिवा) के बिना शिव शव हो जाते हैं, उसी प्रकार अपनी शक्ति (सीता) के बिना राम भटकने लगते हैं। जब वे शक्ति की उपासना करते हैं, तभी उनके भीतर वह पराक्रम उत्पन्न होता है कि वे रावण को मारकर वहां से अपनी शक्ति (सीता) को वापस ले आते हैं।

इस प्रसंग के उल्लेख के बाद यह ज्ञातव्य है कि संपूर्ण भारत में गीता, दुर्गासप्तशती और रामचरितमानस के जितने पाठ और तीनों ग्रंथों पर जितने संदर्भ-ग्रंथ लिखे गए हैं, वे भी अद्वितीय और संख्यातीत हैं।

दोनों ही मर्यादित हैं

राम को मर्यादा-पुरुषोत्तम कहा गया है। वे सभी प्रकार के संबंधों में आदर्श उपस्थित करते हैं। इधर दुर्गा किसी भी नियम या मर्यादा से ऊपर हैं। वे जो कुछ करती हैं, वही नियम और मर्यादा बन जाती है। अंडे का उदाहरण लेने पर कहा जा सकता है कि जब-तक अंडे के भीतर का तरल पदार्थ परिपक्व होकर पक्षी का रूप धारण नहीं कर लेता, तब-तक छिलका आवश्यक है। समय से पूर्व अंडे को फोड़ देने पर तरल जीवन बह जाएगा और पक्षी का निर्माण नहीं हो पाएगा, किंतु जब भीतर का तरल पदार्थ परिपक्व होकर पक्षी-रूप धारण कर लेता है तो अंडे के छिलके का टूटना जरूरी हो जाता है, अन्यथा वह पक्षी भीतर ही मर जाएगा। हम राम को पुरुष (परमात्मा) तत्त्व और दुर्गा को पकृति (महामाया) तत्त्व मानते हैं। ब्राहृांड के भीतर रामत्व परमात्म-तत्त्व है। दुर्गा वह शक्ति-तत्त्व है, जो अपनी संचारिणी शक्ति के द्वारा छिलके के छंदों को तोड़कर स्वच्छंद आकाश में विचरण करने लगती है।

 

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