वसीयतनामा

मोनिका अग्रवाल

21st October 2020

यह एक कानूनी परिपत्र होता है

वसीयतनामा

रजिस्टर्ड वसीयत

पड़ोस में रहने वाले शर्मा अंकल की अचानक मृत्यु के बाद जब उनके घर आस पड़ोस के लोग इकट्ठे हुए व पार्थिव शरीर को श्मशान ले जाने की तैयारी चल रही थी। उस समय सभी एकत्रित लोग अपनी-अपनी गुफ्तगू में व्यस्त थे ।किसी की गुफ्तगु का विषय था शर्मा अंकल की जायदाद। तो कोई बहू बेटों को कोस रहा था। यही नहीं उनके खुद के बेटे किसी वकील से ,वसीयत के लिए सलाह मशवरा में लगे थे।"

आखिर वसीयत की क्या जरूरत है। आजकल वसीयत या विल का चलन बढ़ा है। हालांकि अभी भी कुछ लोग जाने अनजाने में किसी वसीयत या विल करवाने से बचते हैं। लेकिन आइए जानते हैं कि इसकी आज के समय में क्या जरूरत है।मृत्यु के बाद हंसता खेलता परिवार विभाजित ना हो और सदस्यों में आपसी वैमनस्य न हो इसके लिए व्यक्ति द्वारा वसीयत अपने जीते जी ही कर दी जाती है। वसीयत के माध्यम से अपनी भौतिक धन, संपत्ति को ,अपनी इच्छा अनुसार ,परिजनों में बांटा जा सकता है ।यह एक कानूनी परिपत्र होता है ,जिसे काटा नहीं जा सकता। अपने जीवनकाल में अपनी वसीयत तैयार करवा कर ,मरने के बाद परिवार के सदस्यों में संपत्ति को लेकर ,उठने वाले विवाद को बचाया जा सकता है। वसीयत करते समय ,बहुत सी  बातों का विशेष ध्यान रखना होता है।

नॉमिनी
जैसे वसीयत किसी भी दूसरे दस्तावेज से अधिक मान्य होती है ।आपने अपने बच्चों को नॉमिनी के रूप में, अपने मकान, बैंक, बीमा, अकाउंट या शेयर्स में नामित किया होगा ।लेकिन नॉमिनी स्वामी नहीं होता। नॉमिनी तभी स्वामी माना जाता है ,जबकि उसके विषय में, वसीयतनामा में भी लिखा गया हो ।अगर कोई व्यक्ति नॉमिनी नहीं  है किंतु ,उसे वसीयत में नामित कर दिया है, तो अंतिम स्वामी वही माना जाता है। 

धर्म विधि
अगर वसीयत में अपने उत्तराधिकार का उल्लेख नहीं किया गया हो, या बगैर वसीयत के ही मृत्यु हो जाती है, तब संपत्ति के बटवारे के संबंध में, धर्म विधि प्रभावी होती है ।अगर आप हिंदू हैं तो, संपत्ति पत्नी बच्चे और मां के बीच बराबर रूप में बांट दी जाएगी ।अगर आप अपना मकान पुत्र के लिए छोड़ना चाहते हैं ,तो इसका उल्लेख वसीयतनामा में अवश्य करना चाहिए। वसीयत में यह जोड़ना ना भूलें कि, आपकी पत्नी उसमें जीवन पर्यंत रहेगी ।इस प्रकार आपको विश्वास बना रहता है कि, आप की संपत्ति ,आपके पसंदीदा उत्तराधिकारी के पास ही रहेगी ।

पावर ऑफ अटॉर्नी
आपने संपत्ति के लिए ,निवेश हेतु बच्चों को पावर ऑफ अटॉर्नी बना दिया है ,तो यह तभी तक वैध  होगा जब तक आप जीवित हैं ।मृत्यु के बाद यह अधिकार स्वतः ही समाप्त हो जाता है। बिना गवाह की वसीयतनामा ,कभी वैध  नहीं होता। इसमें दो गवाहों की जरुरत होती है। ना सिर्फ उस समय जब इसे लिखा जा रहा है, बल्कि उस समय भी गवाह की जरूरत पड़ती है ,जब आप उस पर दस्तखत कर रहे हो। 

गवाह 
हर गवाह को अपना स्पष्ट नाम ,पता व व्यवसाय बताते हुए, वसीयत पर हस्ताक्षर करना होता है। गवाह उन्हें ही बनाना चाहिए ,बालिग हों या हित वध वसीयत में भागीदार नहीं हो ।गवाहों का हस्ताक्षर वसीयत की मूल प्रति के साथ ही ,इसकी अन्य प्रतिलिपियों पर भी होना आवश्यक होता है। अगर आप यह चाहते हैं कि वसीयत की विषय वस्तु को ,आपकी मौत तक गुप्त रखा जाए तो ,इसके लिए गवाहों से अनुरोध ही किया जा सकता है कि,  वह वसीयतनामा की विषय वस्तु ना पढ़े। किंतु कोई भी गवाह कानूनी तौर पर ऐसा करने को बाध्य नहीं होता है ।यह आवश्यक नहीं है कि वसियत स्टांप पेपर पर ही लिखी जाए। कागज का एक साधारण टुकड़ा भी ,इसके लिए पर्याप्त होता है। हालांकि इसके अपवाद भी हैं ।

मौखिक वसियत
अगर आप किसी ऐसे सशस्त्र बल के सदस्य हैं, जो कि एक्शन में अथवा जहाज में है, तो इन स्थितियों में दो गवाहों की मौजूदगी में मौखिक वसियत भी कर सकते हैं।
लिखित वसीयत का यह मतलब नहीं होता कि, आप द्वारा ही हाथ से लिखा गया हो। इसे आप टाइप भी करवा सकते हैं ।वसीयत हमेशा उसी भाषा में तैयार करनी चाहिए, जिस भाषा की वसीयत वाला, अच्छी तरह पढ़  या समझ सकता है। 

अंतिम वसीयत 
अगर किसी समय आप अपनी वसीयत में कोई छोटा-मोटा परिवर्तन करना चाहते हैं ,तो कर सकते हैं। बशर्ते आप को यह बताना होगा कि ,आप यह परिवर्तन क्यों कर रहे हैं, या आप को फिर दो गवाहों की जरूरत पड़ेगी। यह  पहले वाले गवाह हो , यह जरूरी नहीं। अगर वसीयत में ढेर सारे परिवर्तन करने हो तो, आपके पास नयी वसीयत  करने का विकल्प रहता है ।आप  जीवन में भले ही  5बार  वसीयत  किए हों लेकिन मान्यता अंतिम वसीयत की ही होती है ।

पंजीकृत वसीयत
वस्तुतः  है आपको हर 2 वर्षों बाद अपनी वसीयत को रिव्यू पुनरावलोकन के बारे में  सोचना चाहिए। यह तब आवश्यक हो जाता है ,जब किसी व्यक्ति को आप पहली बार अपनी वसीयत में नामित नहीं करते और आप इसके लिए कुछ छोड़ना चाहते हैं ।वसीयत का पंजीकरण अनिवार्य नहीं होता। हालांकि पंजीकृत वसीयत पर कोर्ट ज्यादा तरजीह नहीं देता है।पंजीकृत वसीयत में एक समस्या होती है। यदि इस वसीयत में कोई परिवर्तन करना चाहें  , तो एक लंबी  प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है ।

निष्पादको  की नियुक्ति
यह सुनिश्चित करने के लिए कि आप की वसीयत की विषय वस्तु को, अमल में लाया जाए ,आप कम से कम ,दो निष्पादको  की नियुक्ति कर सकते हैं। यह कानून उचित भी है। अपनी वसीयत की प्रतिलिपियां तैयार करें ।एक अपने पास सुरक्षित रख लें तथा एक एक अपने वकील एवम प्रत्येक निष्पादक के पास रख दें ।वसीयत लिखने के बाद भी परिवार के व्यक्ति उस पर विवाद उठा सकते हैं। जो सदस्य महसूस करते हैं कि उन्हें  आप की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिला है या इच्छा अनुसार वस्तु नहीं मिली है ।वह वसीयत को इस आधार पर विवाद के घेरे में ला सकते हैं कि,  वसीयत बल प्रयोग द्वारा लिखाई गई है ।या इसे करते समय वसियतर्कता  कि दिमाग की दशा ठीक नहीं थी या इसे लिखते वक्त , वसीयत करने वाला नशे की हालत में था ।जाली हस्ताक्षर के आधार पर भी वसीयत को अवैध साबित किया जा सकता है ।लेकिन यह इतना आसान नहीं होता ।ऐसा आरोप लगाने वालों को  साक्ष्यों के आधार पर अपनी बात साबित करनी होती है। ऐसे मामलों में अदालत ग्रहों का परीक्षण करती है।

कब करवाएं वसीयत

अपनी नौकरी से रिटायरमेंट लेने के बाद या अपने कामों से मुक्त होने के बाद ही वसीयत करा देना अच्छा होता है। वैसे वसीयत करवाने का सबसे अच्छा वक्त 60 साल की उम्र को माना जाता है। अगर कोई शख्स कम उम्र में किसी गंभीर बीमारी से पीडि़त है, तो वसीयत पहले भी कराई जा सकती है।

वसीयत करवाते समय क्या ध्यान रखें

 कोशिश करें कि वसीयत छोटी हो और एक पेज में आ जाए। इससे बार-बार विटनेस की जरूरत नहीं पड़ेगी। एक से ज्यादा पेज में आए तो हर पेज पर दोनों गवाहों के दस्तखत करवाएं। साथ ही हर पेज पर अपने हस्ताक्षर जरुर करें। वहीं दो ऐसे लोगों को गवाह बनाएं, जो आपकी हैंडराइटिंग या आपके दस्तखत पहचानते हों। इस वसीयत को सब-रजिस्ट्रार ऑफिस जाकर रजिस्टर्ड कराएं और रजिस्ट्रार के रजिस्टर में इसकी एंट्री भी करवाएं और हो सकते तो वीडियो रिकॉर्डिंग भी करवा लें।

गवाह या वसीयत करने वाली की मौत होने पर क्या करें?

अगर वसीयत करने वाले से पहले किसी गवाह की मौत हो जाए तो वसीयत दोबारा बनवानी चाहिए। दोबारा वसीयत बनवाते समय पहली वसीयत को कैंसल करने का जिक्र जरूर करें। वहीं अगर वसीयत खो जाए तो भी दोबारा वसीयत करवाएं और बेहतर है कि उसमें थोड़ा फेरबदल करें, ताकि पहली वसीयत कैंसल मान ली जाए।

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